क्या सचमुच दूर होगी गरीबी?
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शोधकर्ता जब प्रश्नावली लिए गांव की गरीब बस्तियों में साक्षात्कार लेने पहुंचते हैं, तो अक्सर उन्हें लोग घेर लेते हैं। हमारा भी फॉर्म भर लीजिए। क्या मिलेगा? क्या देंगे? कुछ पाने की आशा में कातर आंखें शोधकर्ता, उसकी कलम और कागज को भिगो देती हैं। स्वतंत्रता से लेकर आज तक पीढ़ी दर पीढ़ी, गरीबों ने गरीब परवर सरकार से आशाएं नहीं छोड़ी हैं। और सरकारें भी नित-नूतन कार्यक्रम लेकर आई हैं, जिन पर गरीबों ने भरोसा भी किया है। जहां भी कार्यक्रम सही चले, वहां गरीबों ने उन कार्यक्रमों से खुश हो वोटों से नवाजा भी है।
किसी भी राजनीतिक पार्टी के एजेंडे से गरीब कभी गायब नहीं हुए। जैसा कि हम आगे देखेंगे, विकास ने कुछ समाजों पर बहुत कहर ढाया। विकास ने इन समाजों से या तो काम में आने वाले संसाधन, या फिर उनका समूल पेशा ही छीन लिया। सरकारों के लिए जरूरी हो गया कि गरीबी और राजनीति साथ-साथ चले, जिसमें सरकार दाता बने और गरीब याचक। सत्ता में राजनेताओं ने यह कभी जरूरी नहीं समझा कि गरीब अपने लिए सोचें और समझें। विकास की गाड़ी को गरीब की आह न लगे, इसके लिए सरकार गरीब परवर भी बनी रही।
इतिहास गवाह है कि विकास ने गरीब बहुत बनाए हैं। कपड़े के बड़े कारखानों ने जुलाहों से काम छीन लिया, यह तो सबको मालूम है। पर अनेक काम और उनसे जुड़ी जातियां ऐसी हैं, जिनके कामों की चर्चा बहुत कम होती है। मुसहरों के मूस मारकर खाने की बात बहुत लोग जानते हैं। मुसहर बखरी (मिट्टी का घर) बनाने का काम करते थे और उसके लिए मिट्टी खोद कर बड़े लोगों के घर बनाते थे। मिट्टी खोदने से जो छोटा बड़ा तालाब बनता, उसमें मछलियां पाल लेते। मुसहर महुए के पत्तों से पत्तल-दोने भी बनाते हैं। विकास ने कच्चे घरों को पक्का किया। पत्तल-दोने की जगह फाइबर की प्लेट आ गईं। विकास के साथ व्यक्तिवाद आया और लोगों ने मुसहरों को मुफ्त पत्ता देना बंद किया।
सपेरे सिर्फ सांप पकड़कर बीन से उन्हें नचाते ही नहीं थे। वे सांप और बिच्छू के डंक का इलाज भी करते थे। अंग्रेजी दवा आने के बाद से उनका काम कम हो गया। अब उनके बच्चे सांप देखकर डरने लगे हैं। सरवन कान के मैल निकालते थे और एक तेल भी बनाते थे, जो कान में डालते थे। धरिकार जाति के निकले बसोड़, बंसफोड़, डोम और भंगी। बंसोड़ और बंसफोड़ बांस से डलिया बनाते और मंदिर के पास झपली बेचते। गांव के जंगल विकास की भेंट चढ़ गए। बांसों की आमद कम हो गई। टोकरी के विकल्प बाजार में आ गए। नगर के विकास के साथ शौचालय बने, जिन्हें साफ करने के काम के लिए भंगी को आगे आना पड़ा। नट तमाशा दिखाते, लाठी बाजी भी करते, कंजर नाचने-गाने का काम करते और खंजड़ी बजाते। किसानों से इन्हें दाल-चावल-पैसा मिलता था। विकास के साथ सिनेमा और टेलीविजन भी आया, जहां इनके लिए जगह न रही।
इस प्रकार हम देखते हैं कि विकास ने कैसे इन जातियों को और ऐसी अन्य जातियों को किनारे किया। सबसे खतरनाक और विघटनकारी जो हुआ, वह यह कि इन और ऐसी अनेक जातियों के जजमानी अधिकार लगभग समाप्त हो गए। जजमानी व्यवस्था में उनका अन्न पाने का जो अलिखित हिस्सा था, वह समाप्त हो गया।
बदले में हमारे संविधान ने हर व्यक्ति को मानवाधिकार दिया। हर व्यक्ति को बराबर अधिकार। इनमें ऐसे व्यक्ति जो गरीब हों, उनके लिए सरकार ने कई कार्यक्रम बनाए, ताकि वे आगे आ सकें। इन कार्यक्रमों और नीतियों का लाभ अपेक्षित न हुआ और इन जातियों तक, जिनको समाज ने किनारे कर दिया, बहुत ही कम पहुंचा। न ही इनमें कोई नेता पैदा हुआ, जो इनकी वकालत कर सके। इसके विपरीत कई जातियों जैसे पासी, कोरी इत्यादि ने कुछ नीतियों का लाभ उठाया, अपना नेतृत्व पैदा किया, वे आधुनिकता से जुड़े और लोकतंत्र में तंत्र पर अपना परचम भी लहराया।
सरकारों ने अत्यंत पिछड़ी जातियों के लिए हरसंभव जरूरी आवश्यकताएं यथा; भोजन, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई हैं। सरकार द्वारा इन्हें उपलब्ध कराने एवं समुदायों तक इनके पहुंचने में भारी अंतर है। राशन देने वाले कोटेदार के पास उनके लिए अनाज है, पर उन्हें मिलता तिरस्कार है। स्कूल में शिक्षा उपलब्ध है, पर वहां सामने बैठने की जगह नहीं है। अगर है, तो हताशा है और साथ बैठ जाएं, तो दर्द का दरिया है। ऐसा ही एक मौका आया, जब ‘संस्कृति, लोकतंत्र का प्रसार और उपेक्षित समूह’ की बात करती ये जातियां पंत संस्थान में इकट्ठा हुईं। अपनी बातें कीं और सरकारी कार्यक्रमों से होने वाले नफा-नुकसान का भी अंदाजा लगाया। ऐसे अति उपेक्षित समूहों की बातों में हताशा एवं दर्द साफ-साफ दिख रहा था।
1960 के दशक तक एक लहर पंचायती राज की थी, लेकिन विकास की यात्रा ने लोगों को उनके पारंपरिक पेशों से विरत किया और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों पर निर्भरता बढ़ाई। इन्हीं में मनरेगा और खाद्य सुरक्षा जैसे कार्यक्रम शामिल हैं। ऐसे कार्यक्रमों से हाशिये के लोगों को मिला भी तो बहुत कम, क्योंकि अपने हक की लड़ाई के लिए उनमें आत्मबल नहीं रहा। शायद इतना कुछ लिखने की जरूरत नहीं थी। गोरखनाथ ने मध्य काल में ही यह बात कह दी थी, आप जगे तो जग जगे।
(लेखक गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद के निदेशक हैं)