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ट्रंप प्रशासन : अमेरिका से सकारात्मक संदेश, इस नियुक्ति से बदल सकते हैं एशिया में समीकरण

Fri, 06 Dec 2024 06:26 AM IST
K S Tomar केएस तोमर
Updated Fri, 06 Dec 2024 06:26 AM IST
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सार
ट्रंप द्वारा चीन और कनाडा विरोधी राजनेता को विदेश मंत्री नियुक्त किए जाने से एशिया में समीकरण बदल सकते हैं। हिंदू-अमेरिकी को सलाहकार बनाना, विशेषकर तुलसी गबार्ड को नेशनल इंटेलिजेंस निदेशक और काश पटेल को एफबीआई प्रमुख के रूप में नियुक्त करना सकारात्मक संदेश है।
 
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Positive message from America: Appointments in Trump administration can change the equation in Asia
डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : पीटीआई

विस्तार

दुनिया इस समय बड़े भू-राजनीतिक बदलाव के चौराहे पर खड़ी है। डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत और अमेरिका के संबंधों का भविष्य खासा महत्व रखता है, जिसके संकेत ट्रंप की दो प्रमुख नियुक्तियों से स्पष्ट हैं। ट्रंप ने भारत समर्थक माइकल वाल्ट्ज को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) बनाया है, तो हिंदू अमेरिकी तुलसी गबार्ड को नेशनल इंटेलिजेंस निदेशक नियुक्त किया गया है। एफबीआई प्रमुख नियुक्त किए गए काश पटेल की भारतीय विरासत उनके व्यक्तित्व में दिलचस्प आयाम जोड़ती है। अमेरिकी राजनीति में भारतीय-अमेरिकी समुदाय की बढ़ती उपस्थिति और प्रभाव को भारत के बढ़ते महत्व के संकेत के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि पटेल की नियुक्ति जातीय पृष्ठभूमि की अपेक्षा उनकी वफादारी, पेशेवर रिकॉर्ड और ट्रंप के एजेंडे में फिट बैठना है। 


परंपरागत रूप से भारतीय-अमेरिकी समुदाय का झुकाव डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ रहता था, लेकिन अब ट्रंप के लिए समर्थन दिखता है। बदलते शक्ति संतुलन के बीच भारत और अमेरिका, अपने रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों के पुनर्मूल्यांकन के लिए तैयार हैं। ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ की बातें बेशक वैश्विक स्तर पर विभाजनकारी हैं, लेकिन भारत के वैश्विक प्रभाव और आत्मनिर्भरता की आकांक्षाओं के साथ स्वाभाविक तालमेल हो सकता है। चीन का मुकाबला करने के लिए भारत और अमेरिका अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना चाहते हैं। साथ ही व्यापार, रक्षा और तकनीक में भी दोनों देशों के आगे रहने की संभावना है।   


महत्वपूर्ण व्यापार मार्गों और उभरती सुरक्षा चिंताओं के बीच इसमें कोई संदेह नहीं है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र दोनों देशों के बीच उभरती साझेदारी का केंद्र बिंदु होगा। भारत-अमेरिकी संबंधों की दिशा न केवल द्विपक्षीय भाग्य को, बल्कि व्यापक वैश्विक व्यवस्था को भी आकार देगी, जिसमें ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की रणनीतिक गणना में भारत का प्रमुख स्थान सुनिश्चित होने की संभावना है। इस बार प्रभावी भारतीयों ने अमेरिका-भारत संबंधों को प्राथमिकता देने, सुरक्षा, व्यापार और आतंकवाद से लड़ने पर जोर देने की ट्रंप की नीतियों को अपना समर्थन दिया है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भारतीय-अमेरिकियों का सालाना योगदान करीब 200 अरब डॉलर है। यह योगदान प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा और उद्यमिता सहित विभिन्न क्षेत्रों से आता है, जो नवाचार और आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका को उजागर करता है।

ट्रंप की वापसी ने कई देशों को अमेरिका के साथ अपने संबंधों का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए मजबूर किया है, लेकिन भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इसे एक अवसर के रूप में देख रहा है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने टिप्पणी की कि ट्रंप की वापसी से कई देश असहज हो सकते हैं, लेकिन भारत नहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में मोदी को लाभ मिल सकता है, खासकर रूसी प्रतिबंधों और पश्चिम के साथ भारत के तनाव के बीच। अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वाल्ट्ज को चुना है, जो अपने दृढ़ चीन विरोधी और त्रूदो विरोधी रुख के लिए जाने जाते हैं। ट्रंप के कट्टर सहयोगी वाल्ट्ज से उम्मीद की जाती है कि वह ट्रंप के वादों के साथ जुड़कर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक कठोर रुख अपनाएंगे। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन की कार्रवाइयों की उनकी मुखर आलोचना इस क्षेत्र में संभावित संघर्षों के लिए अमेरिका के तैयार रहने पर बल देने को रेखांकित करती है।

वर्ष 2023 में स्वतंत्रता दिवस समारोह पर भारत दौरे पर आए माइकल वाल्ट्ज ने भारत और अमेरिका के संबंधों के साथ ही प्रधानमंत्री मोदी की सराहना की थी तथा भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार बताया था। वाल्ट्ज की नियुक्ति कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन त्रूदो के लिए बुरी खबर है। वह भारत के अनुकूल अमेरिका-कनाडा संबंधों को नया आकार दे सकते हैं। भारत विरोधी रुख अपनाने वाले त्रूदो को बाइडन प्रशासन का समर्थन मिलता था, लेकिन ट्रंप प्रशासन भारत-अमेरिका संबंधों पर जोर देता है। वाल्ट्ज ने भी कहा था कि 21वीं सदी में भारत-अमेरिका के संबंध सबसे महत्वपूर्ण होंगे। उन्होंने संवेदनशील नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर भारत की संप्रभुता की रक्षा के उपायों की वकालत करते हुए एक स्वतंत्र और खुले भारत-प्रशांत क्षेत्र को सुनिश्चित करने के लिए सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया।

विशेषज्ञों की राय है कि ट्रंप ने दीर्घकालिक रणनीति को ध्यान में रखते हुए हिंदू अमेरिकी तुलसी गबार्ड को नियुक्त किया है। भारत और अमेरिका संबंधों की प्रबल समर्थक तुलसी भारत और इसकी सांस्कृतिक विरासत पर अपने सकारात्मक विचारों के लिए जानी जाती हैं। नेशनल इंटेलिजेंस निदेशक (डीएनआई) के रूप में वह अमेरिका की 18 एजेंसियों से खुफिया जानकारी के लिए समन्वय करेंगी, जो दोनों देशों के बीच आतंकवाद विरोधी और रणनीतिक खुफिया सहयोग को मजबूत कर सकती है। तुलसी भारत और अमेरिकी संबंधों की पक्षधर हैं, तो पाकिस्तान पोषित आतंकवादी नीतियों की विरोधी। इससे भारत को आतंकवादी समूहों के खिलाफ लड़ाई में फायदा होगा। गबार्ड की नियुक्ति से भारत-प्रशांत क्षेत्र में चीन की हठधर्मिता पर भी एक तरह से अंकुश लगेगा। उनके कार्यकाल में क्वाड के भीतर खुफिया सहयोग में नया जोश देखने को मिल सकता है, खासकर समुद्री सुरक्षा और चीनी निगरानी रणनीति पर।

निर्णायक मोड़ पर खड़ी दुनिया के सामने ट्रंप की वापसी नाटो की प्रतिबद्धताओं, यूक्रेन युद्ध और भारत व चीन जैसी शक्तियों के साथ उनके संबंधों से पश्चिमी प्रभाव की भावी स्थिरता और वैश्विक शक्ति संतुलन का निर्धारण होगा। यूरोप के प्रति ट्रंप की नीतियां अनुकूल व्यापार सौदों या रक्षा खर्च पर रियायतों की मांग में प्रकट हो सकती हैं। कुल मिलाकर, कई मायनों में ट्रंप का राष्ट्रपतित्व अमेरिकी विदेश नीति के पुनर्मूल्यांकन का प्रतीक होगा, जो व्यावहारिकता के साथ मिश्रित राष्ट्रवाद के अपने ब्रांड पर लौटेगा। हालांकि यह दृष्टिकोण सहयोगियों के साथ टकराव पैदा कर सकता है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को बदल सकता है और मौजूदा राजनयिक मानदंडों को चुनौती दे सकता है। 
 
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