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'पोरिबर्तन' जो हुआ नहीं

Mon, 23 Feb 2015 07:09 PM IST
हरिराम पाण्डेय
हरिराम पाण्डेय Updated Mon, 23 Feb 2015 07:09 PM IST
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'Poribortan' not happend

पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल की लगातार खराब होती छवि के बीच यह धारणा बन रही है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कदाचित अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, पर हो सकता है कि समय से पहले ही राज्य में चुनाव हो जाए। वैसी स्थिति में भाजपा का वोट बहुत ज्यादा बढ़ेगा तथा सीटों की संख्या भी काफी बढ़ सकती है। बंगाल की जनता में व्याप्त निराशा को देखते हुए अगर अगले चुनाव में ‘चमत्कार’ भी हो जाए, तो बड़ी बात नहीं है।

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दरअसल शारदा घोटाले में अपने करीबी मुकुल राय के फंसने के बाद ममता ने मुकुल से जिस तरह दूरी बना ली है, उससे पार्टी के भीतर तरह-तरह की सुगबुगाहटें हैं। आश्चर्य यह है कि शारदा घोटाले में अपने कुछ लोगों की गिरफ्तारी का उन्होंने तीखा विरोध किया, तो कुछ पर शिकंजा कसने पर उनसे दूरी बना ली। मुकुल राय से ममता की नाराजगी की वजह यह बताई जाती है कि उन्होंने सीबीआई को ऐसा कुछ बता दिया है, जिससे देर-सबेर मुख्यमंत्री पर भी आंच आ सकती है। मानो तृणमूल के लिए यही कम मुश्किलें न हों, बांग्लादेश की यात्रा से लौटने के बाद ममता के प्रतिनिधिमंडल में शामिल व्यवसायी शिबाजी पांजा को कोलकाता हवाई अड्डे पर धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। पत्रकारों के सवालों पर तिलमिलाई ममता का जवाब था कि वह खुद कारोबारी नहीं हैं, इसलिए उन्हें इस बारे में पता नहीं। पर विदेश सफर में उनके साथ गए शख्स को धोखाधड़ी के आरोप में हवाई अड्डे पर ही धर लिया जाता है, तो मुख्यमंत्री की छवि पर उसका असर पड़ता ही है। क्या मुख्यमंत्री या उनके अधिकारियों को यह पता नहीं था कि शिबाजी पांजा के खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी हो चुका है?
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बांग्लादेश से लौटने के बाद नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होकर दीदी ने मोदी-विरोधी मोर्चे की मजबूती के बारे में संदेश देने की कोशिश की है। पर जब खुद नीतीश मोदी के साथ मिलकर बिहार का विकास करने की बात कह रहे हैं, तब ममता का मोदी-विरोध कितना कारगर होगा? बल्कि ऐसा करके वह राज्य का नुकसान ही कर रही होंगी।
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ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद लगा था कि यह अग्निकन्या बंगाल के गौरव को पुन: स्थापित करेगी। पर ऐसा कुछ नहीं हो सका। बंगाल के ‘भद्रलोक’ अब खुद को कोस रहे हैं कि ‘मति मारी गई थी, जो तृणमूल को वोट दिया।’ राज्य का आम आदमी मोहभंग की हालत में है। ममता की अपनी तथा पार्टी की साख तेजी से गिर रही है। ऐसे में, राज्य की जनता ऐसे राजनीतिक विकल्प की खोज कर रही है, जो उसकी उम्मीदों को पूरा करने की ईमानदार कोशिश करती नजर आए। जो कांग्रेस और वाम मोर्चा विकल्प हो सकते थे, वे कम से कम अभी उठ खड़े होने की स्थिति में नहीं दिखते। केंद्र में आज जिस भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, और जिसका बंगाल में कभी अस्तित्व ही नहीं था, वह यहां अपनी जगह बनाने के लिए जमीन-आसमान एक कर रही है। पर राज्य में यहां भाजपा का मजबूत नेतृत्व न होने के कारण फिलहाल उसमें वह वर्चस्व नहीं दिख रहा, जिससे लगे कि वह बेहतर विकल्प बन सकेगी। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली में बैठकर अपनी गतिविधियों का बड़े कौशल से प्रचार कर बंगाल की जनता को संदेश दे रहे हैं कि पार्टी उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने में सक्षम है। इस प्रचार का असर भी पड़ रहा है। बंगाल में भाजपा की जड़ें फैल रही हैं। पिछले दिनों हुए दोनों उपचुनावों में वह तृणमूल के बाद दूसरे स्थान पर रही।

लोकसभा चुनाव के दौरान एक बार फिर आशा बंधी थी कि ममता बनर्जी केंद्र में ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाएंगी। पर ऐसा न होने से वह मौका भी ममता के हाथ से निकल गया। अब वह और उनकी पार्टी राजग तथा संप्रग के दो पाटों के बीच पिस रही है। मोदी-विरोध के कारण वह खुद हाशिये पर चली गईं। इसका नतीजा हुआ कि बंगाल एक बार फिर किसी आदर्श दिशा के अभाव में राजनीतिक मरीचिका के दौर में पहुंच गया है। तृणमूल के जिन नेताओं को राज्य का आदर्श समझा जा रहा था, वे शारदा घोटाले की वजह से या तो जेल में हैं या जेल से बचने के लिए भाजपा के नजदीक जाने की कोशिश में हैं। कभी ममता के बेहद करीबी रहे मुकुल राय आज तृणमूल छोड़ने या भाजपा का दामन थामने की चर्चाओं के बीच झूल रहे हैं। तृणमूल के दो सांसद और एक मंत्री घोटाले में संलिप्तता के कारण पहले से ही जेल में हैं तथा और कई लोगों पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। ममता आदत के अनुरूप केंद्र पर आरोप लगा रहीं हैं कि वह सीबीआई का राजनीतिक हथियार के तौर पर उपयोग कर रहा है। लेकिन जब वह विरोधी नेता की भूमिका में थीं, तब ऐसे मौकों पर सड़कों पर उतर आती थीं। आज वह बात नहीं रह गई है।


इन्हीं सब वजहों से राज्य में ममता की छवि बहुत तेजी से खराब हुई है। अब उनकी सभाओं में पहले जैसी भीड़ नहीं होती। राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक विकास की जो बातें कही जा रही हैं, बंगाल उससे बहुत दूर है। इस कारण नौजवानों में काफी हताशा है। बंगाल भारत का पूर्वी द्वार है और इसके पास प्रचूर प्राकृतिक संपदा है। पर संतुलित आर्थिक नजरिया न होने कारण यहां उद्योग-धंधों का अभाव है। ममता बनर्जी को खुशफहमी थी कि वह बंगाल की तस्वीर बदल देंगी, पर उनका हर प्रयास विफल रहा। सिंगापुर जाकर निवेश लाने की कोशिश भी किसी काम नहीं आ सकी। फिक्की से लाकर वित्त मंत्री बनाए गए अमित मित्रा भी कुछ नहीं कर पाए। टाटा को नैनो परियोजना राज्य से बाहर ले जाने में ममता ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। आज वह टाटा के मनुहार में लगी हैं, फिर भी निवेश के लक्षण नहीं दिखते। कुल मिलाकर, ममता के बचे-खुचे राज में बंगाल में बदलाव की अब कोई उम्मीद नहीं है।

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