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हिस्से के राशन से वंचित ये गरीब

Thu, 30 Jun 2016 06:00 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 30 Jun 2016 06:00 PM IST
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Poor deprived from their part of ration
सुभाषिनी सहगल अली

हमारी सरकार को इस बात की बहुत चिंता है कि सस्ते राशन का लाभ गरीबों को ही मिले। किसी गैर-गरीब को कहीं इसका फायदा मिल जाए, तो निश्चित रूप से देश के बहुत बुरे दिन आ जाएंगे। इन बुरे दिनों से बचने के लिए सरकार ने तमाम उपाय किए हैं। इन उपायों को लागू करने में बहुत पैसा भी खर्च कर डाला है। इतना पैसा कि अगर संयोग से, कुछ गैर-गरीब भी थोड़ा-सा सस्ता राशन पा जाते, तो उस पर खर्च होने वाला पैसा उस राशि से बहुत ही कम होता, जो गरीबों के राशन को बचाए रखने पर खर्च किया जा रहा है।

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गरीबों के राशन की गुणवत्ता इस तरह की है कि कोई गैर गरीब उसे खाना ही नहीं चाहेगा। यही नहीं, वह राशन पाने के लिए धूप, बरसात और ठंड में घंटों राशन की दुकान के सामने लंबी लाइन में खड़ा होना पड़ता है, और जैसे ही बारी करीब आती है, तो अचानक दुकान बंद कर दी जाती है। जाहिर है कि इस तरह दुकान बंद करने का कोई कारण बताना दुकानदार के लिए जरूरी नहीं होता। फिर भी सरकार इस बात पर बहुत ज्यादा पैसा और ऊर्जा खर्च कर रही है कि गरीबों के राशन का लाभ किसी हालत में कोई गैर-गरीब न उठाने पाए। अक्सर इन प्रयासों का नतीजा यह होता है कि गैर गरीबों के साथ गरीबों को भी उनके हिस्से का राशन नहीं मिलता।
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गरीबों के राशन को गैर- गरीबों से बचाने के लिए सरकार ने तय किया है कि राशन की दुकानों को एक मशीन दी जाएगी, जिस पर गरीब कार्ड-धारक अपनी उंगलियां दबाएंगे। उनके निशान को मशीन रिकॉर्ड कर लेगा, और उसमें पहले से फीड किए गए कार्डधारकों के निशानों से मिलाया जाएगा। जब निशान मिल जाएंगे, तभी गरीब कार्ड धारक को दुकानदार राशन देगा। राजस्थान में राशन की हर दुकान पर सरकार की तरफ से ऐसी मशीन लगाई गई है। एक मशीन की कीमत 17,000 रुपये है, और 2010 में वहां राशन की कुल दुकानें 2,280 थीं। यानी गैर-गरीबों से गरीबों का राशन बचाने के लिए एक राज्य में 40 करोड़ रुपये की मशीनें लगाई गईं। फिर तमाम लोगों से कहा गया कि वे आधार कार्ड बनाएं। जैसे-तैसे, धक्के खाते हुए लोगों ने कार्ड बनवाए और फिर दुकान पर राशन लेने गए। मशीनों ने तमाम लोगों की उंगलियों के निशान पहचानने से इन्कार कर दिया, क्योंकि कई मशीनें सही नहीं थीं। जो सही थीं, वे भी कार्डधारकों की शिनाख्त नहीं कर पाईं, क्योंकि हाड़तोड़ परिश्रम करने वाले ग्रामीण लोगों की उंगलियां पसीने और मेहनत से घिस जाते हैं। यदि इंटरनेट न चल रहा हो, तब तो मशीन काम करना ही बंद कर देती है। गुजरात में भी उंगलियों के निशान पहचानने वाली मशीनें राशन की दुकानों में लगाई गई हैं।
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न्यायालय ने अप्रैल के महीने में आदेश दिया कि सूखाग्रस्त क्षेत्रों के तमाम लोगों को गरीबों को मिलने वाला राशन दिया जाए। भूख से छुटकारा पाने की उम्मीद में हजारों गांव के लोग आठ-दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित राशन की दुकानों पर भीड़ लगा रहे हैं, लेकिन सूखे के कारण बिजली नहीं रहने पर मशीन नहीं चलती। गरीबों का राशन गैर-गरीबों से बचाने की अपनी कवायद के चलते सरकारें गरीबों को सिर्फ अपने हिस्से का राशन पाने से ही वंचित नहीं कर रही हैं, बल्कि राजस्थान और गुजरात के सूखाग्रस्त इलाके के भूखे गरीबों की बेबसी भी बढ़ा रही हैं।

-लेखिका माकपा पोलितब्यूरो की सदस्य हैं

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