फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   poltics on VHP's pad-yatra

परिक्रमा की आड़ में राजनीति

Wed, 21 Aug 2013 06:48 PM IST
शीतला सिंह
शीतला सिंह Updated Wed, 21 Aug 2013 06:48 PM IST
विज्ञापन
poltics on VHP's pad-yatra

उत्तर प्रदेश सरकार ने 25 अगस्त से 13 सितंबर तक प्रस्तावित विश्व हिंदू परिषद की उस पदयात्रा को प्रतिबंधित कर दिया है, जो पहले 84 कोसी परिक्रमा के नाम पर प्रचारित की गई थी। अशोक सिंघल सहित विहिप के कई नेताओं एवं अयोध्या के संतों ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एवं सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह से इस यात्रा के लिए पुलिस संरक्षण प्रदान किए जाने का आग्रह किया था, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि इसका उद्देश्य अयोध्या में विवादित स्थल पर मंदिर निर्माण है।

विज्ञापन


यही तथ्य सरकार के लिए प्रतिबंध लगाने का उचित आधार भी बन गया, क्योंकि जब यह मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है और उसने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दे रखा है, और नौ मई, 2011 के आदेश में उसने इसकी पुष्टि भी की है, तो भला इसके विपरीत मंदिर निर्माण के लिए यात्रा, आंदोलन और अभियान की अनुमति कैसे दी जा सकती है।
विज्ञापन


मणिराम दास की छावनी के महंत पद पर रहते हुए 50 वर्ष पूरा होने की स्वर्ण जयंती एवं उनके 75 वर्ष की आयु पूरी करने के उपलक्ष्य में जो ‘अमृत महोत्सव’ का आयोजन किया जा रहा था, यह प्रसंग उसी में उठा था और यह घोषणा भी अमृत महोत्सव का एक अंग थी। बाद में विहिप ने इसे अपनाया और इसके लिए पूरे देश के विभिन्न भागों में इसे सफल बनाने का प्रयत्न भी आरंभ कर दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन


जहां तक 84 कोसी परिक्रमा का संबंध है, वह चैत्र शुक्ल पूर्णिमा से आरंभ होकर वैशाख शुक्ल नवमी तक चलती है। भादो महीने में यह एक नई परंपरा की शुरुआत थी। प्रदेश सरकार के समक्ष भी प्रमुख प्रश्न यही था कि वह परंपराओं से हटकर राजनीतिक कारणों और लाभ-हानि को ध्यान में रखकर लोकसभा चुनाव से पहले होने वाले ऐसे आंदोलन के प्रति कैसा दृष्टिकोण अपनाए। उन्हें संविधान के मौलिक अधिकारों में आने-जाने, रहने, पूजा-पाठ और सम्मेलन करने की गारंटी के तहत ले या उन्हें इसके विपरीत मानकर कानून-व्यवस्था को धार्मिक सद्भाव की रक्षा के रूप में देखकर प्रतिबंधात्मक व्यवस्थाओं का सहारा ले, ताकि प्रदेश का वातावरण न बिगड़े।

राज्य सरकार ने विहिप के प्रतिनिधि मंडल से मिलने के समय ही यह स्पष्ट कर दिया था कि वह स्थिति की समीक्षा करने के बाद ही निर्णय लेगी। वैसे यह प्रश्न सिर्फ विहिप का ही नहीं है, भारत जैसे बहुधर्मी और बहुआस्था वाले देश में लोगों को राजनीतिक लाभ के लिए मनमाने आयोजनों की छूट देने और उनके परिणाम भुगतने से भी जुड़ा है।

संविधान में जो मौलिक अधिकार गिनाए गए हैं, उनमें से कोई भी पूर्ण नहीं है, बल्कि सभी युक्तियुक्त प्रतिबंधन के तहत आते हैं। उनका निर्धारण यदि विवाद में हो, तो न्यायालय को ही व्याख्या करने और किसी भी निर्णय को विधान सम्मत मानने या न मानने का भी अधिकार है।

जहां तक विहिप के कार्यक्रम का संबंध है, तो पहले उसने इसे 84 कोसी परिक्रमा बताया और बाद में उसे यात्रा कहा। पर इसका मार्ग वही रखा, जो 84 कोसी परिक्रमा का था, जिसके अंतर्गत फैजाबाद, गोंडा, बहराइच, बस्ती, अंबेडकरनगर और बाराबंकी जिले आते हैं। इन क्षेत्रों में अयोध्या के साथ ही अगल-बगल के जिले भी आते हैं, जिनमें भाजपा का राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र बढ़कर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद से घटता गया है।

इस गैर पारंपरिक कार्यक्रम से सबसे अधिक चिंतित अल्पसंख्यक समुदाय है और वह यही चाहता था कि ऐसा कुछ न हो, क्योंकि इस आयोजन के द्वारा विहिप ने यह भी मांग की थी कि इस क्षेत्र में नई मस्जिद और इस्लामिक सांस्कृतिक केंद्र नहीं बनने चाहिए। यह संविधान की उन व्यवस्थाओं के विपरीत है, जिसमें धर्म के नाम पर भेदभाव न करने की गारंटी दी गई है।


विहिप प्रदेश सरकार के निर्णय को धार्मिक भावना पर प्रहार बता रही है। पर वह यह नहीं बता रही है कि इसके पीछे निहित उद्देश्य धार्मिक मान्यताओं पर आधारित कैसे माने जाएंगे, क्योंकि यह प्राचीन परंपराओं, ऐतिहासिक संदर्भों और वर्तमान यथास्थिति के विरोधी हैं। सरकार का संकट यह है कि आज भी सरकारी सेवाओं में सांप्रदायिक मानसिकता वाले तत्वों की कमी नहीं है। वे कहीं सरकार की इच्छा के विपरीत कुछ न करने लगें। लेकिन यह सब इसी पर निर्भर करता है कि क्या विहिप यात्रा के नाम पर कोई बड़ा आंदोलन खड़ा कर पाएगी?

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed