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नए चेहरों की राजनीति: भाजपा ने उसी रास्ते का अनुसरण किया, जो इंदिरा गांधी ने चार दशक पहले चुना था

Nilanjan Mukhopadhyay नीलांजन मुखोपाध्याय
Updated Thu, 14 Dec 2023 07:19 AM IST
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सार
इतिहास गवाह है कि यह इंदिरा गांधी के सत्तावादी तरीकों की अभिव्यक्ति थी, लेकिन भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने यह कदम उठाकर पार्टी के भीतर कार्यकर्ताओं और आम जनता को क्या संदेश दिया है? इस सवाल का जवाब देने से पहले मुझे एक और घटना याद आती है।
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Politics of new faces BJP follows the same path Indira Gandhi chose four decades ago
मध्य प्रदेश के नए मुख्यमंत्री के साथ पीएम मोदी। - फोटो : ANI

विस्तार

भाजपा द्वारा मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्रियों और उप मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति पर 1982 में द टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित मशहूर कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण का एक कार्टून मुझे याद आया। उसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी हाथ में छाता लिए पारंपरिक राजनीतिक पोशाक पहने कई राजनेताओं के आगे से गुजर रही थीं। जमीन पर पड़े अखबार की हेडलाइन दृश्य को स्पष्ट करती है, जिसमें लिखा है, 'आंध्र के सीएम की तलाश जारी है।' 



कार्टून में इंदिरा गांधी को उनमें से किसी एक नेता की ओर उंगली दिखाते और कहते हुए दिखाया गया है कि, 'ठीक है, आप...वहां... आप सीएम हैं। आपका नाम क्या है? यह कार्टून तब बनाया गया था, जब इंदिरा गांधी ने आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री के लिए एक खोज अभियान चलाया था। 


दरअसल, उस वक्त राजीव गांधी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री टी अंजैया को सार्वजनिक तौर पर इसलिए अपमानित किया था कि उन्होंने हैदराबाद के बेगमपेट हवाई अड्डे पर कांग्रेस नेता का असाधारण ढंग से स्वागत किया था। उससे राजीव गांधी इतने नाराज हुए कि उन्होंने दिल्ली लौटकर अपनी मां से अंजैया को बर्खास्त करा दिया। 

उस घटना की वजह से न केवल कांग्रेस ने कम पहचान वाले मुख्यमंत्रियों को नियुक्त करना शुरू किया, बल्कि उससे तेलुगू स्वाभिमान आंदोलन भी शुरू हुआ, जिसमें एनटी रामाराव एक नेता के तौर पर उभरे और आखिरकार 1983 में उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के लिए तेलुगू देशम पार्टी का गठन किया।

शीघ्र फैसले लेने के लिए जानी जाने वाली भाजपा ने तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों के एलान करने में काफी समय लगाया। आखिरकार जब मुख्यमंत्रियों और उनके दो उप मुख्यमंत्रियों के नाम सामने आए, तो कम ही लोग थे, जिन्होंने कभी मोहन यादव, भजन लाल शर्मा या विष्णु देव साय का नाम सुना था। 

टेलीविजन पर यह खबर देखने के बाद गूगल पर इनके नामों की खूब खोज की गई। इनके अलावा, राजेंद्र शुक्ला, जगदीश देवडा, दीया कुमारी, प्रेम चंद बैरवा, विजय शर्मा और अरुण साव के नामों के साथ भी यही हुआ, जो सभी इन तीनों राज्यों के अनाम से नेता हैं। हैरत की बात है कि भाजपा ने भी उसी रास्ते का अनुसरण किया है, जो इंदिरा गांधी ने चार दशक पहले चुना था। 

इतिहास गवाह है कि यह इंदिरा गांधी के सत्तावादी तरीकों की अभिव्यक्ति थी, लेकिन भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने यह कदम उठाकर पार्टी के भीतर कार्यकर्ताओं और आम जनता को क्या संदेश दिया है? इस सवाल का जवाब देने से पहले मुझे एक और घटना याद आती है।

बात दरअसल 2014 की है, जब लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा ने प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी को अपना उम्मीदवार घोषित किया था, जिनकी मेरी लिखी जीवनी उस वक्त काफी चर्चित हुई थी। तब कई पत्रकारों ने इंटरव्यू वगैरह के लिए मुझसे संपर्क भी किया। इनमें से एक पत्रकार ने मुझसे हुई बातचीत के आधार पर अपनी पत्रिका के कवर पर नरेंद्र मोदी की तस्वीर के साथ मेरे नाम के साथ मेरी टिप्पणी प्रकाशित की, कि 'मोदी कभी भूलते या माफ नहीं करते।' 

नरेंद्र मोदी के बारे में ऐसी बात कहने वाला मैं अकेला नहीं होऊंगा और दुनिया व भारत में भी ऐसे और भी नेता होंगे, जिनके बारे में यह बात कही जा सकती हो। लेकिन आज जबकि शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे की पारी खत्म हो गई है, मुझे प्रधानमंत्री की यही खूबी याद आ रही है। एक स्तर पर देखें तो यह फैसले बिल्कुल निजी दिखते हैं। यह 2011-12 और 2013 की शुरुआत में भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों की सूची में मोदी को चुनौती देने के चौहान और राजे के फैसले पर मोदी का प्रतिशोध भी हो सकता है।

उस वक्त आरएसएस भी असमंजस की स्थिति में था, क्योंकि मोदी के साथ कई शीर्ष नेताओं के व्यक्तिगत मुद्दे सामने आ रहे थे। आखिरकार मोदी प्रधानमंत्री बने और चौहान व राजे 2018 तक अपने राज्यों के मुख्यमंत्री रहे। मार्च, 2020 में चौहान को मुख्यमंत्री के तौर पर वापस लाया गया। वहीं, जब राजस्थान में गहलोत की सरकार गिराने की स्थितियां बन रही थीं, वसुंधरा दूर-दूर ही थीं। हालांकि, मध्य प्रदेश और राजस्थान में करीब दो दशकों तक भाजपा के शीर्ष पर रहे दो नेताओं को दरकिनार करने की वजह केवल निजी मतभेदों को नहीं माना जा सकता। 

इसी तरह, रमन सिंह को एक बार फिर छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री नामित न करने का फैसला इसलिए नहीं लिया गया कि वह भाजपा नेतृत्व की पिछली पीढ़ी के चुने गए व्यक्ति थे। उल्लेखनीय है कि इनमें से किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम न घोषित करने का फैसला तब लिया गया, जब मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा के लिए मुश्किलें और राजस्थान में बराबर की टक्कर बताई जा रही थी। यह दरअसल एक जोखिम था, जो मोदी ने उठाया। 

इन हालात में मोदी-शाह को तीनों राज्यों में नई पीढ़ी के नेतृत्व को आगे बढ़ाने का अवसर दिखा। तीनों राज्यों में भारी जनादेश मिलने के बावजूद भाजपा नेतृत्व ने अपना फैसला नहीं बदला, तब भी, जब कई नवनिर्वाचित विधायक चौहान और राजे के समर्थन में थे। यह बिल्कुल साफ है कि तीनों राज्यों में मोदी के नेतृत्व को समर्थन देने का जनादेश मिला है। यह भी उल्लेखनीय है कि जिन नेताओं को मुख्यमंत्री या उप मुख्यमंत्री पदों के लिए चुना गया है, उनकी आम जनता या पार्टी के भीतर भी कोई खास पकड़ नहीं है।  जाहिर है कि वे मोदी और शाह के आभारी रहेंगे। लेकिन उन्हें चुने जाने के पीछे की वजह सिर्फ उनकी वफादारी नहीं है।

इंदिरा गांधी के कार्टून में जैसे नेताओं को चुना गया, वैसे तो हर राजनीतिक दल में होते हैं। इनका चयन उत्तर भारत के जाति संयोजन को ध्यान में रखते हुए योजनाबद्ध ढंग से किया गया है और कोशिश यही दिखती है कि ऊंची जातियों समेत ओबीसी, दलित और आदिवासी सभी जाति समूहों और इनके भीतर मौजूद वर्गों को भी खुश किया जाए। तीनों राज्यों में भाजपा के पास बहुमत है।

जाहिर है कि सरकार और पार्टी पर नियंत्रण केंद्रीय नेतृत्व का ही होगा। इससे लोकसभा चुनाव के दौरान प्रचार अभियान का बारीकी से प्रबंधन करना मोदी-शाह के लिए सुविधाजनक हो जाएगा। इसके विपरीत कांग्रेस ने पुरानी पीढ़ी को बदलने और नए चेहरों को आगे बढ़ाने का कोई प्रयास नहीं किया, जो चुनावी रण में उत्साह से कूद सकें। जबकि मोदी और शाह ने अपनी राजनीतिक चतुराई से नए नेतृत्व को उभरने का अवसर देकर अपने फायदे के लिए बदलाव लाने के अपने संकल्प का भी प्रदर्शन किया।

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