जातिगत अस्मिता की राजनीति का हश्र : आइडेंटिटी पॉलिटिक्स एक दुधारी तलवार की तरह होती है
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अस्मिता की राजनीति या आइडेंटिटी पॉलिटिक्स एक दुधारी तलवार की तरह होती है। खास तौर से भारत जैसे बहुधार्मिक या बहुजातीय समाज में आप इससे किसी दीर्घकालीन सफलता की उम्मीद नहीं कर सकते। 2019 के लोकसभा चुनावों के नतीजे इसी तरफ इशारा करते हैं। हम सिर्फ उत्तर प्रदेश और बिहार के परिणामों का विश्लेषण करें, तो इसे समझने में सुविधा होगी। इन्हीं दोनों राज्यों में पिछड़े और अनुसूचित जाति की एकता के बल पर पिछले तीन दशकों से मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, कांशीराम और मायावती ने राजनीति की और लंबे समय तक राज्य सत्ता पर कब्जा बनाए रखा।
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अस्मिता की राजनीति या आइडेंटिटी पॉलिटिक्स एक दुधारी तलवार की तरह होती है। खास तौर से भारत जैसे बहुधार्मिक या बहुजातीय समाज में आप इससे किसी दीर्घकालीन सफलता की उम्मीद नहीं कर सकते। 2019 के लोकसभा चुनावों के नतीजे इसी तरफ इशारा करते हैं। हम सिर्फ उत्तर प्रदेश और बिहार के परिणामों का विश्लेषण करें, तो इसे समझने में सुविधा होगी। इन्हीं दोनों राज्यों में पिछड़े और अनुसूचित जाति की एकता के बल पर पिछले तीन दशकों से मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, कांशीराम और मायावती ने राजनीति की और लंबे समय तक राज्य सत्ता पर कब्जा बनाए रखा।
बीती सदी के सत्तर के दशक में गैर कांग्रेसवाद के साथ ही डॉक्टर लोहिया ने अस्मिता की राजनीति की शुरुआत की थी। उनके 'पिछड़ा पाए सौ में साठ' के नारे में पिछड़ों की राजनीति के अंकुर छिपे थे। पर लोहिया के पिछड़े में आज की पिछड़ी जातियां तो थी हीं, उनमें अनुसूचित जातियां भी थीं और स्त्रियां भी। 1967 में जब गैर कांग्रेसवाद की परिकल्पना फलीभूत हुई और उत्तर प्रदेश तथा बिहार में संविद सरकारें बनीं, तो पिछड़ों की राजनीति का एक युग शुरू हुआ।
उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह मुख्यमंत्री बने। शुरू मे वे सिर्फ जाटों के नेता नहीं थे, उनके साथ यादव, कुर्मी, गूजर इत्यादि जातियां भी थीं। इतना जरूर था कि उस दौर का पिछड़ा नेतृत्व अनुसूचित जाति और महिला विरोधी था। बिहार में कर्पूरी ठाकुर और रामसुंदर दास जैसे लोगों के हाथ में नेतृत्व आया, जो किसी एक जाति के नहीं, वृहत्तर पिछड़े समाज के नेता थे।
लोहिया से उलट यह नेतृत्व अनुसूचित जाति और स्त्री विरोधी था। महिला आरक्षण बिल संसद में मुख्य रूप से इन्हीं दोनों के विरोध के कारण पास नहीं हो सका। दोनों का यादव प्रेम इस हद तक बढ़ गया कि दूसरी पिछड़ी जातियां धीरे-धीरे उनसे छिटकती गईं। पिछड़ों में एक मजबूत सामाजिक और आर्थिक आधार वाली कुर्मी जाति ने बिहार में नीतीश कुमार और उत्तर प्रदेश में सोनेलाल पटेल जैसे प्रभावी नेता खड़े कर दिए। नीतीश जातियों के भारतीय यथार्थ को साधते हुए लगातार बिहार की राजनीति की धुरी बने हुए हैं।
उत्तर प्रदेश में संकीर्ण यादव सोच को समझने के लिए एक उदाहरण काफी है। अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री की हैसियत से एक यादव को राज्य लोक सेवा आयोग की कमान सौंपी। उसने अनारक्षित पदों पर तो यादव उम्मीदवार चुने ही, पिछड़ों के लिए आरक्षित पदों पर भी सिर्फ यादव भर दिए। इसलिए जब उसके खिलाफ इलाहाबाद मे छात्र सड़कों पर उतरे, तो उनमें बड़ी संख्या में गैर यादव पिछड़ी जातियों के लड़के-लड़कियां थे। इस चुनाव के दौरान भी जब अखिलेश ने सेना मे अहीर रेजीमेंट खड़ी करने की मांग की, तो निश्चित रूप से दूसरी पिछड़ी जातियों को निराशा ही हुई होगी। कुछ ऐसी ही संकीर्णता का शिकार अनुसूचित जाति आंदोलन भी हुआ।
पहली बार बहुजन समाज पार्टी ने अलग-अलग जातियों के सम्मेलन किए। खास तौर से अनुसूचित जातियों के नायकों की मूर्तियां मुख्य चौराहों पर लगाई गईं। इनके पीछे छिपी मंशा जातिगत चेतना को हवा देकर बसपा का वोट बैंक बनाना था। मायावती ने स्पष्ट कहा कि बसपा का अध्यक्ष कोई जाटव जाति का व्यक्ति ही हो सकता है। वह भूल गईं कि गैर जाटव अनुसूचित जातियां मिलकर जाटवों से अधिक हो जाएंगी। भाजपा ने इसी अंतर्विरोध का लाभ उठाया।
अनुसूचित जातियों में पासी, वाल्मीकि, धोबी, खटिक, मुसहर और दुसाध आदि जाटवों से सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक क्षेत्रों में पिछड़े हैं। होना यह चाहिए था कि इन्हें भी नेतृत्व और सरकारी नौकरियों में जगह मिलती, पर ऐसा नहीं हुआ। संघ परिवार ने चतुराई से इन अंतर्विरोधों को भुनाया। 2014 के चुनावों तक मुलायम या लालू परिवार समस्त पिछड़ों के नहीं, बल्कि सिर्फ यादवों के नेता रह गए।
यह तय हो जाने के बाद कि मुलायम और लालू सिर्फ यादवों के नेता हैं, शेष पिछड़ों को भाजपा में जाने में दिक्कत नहीं हुई। लगभग यही परिदृश्य अनुसूचित जाति की राजनीति का है। मायावती अब सिर्फ जाटवों की नेता हैं, शेष अनुसूचित जातियां भाजपा के खेमे में हैं ।
2014 और 2019 के चुनावों में मोदी की सफलता के पीछे यह एक बड़ा कारण है और इससे अस्मिता की राजनीति पर एक नया विमर्श शुरू हो सकता है। इसकी शुरुआत भाजपा करेगी आरक्षण के लिए पिछड़ों में अति पिछड़े और दलितों में महादलित का बंटवारा करके। क्या लोकतांत्रिक शक्तियों को हस्तक्षेप कर एक ऐसे विमर्श की शुरुआत नहीं करनी चाहिए, जो आंबेडकर के सपने 'जातियों के समूलोच्छेदन' की बात सोचे?