पुतला जलाने की राजनीति
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साधो, फलां पार्टी ने अलां पार्टी का पुतला फूंका। इधर पुतला जला और उधर राजनीति की लपटें सातवें आसमान पर। आज के जमाने में पुतले और राजनीति का अटूट संबंध है। रामलीला में असल रावण पकड़ में नहीं आता, तब उसका पुतला फूंका जाता है। पुतला फूंकना एक राजनीतिक अनुष्ठान है, जिसे करने का कोई मुहूर्त नहीं होता। जब जी चाहे, पुतला बनाओ और झट उसे आग के हवाले कर दो। सबसे सस्ता और जल्दी किया जाने वाला राजनीतिक कर्म,जिसमें हर्र लगे न फिटकरी, रंग चोखा। कागज-फूस इकट्ठा कर अखबार वालों को खबर दी और कैमरों के सामने दहन की प्रक्रिया संपन्न। पुतला और उसे जलाने वाले, दोनों सुर्खियों में। पुतला जलाने वालों की आंखों में पुतले के प्रति कोई रोष नहीं होता। वे हंसते-मुस्कराते पुतला जलाते हैं, गोया जन्मदिन का केक काट रहे हों। पुतले बनाने वाले कला बोध से रहित होते हैं। पता ही नहीं लगता कि जिसका पुतला जलाया जा रहा है, वह व्यक्ति कौन है। सारे पुतले एक जैसे।
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एक समय पुतले का जलना अपशकुन समझा जाता था, पर आज वह प्रतिष्ठा और लोकप्रियता का सुबूत बन गया है। अरे, कैसे नेता हो, अब तक तुम्हारा पुतला नहीं जला? एक व्यक्ति ने अपने दस पुतले खुद पैसे देकर जलवाए। अगले वर्ष वह सभासद हो गया।
पुतले सही अर्थों में पार्टी निरपेक्ष होते हैं। मैं कभी-कभी सोचता हूं कि जिस व्यक्ति का पुतला जलाया जा रहा है, वह सामने आ जाए, तब जलाने वाले क्या करेंगे? क्या वे पुतले को छोड़कर उसे जलाने के लिए तत्पर होंगे, जिसके पुतले को आग के हवाले कर रहे हैं? एक बार मंत्री का पुतला जलाने के लिए चौराहे पर रखा गया, तभी पुलिस उसे छीनकर थाने ले गई। अगले दिन अखबार में छपा, मंत्री महोदय हवालात में बंद। पुतले के चक्कर में दारोगा को लेने के देने पड़ गए। दक्षिण में एक बार पुतला जलाने वालों की लुंगी में ही आग लग गई थी। यानी पुतला जलाने की राजनीति कई बार खतरनाक भी हो जाती है।