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अर्थशास्त्र पर हावी राजनीति

Mon, 01 Apr 2019 06:24 PM IST
Raman Singh मधुरेन्द्र सिन्हा
मधुरेन्द्र सिन्हा Published by: Raman Singh Updated Mon, 01 Apr 2019 06:24 PM IST
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Politics dominating economics
मधुरेन्द्र सिन्हा

पिछले कुछ दशकों से भारतीय राजनीति में एक खास बात देखने में आ रही है और वह है सरकारी खजाने से वोटरों को लुभाने-ललचाने का प्रयास। उसी कड़ी में है कांग्रेस की न्यूनतम आय गारंटी योजना, जिसके तहत 12,000 रुपये सालाना कमाने वाले परिवार को 6,000 रुपये प्रति माह यानी 72,000 रुपये सालाना मिलेंगे। भारत में प्रोत्साहन, सब्सिडी, उपहारों की चुनाव के दौरान घोषणा होती रहती है और क्षत्रप हमेशा इसमें आगे रहते हैं, क्योंकि उनके लिए वोट राजस्व से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। यह पहला मौका है कि अर्थशास्त्रियों से भरी हुई कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष ने ऐसी बड़ी घोषणा की है कि सभी हैरान हैं, क्योंकि इससे देश पर लगभग 3.60 लाख करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि जब एनडीए सरकार ने छोटे और सीमांत किसानों के लिए सालाना 75,000 करोड़ रुपये देने की घोषणा की थी, तो पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने इसे किसानों को दी जाने वाली रिश्वत बताया था।


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तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन ने मिड डे मील और सस्ता चावल गरीबों को देने की योजना बनाई थी, जिससे राज्य में कोई भूखा नहीं रह सके। इसके बाद कई राज्य इसके नक्शे कदम पर चलते हुए और आगे बढ़ गए। इंदिरा गांधी ने 1971 में गरीबी हटाओ का नारा दिया। पर इसके लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं रखा। पांचवीं पंचवर्षीय योजना में इसकी चर्चा तो की गई, पर कहा गया कि देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर, कृषि वगैरह को बढ़ावा दिया जाएगा, ताकि समृद्धि आए। यह टिकलिंग इफेक्ट की अवधारणा का हिस्सा था, यानी ऊपर के तल पर पर समृद्धि आने से उसका कुछ हिस्सा रिसकर नीचे भी जाएगा। यह सिलसिला चलता रहा और गरीबी दूर नहीं हुई। इसके बाद देश की राजनीति में क्षत्रपों का वर्चस्व बढ़ता गया और वोट बैंक की राजनीति के तहत लोगों को लुभावने वादे किए जाने लगे। दक्षिण भारत इस मामले में आगे रहा और वहां बड़े पैमाने पर उपहार आदि की घोषणा की जाती रही। उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार ने छात्रों को लैपटॉप तथा नीतीश कुमार ने बिहार में लड़कियों को साइकिल बांटी। पर नकद बांटने की बात किसी ने कभी नहीं की। नकदी यदि बंट रही थी, तो चुपचाप और वह भी पार्टियों द्वारा।

इस देश में कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य पर हम आज भी बहुत कम खर्च करते हैं और गैर उत्पादक योजनाओं में काफी बड़ी राशि खर्च करते हैं। आज भी कई तरह की सब्सिडी दी जा रही है, जिसका असर राजस्व घाटे पर पड़ता है। अगर कांग्रेस यह योजना लागू करती है तो राजस्व घाटा नई ऊंचाइयों पर चला जाएगा। ऐसा भी हो सकता है कि एनडीए सरकार द्वारा शुरू की गई कई योजनाएं खत्म कर दी जाएं। यहां पर मनरेगा का जिक्र होता है, लेकिन वह एक बढ़िया स्कीम साबित हुई है, खासकर उन राज्यों में जहां ग्रामीण मजदूरों को धन के अभाव से जूझना पड़ता था।

अभी तो यह देखना है कि इसके आर्थिक प्रभाव क्या हो सकते हैं? एक और बात है कि बिना किसी तरह के डाटा के यह योजना लागू कैसे होगी? भारतीय अर्थव्यवस्था आज भी नकद आधारित है और यह पता लगाना, कि किसकी न्यूनतम आय कितनी है, टेढी खीर है, क्योंकि छोटे भुगतान नकद के जरिये ही होते हैं। दुकानों, छोटे होटलों, घरों, खेत-खलिहानों, लघु उद्योगों वगैरह में काम करने वालों की आय का आंकड़ा कैसे मिलेगा? लाखों रिक्शा चालकों की आय का आंकड़ा कहां से मिलेगा? इनकी आय तो घटती-बढ़ती ही रहती है। देश में न्यूनतम मजदूरी औसतन 300 से 400 रुपये प्रतिदिन है और महीने में यह 9,000 रुपये से भी कहीं ज्यादा होगी, लेकिन यह सारा पारिश्रमिक नकद में ही दिया जाता है। फिर दोहराव को कैसे रोका जाएगा? इसमें कई पेच हैं, जिनके बारे में अभी स्पष्टता नहीं है। फिलहाल तो यह कागजी ही है।

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