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राजनय पर भारी राजनीति
चिंतामणि महापात्र
Updated Tue, 01 Oct 2013 07:48 PM IST
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चलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को थोड़ा-सा ही सही, लेकिन खुश होने का मौका तो मिला। देश के भीतर भले ही उनकी अलोकप्रियता में लगातार बढ़ोतरी हो रही हो, कूटनीतिक माहौल में संपन्न हुई उनकी हालिया अमेरिका यात्रा में तारीफ बटोरने की उनकी कोशिशें कुछ हद तक कामयाब जरूर कही जा सकती हैं।
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अमेरिका की यह उनकी तीसरी यात्रा है और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ बतौर प्रधानमंत्री शायद यह उनकी अंतिम बैठक साबित हो सकती है। इसके अलावा, यह उनके लिए अंतिम मौका भी था, जब उन्हें संयुक्त राष्ट्र महासभा की 68वीं बैठक में बहुआयामी कूटनीतिक वार्ताओं को नई दिशा देने का अवसर मिला।
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मनमोहन सिंह ने एक ऐसे माहौल में ह्वाइट हाउस में प्रवेश किया, जब पूरी दुनिया लगभग आश्वस्त थी कि भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक सहयोग अपनी चमक खो चुका है। इसकी वजहें भी थीं। असैन्य नाभिकीय समझौते के क्रियान्वयन की सुस्त चाल, भारत की संरक्षणवादी आर्थिक नीतियों के खिलाफ अमेरिकी कंपनियों की शिकायतें, पेटेंट नियमों की शिथिलता, विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजारों में अपर्याप्त खुलापन, अमेरिका के प्रस्तावित अप्रवासन विधेयक को लेकर भारतीय आईटी कंपनियों की आपत्तियां और ओबामा की भारत यात्रा के दौरान किए गए वायदों को पूरा करने में अमेरिका की ओर से दिखाई गई लापरवाही जैसी वजहों ने इस संदेह को पुख्ता किया कि दोनों देशों के बीच का सामरिक सहयोग अपनी दिशा से पूरी तरह भटक चुका है।
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लेकिन अगर सूझबूझ हो, तो किसी घटना को कई नजरियों से देखा जा सकता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी यही किया। तमाम अड़चनों को दरकिनार कर वह इस बात का उल्लेख करना नहीं भूले कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जो बिडेन और विदेश मंत्री जॉन केरी की हालिया भारत यात्रा और भारत के वित्त मंत्री पी. चिदंबरम और वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा की अमेरिका यात्रा ने दोनों देशों के बीच रिश्तों को किस तरह सकारात्मक ढंग से प्रभावित किया। उनके मुताबिक, ओबामा के साथ उनकी बैठक के नतीजे बेशक तुरंत सामने न आएं, पर इसका यह मतलब नहीं निकालना चाहिए कि भारत-अमेरिका संबंधों में किसी तरह का अवरोध आ गया है।
गुजरात में असैन्य नाभिकीय रिएक्टर की स्थापना के लिए जिस प्राथमिक संधि पर हस्ताक्षर हुए हैं, वह अपन-आप में महत्वपूर्ण है, हालांकि इसके अस्तित्व में आने से पहले काफी कुछ किया जाना बाकी है। मनमोहन सिंह की इस यात्रा के दौरान सैन्य उपकरणों के सह-उत्पादन और विकास को बढ़ावा देने के लिए दोनों देशों के मध्य जिस रक्षा समझौते को अंतिम रूप दिया गया है, उससे भी भविष्य में काफी उम्मीदें की जा सकती हैं। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता और नाभिकीय आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) जैसे निकायों के संदर्भ में भारत की खास स्थिति को लेकर अमेरिका ने जिस तरह से अपने समर्थन को दोहराया है, उसे कम करके नहीं आंका जा सकता है।
2014 के बाद अफगानिस्तान के परिदृश्य पर भी ओबामा और मनमोहन के बीच महत्वपूर्ण वार्ता हुई। आतंकवाद को लेकर दोनों देशों के बीच सहयोग में हाल के वर्षों में प्रगाढ़ता आई है। अफगानी तालिबान की भूमिका और पाकिस्तान की अफगान नीति की दिशा को लेकर व्याप्त संशय, अफगानिस्तान में भारतीय निवेश की सुरक्षा और किसी भी तरह के अतिवाद से बचने के लिए यह बेहद जरूरी है कि भारत और अमेरिका के बीच सैन्य सहयोग ज्यादा से ज्यादा मजबूत होता जाए।
भले ही मनमोहन-ओबामा की इस बैठक का कोई क्रांतिकारी परिणाम नहीं निकला हो, फिर भी इसका महत्व है। चाहे अमेरिका का अप्रवासन विधेयक हो, 2014 के बाद अफगानिस्तान का परिदृश्य हो, जलवायु परिवर्तन, दोहा वार्ता, सीरिया संकट या ईरान के नाभिकीय मसले से जुड़ा मुद्दा हो, दोनों देशों के बीच मतभेद हो सकते हैं। पर ऐसी उच्च स्तरीय बैठकें मतभेदों की पहचान करने और उनके समाधान ढूंढने में तो कारगर साबित हो ही सकती हैं।
अमेरिका यात्रा के दौरान कई अन्य उपलब्धियां भी मनमोहन सिंह के हिस्से में आईं। चाहे वह संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिया गया उनका व्याख्यान हो, नवाज शरीफ के साथ हुई वार्ता हो और चाहे इब्सा व ब्रिक्स देशों के साथ मिलकर जारी किया गया संयुक्त घोषणा पत्र हो, भारत के लिए इन सबका महत्व है।
जम्मू और श्रीनगर में हुए आतंकवादी हमलों के बाद मनमोहन-शरीफ की वार्ता से बहुत ज्यादा उम्मीदें तो वैसे भी नहीं थीं। हालांकि दोनों प्रधानमंत्रियों ने इस बात पर सहमति जरूर जताई कि दोनों देशों के बीच किसी भी तरह की वार्ता से पहले जरूरी है कि नियंत्रण रेखा पर शांति बहाल हो। दोनों देशों के रिश्तों में आई तल्खी को मिटाने की दिशा में यह सहमति एक सार्थक हो सकती है।
कुछ भी हो, भारत के अंदरूनी हालात पर पूरी दुनिया की नजर है। दरअसल, वैश्विक समुदाय के सम्मुख भारत की कूटनीतिक स्थिति कहीं न कहीं घरेलू स्तर पर उसकी राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक प्रदर्शन पर निर्भर करती है। इसमें संदेह नहीं कि भारत में भ्रष्टाचार चरम पर है, राजनीतिक अड़चनें आर्थिक सुधारों को रोक रही हैं और कांग्रेस पार्टी के अंदरूनी मतभेद भी सामने आने लगे हैं, जैसा कि अध्यादेश के मामले में देखने को मिला। ऐसे में मनमोहन सिंह अमेरिका में कुछ हद तक कामयाब भी हुए, पर इससे देश में उनकी स्थिति पर शायद ही कोई फर्क पड़े।