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फौज पर सियासत के छींटे

Tue, 06 Dec 2016 08:10 PM IST
अरुणेंद्र नाथ वर्मा
अरुणेंद्र नाथ वर्मा Updated Tue, 06 Dec 2016 08:10 PM IST
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Political splatter on Army
अरुणेंद्र नाथ वर्मा

पिछले दिनों जम्मू में नगरौटा के सैन्य शिविर पर घात लगाकर हमला करने वाले आतंकवादी तो मारे गए, पर इतने सारे सैनिकों की अकारण बलि से सारा देश क्षुब्ध है। एक महत्वपूर्ण सैन्य शिविर होने के बावजूद वहां मुख्य प्रवेश द्वार पर सुरक्षा की विशेष व्यवस्था नहीं थी। शिविर की सुरक्षा व्यवस्था कितनी चाक-चौबंद थी, सेना इसकी पड़ताल कर रही है। पर क्या इस एक चूक के कारण यह देश सेना और अर्धसैन्य बलों के गौरवमय इतिहास को भूल सकता है? कश्मीर पर कबाइलियों के वेश में पाक सेना के हमले से लेकर भारत-पाक युद्धों और कारगिल संघर्ष तक भारतीय सेना ने पाकिस्तान को बार-बार नाकों चने चबाने को मजबूर किया है। बांग्लादेश की स्थापना से अपने विखंडित होने और नब्बे हजार से भी अधिक सैनिकों के युद्धबंदी बन जाने के अपमान को पाकिस्तान भूल नहीं पा रहा। भारत को नुकसान पहुंचाने के लिए सीमापार आतंकवाद को दशकों से हवा-पानी देना उसके इसी इरादे का सबूत है। थक-हारकर भारत भी इस निर्णय पर पहुंचा है कि ईंट का जवाब पत्थर से मिलने पर ही जनरलों की गिरफ्त में बंद पाकिस्तान की कथित लोकतांत्रिक सरकार नापाक हरकतों से बाज आएगी। इस कठिन निर्णय के बाद जरूरी है कि पूरा देश एकजुट हो और सेना का मनोबल ऊंचा बनाए रखे।

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सेना ने हर राष्ट्रीय संकट में अपना जौहर दिखाया है। सुनामी, बाढ़ और भूकंप में भी सेना अपनी अथक कर्तव्यशीलता का परिचय देती आई है। नागरिक प्रशासन भी काननू-व्यवस्था बनाए रखने में अक्षम होकर अक्सर सैन्य सहायता की गुहार लगाता रहता है। तमाम एशियाई देशों में लोकतांत्रिक सरकारों का तख्ता पलट करके फौजी हुकूमतों की स्थापना के बीच भारतीय सेना राजनीतिक तटस्थता और कर्तव्यपरायणता की मिसाल है।
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इस संदर्भ में देश के राजनीतिक दल भी सेना को तटस्थ बनाए रखने में सहयोग देते आए हैं। पर दुर्भाग्य से अब सेना और सैनिकों को लेकर भी राजनीति होने लगी है। इसके लिए सत्ता पक्ष भी दोषी है और विपक्ष भी। सत्ता पक्ष ने सर्जिकल स्ट्राइक को सैन्य शौर्य के रूप में पेश करने के बजाय अपनी पीठ थपथपा कर सारा श्रेय स्वयं हड़प जाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई है। लोकसभा चुनाव के पहले से ही एक रैंक-एक पेंशन की मांग पूरी करने के वायदे से भाजपा ने सैनिकों के बीच अपनी छवि चमकानी शुरू कर दी थी। अब यह मांग लगभग पूरी कर दी गई है, तो विपक्षी दलों को खतरा महसूस हो रहा है कि लाखों कार्यरत सैनिकों और उनके परिवारों के बीच कहीं भाजपा की लोकप्रियता न बढ़ जाए। अतः वे भी सैनिकों में सरकार की तरफ से असंतोष पैदा करने की घटिया राजनीति पर उतरने से बाज नहीं आ रहे हैं। जो गौरवमयी सेना देश की रक्षा के लिए रात-दिन कंधों पर बंदूक रखे रहती है, उसके निरीह कंधों पर अपनी बंदूकें रखकर राजनीतिक दलों का अपने विरोधियों पर निशाना साधना गलत है।
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समय आ गया है कि सेना स्वयं राजनीतिक दलों से आग्रह करे कि वे अपनी राजनीति में उसे घसीटने से बख्शें। फिर चाहे प्रधानमंत्री हों, जो सेना की सर्जिकल स्ट्राइक को अपनी ताकत बताते हों या ममता बनर्जी हों, जो फौज के रूटीन अभ्यास को अपनी कुर्सी हिलाने की साजिश बताती हों या राहुल गांधी हों, जो अचानक सामरिक नीतियों के विशेषज्ञ बनकर सेना को स्पष्ट दिशा-निर्देश न देने की तोहमत सरकार पर लगाते हों।

-लेखक वायुसेना के पूर्व विंग कमांडर हैं

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