सर्जिकल स्ट्राइक का सियासी असर

नीरजा चौधरी Updated Fri, 07 Oct 2016 07:53 PM IST
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यह चाहे सायास था या अनायास, लेकिन हाल ही में भारतीय सेना द्वारा सीमा पार की गई सर्जिकल स्ट्राइक का उत्तर प्रदेश और गुजरात में भारी असर साफ महसूस किया जा सकता है, जहां विधानसभा के चुनाव होने हैं। ये दोनों ऐसे राज्य हैं, जिनका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए खास महत्व है। गुजरात प्रधानमंत्री का गृह राज्य है, इसलिए वहां जीत या हार का श्रेय उन्हें ही जाएगा, साथ ही सीमावर्ती राज्य होने के कारण पाकिस्तान के साथ किसी भी तरह के तनाव का भी यहां असर पड़ेगा। अतीत में जब भी पाकिस्तान को कोसा गया है, भारतीय जनता पार्टी को भारी चुनावी फायदा मिला है। कहने की जरूरत नहीं कि उत्तर प्रदेश ही यह तय करेगा कि भाजपा 2019 में दिल्ली की गद्दी पर फिर से कब्जा कर सकती है या नहीं।
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जाहिर है, पाकिस्तान के खिलाफ 'निर्णायक' कार्रवाई करने के लिए अपने कट्टर समर्थकों के साथ देश भर के लोगों का प्रधानमंत्री पर काफी दबाव था। भारत के खिलाफ आतंकी कार्रवाई को मंजूरी दने वाले पाकिस्तान के खिलाफ पूरे देश की भावना सख्त होती जा रही है, जबकि पिछले कुछ महीने तक प्रधानमंत्री मोदी ने उसके साथ बेहतर रिश्ते बनाने की पहल की थी। आखिरकार वह मोदी ही थे, जिन्होंने प्रधानमंत्री बनने से पहले 2013 में जब एक भारतीय जवान का सिर काट दिया गया था, तब कहा था कि भारत को पाकिस्तान के साथ 'उसी भाषा में बात करनी चाहिए, जिसे वह समझता है', न कि उसे 'प्रेमपत्र' भेजना चाहिए।
पाक समर्थित आतंकवादियों द्वारा पठानकोट की तरह उड़ी में भारतीय सैन्य शिविर पर किए गए हमले ने भारत के आक्रोश को भड़काने का काम किया। देश के लोग पाकिस्तान की आतंकी कार्रवाइयों से आजिज आ गए क्योंकि उन्हें लग रहा था कि जाने किन वजहों से भारतीय नेतृत्व 'निर्णायक' कार्रवाई नहीं कर रहा है।
स्वाभाविक रूप से मोदी को भी एहसास हुआ कि पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कूटनीतिक पहल ही लोगों के क्रोध को शांत करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यहां तक कि इस्लामाबाद में प्रस्तावित सार्क शिखर सम्मेलन को रद्द करवाने के लिए भारत ने दूसरे सदस्य देशों का समर्थन तक जुटाया, अमेरिका और रूस ने उड़ी के आतंकी हमले की निंदा की और प्रधानमंत्री ने सिंधु जल संधि और मोस्ट फेवर्ड नेशन के दर्जे पर पुनर्विचार करने की बात तक की। इसके पीछे विचार यही था कि पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ें और वह भारत के खिलाफ आतंकी गुटों का समर्थन खत्म करे। इसके साथ ही प्रधानमंत्री की एक 'दमदार नेता'की छवि भी दांव पर थी। इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने देश दुनिया के सामने जाकर यह घोषणा करने का फैसला किया कि भारतीय सेना ने सीमा पार जाकर सर्जिकल स्ट्राइक की है। इससे पहले भी भारतीय सेना ने नियंत्रण रेखा के पार जाकर छोटे हमले किए हैं, लेकिन पहली बार खुद डीजीएमओ ने सर्जिरल स्ट्राइक की सार्वजनिक तौर पर जानकारी दी। उन्होंने यह भी बाताया कि इस पूरी कार्रवाई की फिल्म भी तैयार की गई है।

तथ्य यह है कि मोदी अब भी भाजपा के सबसे कद्दावर नेता हैं और राज्य विधानसभा के चुनावों में भी वोट खींचने की क्षमता रखते हैं, यही वजह है कि पार्टी उत्तर प्रदेश और गुजरात में उनका व्यापक इस्तेमाल करेगी। दरअसल पार्टी उनकी छवि को किसी तरह के नुकसान को बर्दाश्त नहीं कर सकती थी, जिसकी शुरुआत हो चुकी थी। वैसे भी लोग प्रधानमंत्री की सिर्फ 'अच्छी बातों' से निराश हो चले थे, क्योंकि उन्हें जिन जमीनी बदलाव की उम्मीद थी, वह नहीं हो रहा था। मोदी ने अब दिखा दिया है कि वह सख्त फैसले लेने में सक्षम हैं।

तथ्य यह है कि उनकी दमदार नेता के प्रति देश की जो प्रबल भावना थी, जिसकी वजह से वह 2014 में सत्ता में आए, वह रिसने लगी थी। लोग हर जगह निर्णायक नेता चाहते हैं और यही कारण है कि मौजूदा माहौल में तमाम कोशिशों के बावजूद राहुल गांधी लोगों का दिल नहीं जीत पाए हैं। 2019 में मोदी के प्रतिद्वंद्वी के तौर पर नीतीश कुमार को भी देखा जा रहा था, मगर शहाबुद्दीन प्रकरण से वह भी मुश्किलों में घिर गए हैं। अखिलेश यादव ने मुख्य सचिव को बाहर का दरवाजा दिखाकर दम दिखाया था, मगर उन्हें भी भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे मंत्रियों को वापस लेना पड़ा।

इस स्ट्राइक ने भाजपा कार्यकर्ताओं में ताजा जोश भरा है, जिससे आगामी चुनावों में भाजपा को फायदा होगा। मोदी सरकार के ढाई वर्षों के कार्यकाल के दौरान पार्टी कार्यकर्ता थकान का सामना कर रहे थे। इस वर्ष असम में मिली जीत को छोड़ दें, तो विभिन्न कारणों से पार्टी कार्यकर्ताओं का मोहभंग होना शुरू हो गया था। इस सर्जिकल स्ट्राइक का सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश के चुनावों पर पड़ने की संभावना है और फिर गुजरात चुनाव पर, क्योंकि वह सीमावर्ती राज्य है। कई लोगों का मानना है कि अगर मुलायम सिंह यादव सहयोग करते हैं, तो भाजपा आलाकमान एक महीने में चुनाव करवाने की कोशिश करेंगे, ताकि देश की मौजूदा भावना का लाभ उठाया जाए, क्योंकि सरकार के कदम का सभी दलों ने समर्थन किया है। शुरू में बसपा दौड़ में आगे दिख रही थी, लेकिन बाद में मायावती धारणा के मोर्चे पर पिछड़ गई, क्योंकि उसके कई वरिष्ठ नेता पार्टी से निकल गए, जिनमें से कई भाजपा में शामिल हो गए। 'राष्ट्रवाद' का ऐसा मुद्दा सामने है, जिसके कारण भाजपा आसानी से गंगा के मैदानी इलाकों का गढ़ जीत सकती है, जिसके बहुत से लोग मुरीद हैं। हालांकि कोई भी निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन ताजा घटना उत्तर प्रदेश चुनाव की महत्वपूर्ण बहसों- दलितों का मुद्दा, भाजपा से नाराजगी, बसपा के साथ दलित-मुस्लिम गठजोड़ की संभावना आदि को पृष्ठभूमि में डाल दिया है। कम से कम खेल का पहला चरण तो नरेंद्र मोदी ने जीत लिया है, हालांकि स्पष्ट रूप से खेल खत्म नहीं हुआ है।
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