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दावोस में राजनीतिक चर्चा

Sun, 27 Jan 2019 06:14 PM IST
Nootan Gupta तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Published by: Nootan Gupta Updated Sun, 27 Jan 2019 06:14 PM IST
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Political discussions in Davos
तवलीन सिंह
दावोस के बाजार में इस साल भारत की कोई चीज हर मोड़ पर दिखी। सभागृह के एक द्वार के ऊपर हमारे प्रधानमंत्री का एक बड़ा-सा पोस्टर दिखा, जिस पर उनके चमकते चेहरे के साथ गौरवान्वित करने वाला एक संदेश था। भारत विश्व की ट्रिलियन डॉलर डिजिटल अर्थव्यवस्था बनने की ओर तेजी से बढ़ रहा है।

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ऐसा हो न हो, वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के इस वार्षिक सम्मेलन में भाग लेने दुनिया के जो सबसे धनवान लोग आए थे, उन्होंने भारत को याद जरूर किया होगा। कुछ दूरी पर एक पूरे रेस्टोरेंट को आंध्र प्रदेश सरकार ने लेकर उसमें अपने यहां की सुगंध भर दी है। जिस दिन मैं वहां गई, उस दिन भोजन में हैदराबादी बिरयानी थी और आंध्र के तीखे मसालों की महक इस पहाड़ी नगर की बर्फीली हवाओं में व्याप्त थी। इस रेस्टोरेंट से थोड़ा आगे भारत निवेश केंद्र था।

पंजाब सरकार के मंत्री और अधिकारी भी बर्फ से ढके बाजार में घूमते दिखे। पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत बदल ने कहा, ‘पहली बार पंजाब सरकार के प्रतिनिधि डावोस आए हैं।’ राजनीतिक उपस्थिति के अलावा जगह-जगह टाटा, इन्फोसिस और विप्रो जैसी बड़ी भारतीय कंपनियों के अड्डे दिखे।

सभागृह के अंदर लेकिन भारत तकरीबन अदृश्य रहा। पिछले वर्ष चूंकि नरेंद्र मोदी स्वयं इस सम्मेलन को संबोधित करने आए थे, इसलिए भारत पर काफी चर्चे हुए। इस वर्ष मुश्किल से एक दो ही थे। भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने भारत के गुण गाने के दिल लगाकर प्रयास किए। उन्होंने नोटबंदी और जीएसटी के बारे में विदेशी निवेशकों को बताया, मोदी सरकार की डिजिटल उपलब्धियों के बारे में बताया और यह भी कहा कि पिछले चार वर्षों में तूफानी अंदाज में परिवर्तन आया है।

वहां मैंने पाया कि डिजिटल क्रांति की बातें सुनने के बाद लोगों ने पूछा कि ऐसा क्यों लगता है कि इतना बड़ा डिजिटल कमाल होने के बाद भी भारत में वह परिवर्तन नहीं आया है, जिसकी दुनिया को उम्मीद थी। अधिकारियों ने इस बारे में विश्वास दिलाने की कोशिश की, लेकिन वे नाकाम रहे।

हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी भारतीय उद्योग जगत के कई महारथी दावोस में पहुंचे हुए थे, लेकिन मैंने जब उनके साथ आर्थिक विषयों पर बात करने की कोशिश की, तो उन्होंने आगामी लोकसभा चुनाव के बारे में अपनी राय देना पसंद किया। वे सहमत थे कि पिछले वर्ष तक तो मोदी का दोबारा प्रधानमंत्री बनना सौ फीसदी तय था, पर अब तय नहीं है कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा। जहां भी दो भारतीय मिले, वहीं आनेवाले चुनाव की बात होने लगती थी।

अभी ये बातें चल ही रही थीं कि हमें इस बात की खबर मिली कि प्रियंका वाड्रा ने सक्रिय राजनीति में कदम रखने का निर्णय ले लिया है। इसका लाभ कांग्रेस को होगा या मोदी को, अभी कोई कह नहीं सकता है। एक तरफ प्रियंका के आने से कांग्रेस में नई ऊर्जा भरने का काम हो सकता है। दूसरी तरफ मोदी का वंशवाद और कामदारों का विरोध मजबूत हो सकता है।

मैं इतना जरूर कह सकती हूं कि इस वर्ष दावोस में भारत की आर्थिक शक्ति बनने की बातें कम और भारत के राजनीतिक भविष्य की बातें ज्यादा हुईं। हो भी क्यों न, जब आनेवाला चुनाव अब आम न रहकर बहुत ही खास हो गया है। इस चुनाव के परिणाम ही यह तय करेंगे कि भारत मोदी की दिखाई गई नई दिशा की तरफ बढ़ेगा या उस पुरानी दिशा में वापस जाएगा, जहां वही राजनेता दिखेंगे, जिनकी राजनीति में आने का आधार अपना परिवार है।
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