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कवि कूद जाए?
यशवंत व्यास/अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sun, 23 Mar 2014 12:02 AM IST
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कवि भाजपा में जाने की सोच रहा है।
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वैसे तो कवि कहीं नहीं जाता और, वैसे कहीं भी जा सकता है। वह मां पर लंबी कविता लिखकर लंबी तानकर सो सकता है। वह रोटियों की गंध पर श्रृंखला लिखकर कुत्तों को भगाने में व्यस्त हो सकता है। पर मोटे तौर पर उसे लगता है कि क्रांति के लिए उसका कवि होना अधिक जरूरी है। एक बार उसने रिश्वत के रुपये लिए तो आवारा पूंजी पर कविता लिखी। एक बार वह सस्पेंड होते-होते बचा, तो उसने व्यवस्था के निर्मम स्वरूप पर लंबी कविता सीरीज देश को दी।
वह मानता है कि वह अंतत: मनुष्य है, अत: कवि की शुद्ध नैतिकता और नौकरी के दौरान प्रयुक्त धूर्तता के बीच कोई अन्तर्विरोध नहीं है। जब वह कवि होता है तो कवि होता है, जब वह मनुष्य होता है तो सिर्फ भारत राष्ट्र का शुद्ध नागरिक होता है। शुद्ध नागरिक को जीने के लिए जो-जो करना चाहिए वह करता है और शुद्ध कवि को उठने के लिए जो-जो करना चाहिए वह बरतता है।
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वह भाजपा में क्यों जाना चाहता है, जबकि उसे सारे इनाम कांग्रेस के राज में मिले हैं? वह भाजपा में क्यों जाना चाहता है, जबकि अकादमियों में एन्ट्री का रास्ता भाजपा से होकर कभी गया ही नहीं। वह भाजपा में क्यों जाना चाहता है, जबकि उसे चाय की बजाय रम की गुमटी चर्चा में ज्यादा संभावनाएं प्रतीत होती रही हैं? वह भाजपा में क्यों जाना चाहता है, जबकि उसकी फूंकी हुई तमाम बीड़ियों का धुआं आदिवासियों के एकत्र किए हुए कुल तेंदू पत्तों में मानव संसाधन विभाग के बजट का गुणा करने के बराबर होता आया है?
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सवाल महत्वपूर्ण हैं और कवि सोच रहा है। उसने लालकृष्ण आडवाणी की तस्वीर निकाली और गौर से देखा। तस्वीर से ऐसा प्रतीत होता था, जैसे एक दुखी आत्मा कह रही हो, बारात में उसे कार से निकालकर बस में बिठा दिया गया है।
यह उचित ही है। कवि ने अयोध्या की रथयात्रा के विरोध में कविता लिखी थी और उस कविता का परिणाम है कि आज वह यात्रा करने वाला चित्त है। कवि का मकसद पूर्ण हुआ। कवि ने उस कविता की याद में एक कश लगाया।
कश से उठा धुआं राजपथ-जनपथ तक गया।
कवि ने देखा, कपिल सिब्बल भी कवि हैं, जो कैग के हिसाब से गड़बड़ियां पकड़ते रहे हैं। ऐसे में भाजपा को एक ऐसे कवि की जरूरत है, जो सुशासन की संभावनाओं पर सांस्कृतिक योगदान दे सके। अटल बिहारी वाजपेयी अब 'काल के कपाल' पर नहीं गाते। यदि कवि उस कपाल पर कुछ कर सके, तो देश बदल सकता है। देश जो है, वह कवि के मनुष्य का है, कवि का कवि उसका भविष्य नापने लगता है।
कवि को किसी ने कारपोरेट सांस्कृतिकी पर लंबी रचना की याद दिला दी है। उसका मनुष्य कहता है, प्रायोजक पकड़ो। कवि कहता है, प्रायोजक कारपोरेट संस्कृति का प्रतीक है। कवि को प्रायोजक प्रति क्रांतिकारी लगता है, मनुष्य का काम प्रायोजक के बिना नहीं चलता। कवि का मनुष्य राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी को देख रहा है और कवि का कवि लंबी कविता के भविष्य को देख रहा है।
कवि आत्मा है, मनुष्य शरीर है। कवि जीभ है, मनुष्य नमक है। कवि प्यास है, मनुष्य पानी है।
आखिर कवि क्या करे? उसे नमक और पानी चाहिए।
आखिर कवि क्या करे? उसे कविता के लिए स्याही-कागज चाहिए।
आखिर कवि क्या करे? उसे स्याही-कागज के लिए पैसा और उससे उपजी पोस्टिंग चाहिए।
कवि फेसबुक पर बैठ गया है। उसने नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी के पन्ने एक साथ खोल दिए हैं।
बस एक बार पक्का हो जाए कि दोनों एक-दूसरे की फोटोकॉपी हैं तो कवि भाजपा में कूद जाए।
उसे सैद्धांतिक समर्थन चाहिए।
क्या आप कवि की कोई मदद करेंगे? आखिर सरकार आप ही तो बनाने जा रहे हैं।