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पीएम-विद्यालक्ष्मी योजना: होनहारों को उच्च शिक्षा का वरदान, सर्वसमाज के लिए एक बड़ा अवसर
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी टीम लगातार भारत में शिक्षा को सर्वांगीण विकास के एक महत्वपूर्ण उपादान के रूप में तब्दील करने में लगी है। इसके लिए जरूरी है कि देश में शिक्षा का अवसर सबको सहज ढंग से सुलभ कराया जाए। इसके लिए सबसे पहल नई शिक्षा नीति-2020 में भारत में शिक्षा को ‘अपनी शिक्षा’ और ‘जनता के लिए शिक्षा’ के रूप में अनेक प्रावधान किए गए हैं।नई शिक्षा नीति के तहत अंग्रेजी के आधिपत्य को कम कर भारतीय भाषाओं में शोध को महत्व देने की दिशा में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अनेक कदम उठाने जा रहा है। मातृभाषा में ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया विकसित होने से इस प्रक्रिया में सभी के शामिल होने का रास्ता खुलेगा और यहा प्रक्रिया ज्यादा जनतांत्रिक भी हो सकेगी। भारत जैसे देश में शिक्षा के दरवाजे तक पहुंचने में एक बड़ी समस्या आती है धन की। अनेक बार होनहार युवाओं के समक्ष आने वाला आर्थिक संकट उन्हें उत्कृष्ट शिक्षा लेने से वंचित कर देता है। आर्थिक अक्षमता युवाओं के शिक्षा तक पहुंचने के रास्ते में अनेक बाधाएं खड़ी करती है। इस समस्या को महसूस करते हुए सरकार द्वारा विद्यार्थियों के शिक्षा-ऋण लेने की प्रक्रिया को सहज एवं सुलभ बनाने के लिए अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। देश की बैंक व्यवस्था भी उसमें सहयोगी हो रही है।
हाल ही में भारत सरकार ने पीएम-विद्यालक्ष्मी नाम से एक उत्कृष्ट मेधा वाले प्रतिभावान छात्रों के लिए एक विशिष्ट शिक्षा ऋण की नई योजना को मंजूरी दी है। इस नीति के तहत संभावनाशील योग्य युवाओं के लिए देश के उत्कृष्ट रैंकिंग वाले 860 शिक्षण संस्थाओं में पढ़ने के लिए बिना किसी गारंटी के ऑनलाइन प्रक्रियाओं के तहत सहज और शीघ्र शिक्षा ऋण दिया जाएगा। भारत सरकार की इस नीति के तहत प्रतिवर्ष देश के 20 लाख से ज्यादा प्रतिभावान विद्यार्थियों को यह विशिष्ट ऋण उपलब्ध कराया जाएगा। इसमें एक प्रकार से सरकार ही गारंटर की भूमिका निभाएगी। यह ऋण मामूली ब्याज पर छात्रों को उपलब्ध कराया जाएगा। यह योजना प्रधानमंत्री मोदी की गारंटी की व्यापक परियोजना और विजन का हिस्सा है। प्रतीकात्मक अर्थों में देखें, तो इस योजना में प्रधानमंत्री मोदी स्वयं इस सरकार और जनतंत्र के प्रतिनिधि के रूप में ऐसे उत्कृष्ट मेधा वाले युवाओं को उत्कृष्ट शिक्षा के लिए आर्थिक साधन उपलब्ध कराने के लिए गारंटर बनकर उभरते दिखते हैं।
ऋण लेने के लिए गारंटर की जरूरत खत्म करने और सहज ढंग से घर बैठे डिजिटली ऋण लेने की सुविधा होने से छात्र स्वतः उत्कृष्ट संस्थानों से शिक्षा ले पाएंगे। फलतः आज शिक्षा ऋण लेकर शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों की संख्या, जो अभी तीन लाख के आसपास है, उसमें काफी वृद्धि होगी। इस संदर्भ में ऋण मात्र ऋण न होकर युवाओं में उत्कृष्ट कोटि के शिक्षा संस्थानों से शिक्षा ग्रहण करने की क्षमता के विकास के एक माध्यम के रूप में देखा जाना चाहिए। यूं भी अगर भारत में जनतंत्र और विकास के इतिहास को देखें, तो बैंक ऋण सुलभ करा के सामाजिक कल्याण की अनेक योजनाओं द्वारा विकास की गति को विभिन्न सरकारों ने विभिन्न काल खंडों में बढ़ाया है। अगर सरकारी सहयोग के रूप में यह ऋण उपलब्ध न होते, तो ऐसे समुदाय अभी भी जनतंत्र के दरवाजे से काफी दूर होते।
मैं जब यह कर रहा हूं, तो भारतीय समाज में उन मध्य, पिछड़े एवं दलित समुदायों की बात कर रहा हूं, जिन्होंने आजादी के बाद से अब तक बैंक ऋण से अपने विकास की गति तेज की है। इस पर कुछ महत्वपूर्ण शोधों से आए आंकड़ो से इस तथ्य की पुष्टि भी होती है। इस संदर्भ में मैं राजनीति विज्ञानी प्रो. आशीष बनर्जी का जिक्र करना चाहता हूं, जिन्होंने नेहरू मेमोरियल म्यूजियम में फेलो रहते इस विषय पर एक महत्वपूर्ण शोध किया था। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के रूप में ऐसे आर्थिक सहयोगों ने समूहों, समुदायों एवं लोगो के विकास एवं गतिशीलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। नियोजन के इस पक्ष पर गहन शोध होना अभी बाकी है।
बाबा साहेब आंबेडकर ने शिक्षा को दलित और पिछड़ों की मुक्ति का महत्वपूर्ण हथियार माना था। भारतीय जनतंत्र के फ्रेम में कार्यरत किसी भी सरकार का दायित्व है कि आर्थिक रूप से अक्षम विद्यार्थियों के लिए सरकारी समर्थन के रूप में अनेक योजनाएं लाकर उन्हें शिक्षा के परिसर से जोड़े। उम्मीद है कि पीएम-विद्यालक्ष्मी योजना का लाभ सर्व समाज के प्रतिभावान विद्यार्थियों को मिलेगा। उनके लिए देश के उत्कृष्ट शिक्षा संस्थानों में जाकर शिक्षा लेने का सपना पूरा हो पाएगा।