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कोरोना के दौर में दर्शन और नैतिकता, यह संकट हमें तोड़ नहीं सकता
Tue, 31 Mar 2020 07:48 AM IST
Rohit Ojha
हेनरिक स्येस
हेनरिक स्येस
Published by: Rohit Ojha
Updated Tue, 31 Mar 2020 07:48 AM IST
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कोरोना वायरस (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो : Pixabay
यह देखना दिलचस्प होगा कि इन दिनों कितने समाचार संस्थान और प्रसारक ऐसे कोणों और नजरिए की बात करते हैं, जिसे हम व्यापक रूप में दार्शनिक परिप्रेक्ष्य कह सकते हैं। जैसा कि हम कोविड-19 महामारी का सामना कर रहे हैं, मैं उन लोगों में से हूं, जिनसे यह पूछा गया है और मैं विनम्रतापूर्वक इसमें योगदान की कोशिश करूंगा।
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यह देखना दिलचस्प होगा कि इन दिनों कितने समाचार संस्थान और प्रसारक ऐसे कोणों और नजरिए की बात करते हैं, जिसे हम व्यापक रूप में दार्शनिक परिप्रेक्ष्य कह सकते हैं। जैसा कि हम कोविड-19 महामारी का सामना कर रहे हैं, मैं उन लोगों में से हूं, जिनसे यह पूछा गया है और मैं विनम्रतापूर्वक इसमें योगदान की कोशिश करूंगा।
अभी के लिए कौन-सा दर्शन अच्छा है? मुझसे पूछने की एक खास वजह है, युद्ध की नैतिकता से संबंधित मेरी पृष्ठभूमि, वह यह कि जब हम अत्यंत चरम और जीवन को बदलकर रख देने वाले हालातों का सामना करते हैं, तब हमें कैसी नैतिकता और संस्कृति की जरूरत होती है। यह ऐसा विषय है, जिस पर मैंने मेरे शानदार सहयोगी ग्रेग रिकबर्ग और पीआरआईओ के अन्य सहयोगियों के साथ काम किया है।
सवाल यह है कि क्या इसकी तुलना वाकई युद्ध से की जा सकती है? क्या हम वैसे ही संसाधनों को खंगाल रहे हैं और उसी तरह के भय और कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं, जैसा कि हम तब करते हैं, जब हम युद्ध का सामना कर रहे होते हैं? यह तुलना ताकत और कमजोरियां दोनों से जुड़ी है। जो कुछ घट रहा है, उसकी नाटकीयता और हमारे लिए क्या जरूरी है, उसे देखें, तो यह निश्चित रूप से युद्ध जैसा लगता है।
1960 के दशक में पैदा हुई मेरी पीढ़ी के अनेक लोगों की तरह मैं भी अपने अभिभावकों और दोस्तों के बीच बड़ा हुआ, जिन्होंने नॉर्वे के कब्जे के दौर का खुद से अनुभव किया था। मुश्किलों, भय, एकजुटता और गहरी अनिश्चितता ने हम पर प्रभाव डाला। और मैं यह महसूस करता हूं कि यह किसी भी रूप में वैसा नहीं है, इसके बावजूद मैं खुद को वैसे ही निर्णायक हालात में पा रहा हूं।
यह समानता यहीं खत्म नहीं होती। जब स्वास्थ्य सुरक्षा की प्राथमिकताओं की बात आती है, तब असाधारण निर्णय लेने पड़ते हैं। बेशक यह नैतिक दुविधा है, जिससे अनेक स्वास्थ्य कार्यकर्ता रोजाना गुजरते हैं, लेकिन वे नाटकीय और इसके आदी हो चुके हैं। चिकित्सा जगत के मुहावरे में इसे 'ट्राइएज' (आपात स्थिति में गंभीर रोगियों को अन्य रोगियों से पहले इलाज उपलब्ध कराना) कहा जाता है।
अभी के लिए कौन-सा दर्शन अच्छा है? मुझसे पूछने की एक खास वजह है, युद्ध की नैतिकता से संबंधित मेरी पृष्ठभूमि, वह यह कि जब हम अत्यंत चरम और जीवन को बदलकर रख देने वाले हालातों का सामना करते हैं, तब हमें कैसी नैतिकता और संस्कृति की जरूरत होती है। यह ऐसा विषय है, जिस पर मैंने मेरे शानदार सहयोगी ग्रेग रिकबर्ग और पीआरआईओ के अन्य सहयोगियों के साथ काम किया है।
सवाल यह है कि क्या इसकी तुलना वाकई युद्ध से की जा सकती है? क्या हम वैसे ही संसाधनों को खंगाल रहे हैं और उसी तरह के भय और कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं, जैसा कि हम तब करते हैं, जब हम युद्ध का सामना कर रहे होते हैं? यह तुलना ताकत और कमजोरियां दोनों से जुड़ी है। जो कुछ घट रहा है, उसकी नाटकीयता और हमारे लिए क्या जरूरी है, उसे देखें, तो यह निश्चित रूप से युद्ध जैसा लगता है।
1960 के दशक में पैदा हुई मेरी पीढ़ी के अनेक लोगों की तरह मैं भी अपने अभिभावकों और दोस्तों के बीच बड़ा हुआ, जिन्होंने नॉर्वे के कब्जे के दौर का खुद से अनुभव किया था। मुश्किलों, भय, एकजुटता और गहरी अनिश्चितता ने हम पर प्रभाव डाला। और मैं यह महसूस करता हूं कि यह किसी भी रूप में वैसा नहीं है, इसके बावजूद मैं खुद को वैसे ही निर्णायक हालात में पा रहा हूं।
यह समानता यहीं खत्म नहीं होती। जब स्वास्थ्य सुरक्षा की प्राथमिकताओं की बात आती है, तब असाधारण निर्णय लेने पड़ते हैं। बेशक यह नैतिक दुविधा है, जिससे अनेक स्वास्थ्य कार्यकर्ता रोजाना गुजरते हैं, लेकिन वे नाटकीय और इसके आदी हो चुके हैं। चिकित्सा जगत के मुहावरे में इसे 'ट्राइएज' (आपात स्थिति में गंभीर रोगियों को अन्य रोगियों से पहले इलाज उपलब्ध कराना) कहा जाता है।
इसने हमें एकसाथ मिलकर काम करने के लिए विवश किया है
मगर ऐसा युद्ध में नहीं होता, जब कहा जाए कि चालीस लोग घायल हैं और आपके पास सिर्फ दस लोगों के इलाज की सुविधा है। कोविड-19 के दौर में यह हो चुका है और जैसा कि दिख रहा है कि यह चुनौती और बढ़ेगी। यह युद्ध नहीं है। हम पर कोई हथियारों से हमला नहीं कर रहा है। कोई गुप्त या अज्ञात शत्रु हमारी जिंदगियों और हमारे समुदायों को तबाह करने की कोशिश नहीं कर रहा है।
यह एक प्राकृतिक अवधारणा है और हम इस वैश्वीकृत दुनिया में जिस तरह से संवाद करते हैं और आगे बढ़ते हैं, उस पर आधारित है। कट्टरपंथी या सत्तालोलुप विचारकों और नेताओं ने या फिर सशस्त्र समूहों ने इसे हम पर नहीं थोपा है। इसने हमें एकसाथ मिलकर काम करने के लिए विवश किया है और इसे 'ग्रेट लेवलर' की तरह देखा जा रहा है।
जैसा कि मेरे एक दोस्त ने कहा, यह ऐसी चीज है, जिसका सामना हम सब एक समुदाय के रूप में कर रहे हैं और इसलिए हमें इसका समाधान एक समुदाय के रूप में निकालना होगा, हथियारों से नहीं, बल्कि सद्भाव और साझा प्रयासों से और हां, युद्ध के विपरीत हम इन चुनौतियों का सामना शांति से हमारे समाजों में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ संसाधनों से कर सकते हैं।
उम्मीद है कि हम उन देशों और दुनिया भर के प्रभावित लोगों के साथ एकजुटता से इसका मुकाबला कर सकते हैं, जिन्होंने शांति की ताकत और उससे होने वाले लाभ का अनुभव नहीं किया है। हो सकता है कि हम पूरी तरह से तैयार न हों, लेकिन युद्ध से शरीरिक और मानसिक रूप से जरजर हो चुके देशों की तुलना में हम बेहतर स्थिति में हैं। यह समय चिकित्सा संबंधी दखल, कड़ी स्वच्छता, शोध और कठोर नहीं बल्कि जरूरी राजनीतिक फैसले करने और नियमन का है।
यह समय, युद्ध की तरह ऐसा समय है, जब हमें प्यार, उम्मीद और सुरक्षा की जरूरत होती है। यही समय है, जब हमें अपनी परंपराओं के दार्शनिक और आध्यात्मकि संसाधनों को खंगालना चाहिए और सद्भाव, एकजुटता, भरोसा, उम्मीद, दयालुता का प्रदर्शन कर दिखाना चाहिए कि यह संकट हमें तोड़ नहीं सकता।
यह एक प्राकृतिक अवधारणा है और हम इस वैश्वीकृत दुनिया में जिस तरह से संवाद करते हैं और आगे बढ़ते हैं, उस पर आधारित है। कट्टरपंथी या सत्तालोलुप विचारकों और नेताओं ने या फिर सशस्त्र समूहों ने इसे हम पर नहीं थोपा है। इसने हमें एकसाथ मिलकर काम करने के लिए विवश किया है और इसे 'ग्रेट लेवलर' की तरह देखा जा रहा है।
जैसा कि मेरे एक दोस्त ने कहा, यह ऐसी चीज है, जिसका सामना हम सब एक समुदाय के रूप में कर रहे हैं और इसलिए हमें इसका समाधान एक समुदाय के रूप में निकालना होगा, हथियारों से नहीं, बल्कि सद्भाव और साझा प्रयासों से और हां, युद्ध के विपरीत हम इन चुनौतियों का सामना शांति से हमारे समाजों में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ संसाधनों से कर सकते हैं।
उम्मीद है कि हम उन देशों और दुनिया भर के प्रभावित लोगों के साथ एकजुटता से इसका मुकाबला कर सकते हैं, जिन्होंने शांति की ताकत और उससे होने वाले लाभ का अनुभव नहीं किया है। हो सकता है कि हम पूरी तरह से तैयार न हों, लेकिन युद्ध से शरीरिक और मानसिक रूप से जरजर हो चुके देशों की तुलना में हम बेहतर स्थिति में हैं। यह समय चिकित्सा संबंधी दखल, कड़ी स्वच्छता, शोध और कठोर नहीं बल्कि जरूरी राजनीतिक फैसले करने और नियमन का है।
यह समय, युद्ध की तरह ऐसा समय है, जब हमें प्यार, उम्मीद और सुरक्षा की जरूरत होती है। यही समय है, जब हमें अपनी परंपराओं के दार्शनिक और आध्यात्मकि संसाधनों को खंगालना चाहिए और सद्भाव, एकजुटता, भरोसा, उम्मीद, दयालुता का प्रदर्शन कर दिखाना चाहिए कि यह संकट हमें तोड़ नहीं सकता।