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परोपकार पुण्य है, परपीड़न पाप
Updated Wed, 03 Apr 2013 10:14 PM IST
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हम अपने आसपास ऐसे कई कथित धार्मिक लोगों को देखते हैं, जो दिन-रात भगवद्भजन करने की बातें कहते रहते हैं, लेकिन मौका देखते ही गलत तरीके से धन अर्जित करने और दूसरों को कष्ट पहुंचाने से पीछे नहीं हटते। धर्मशास्त्रों में बताया गया है कि अगर सच्चा धार्मिक बनना है, तो दूसरों की सुख-सुविधा का पूरा ध्यान रखना चाहिए और उनकी सहायता करनी चाहिए।
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इसी से जुड़ा एक प्रसंग संत रामचंद्र डोंगरे जी महाराज का है। एक दिन उनके दर्शनार्थ अंग्रेजी के एक शिक्षक पहुंचे। वह बोले, महाराज, मैं संस्कृत भाषा से अनभिज्ञ होने के कारण पुराणों और उपनिषदों का अध्ययन नहीं कर सकता। आप धर्मशास्त्रों के महान ज्ञाता हैं। कृपया मुझे पुराणों और अन्य धर्मशास्त्रों का सार समझाने की कृपा करें।
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डोंगरे जी महाराज ने कहा, आपको व्यास जी के इस श्लोक में समस्त पुराणों का सार मिल जाएगा- अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचन द्वयं। परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम्।। इसका अर्थ यह है कि अठारह पुराणों में दो बातें ही कही गई हैं। पहला, परोपकार ही पुण्य है और दूसरा, परपीड़न (यानी दूसरों को कष्ट देना) पाप है। डोंगरे जी ने उन्हें प्रेरणा देते हुए कहा, धर्म का सच्चा अर्थ ही सेवा और परोपकार जैसे सत्कार्यों में लीन रहना और हिंसा, उत्पीड़न, शोषण आदि से बचे रहना है। प्रत्येक मानव इन दो बातों का पालन करके अपना जीवन सार्थक कर सकता है।
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