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जब एक तानाशाह जेल जाता है
तवलीन सिंह
Updated Mon, 22 Apr 2013 12:52 PM IST
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जब किसी तानाशाह को जेल भेजा जाता है, तो दुनिया के अंधेरे कम हो जाते हैं। सो परवेज मुशर्रफ की गिरफ्तारी का वारंट जब पिछले सप्ताह एक पाकिस्तानी अदालत ने जारी किया, तब मुझे खुशी हुई और जनरल साहब को अदालत से दुम दबाकर भागते देखकर मजा आया।
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कुछ इसलिए कि कई पाकिस्तानी सेनाधिकारियों की तरह मुशर्रफ भारत से नफरत करते हैं। कुछ इसलिए भी कि निजी तौर पर मैं मुशर्रफ को दोषी मानती हूं भारत और पाकिस्तान के बीच अशांति और द्वेष फैलाने के लिए। मेरा मानना है कि मुशर्रफ का सैनिक राज न आया होता, तो अब तक दोनों देशों के बीच दुश्मनी काफी हद तक खत्म हो गई होती।
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अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री बने, तो उनकी विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य था, पाकिस्तान के साथ दोस्ती की नींव रखना। यह ख्याल उनको अचानक नहीं आया था। जब जनता पार्टी की सरकार में वह विदेश मंत्री थे 1977 में, उनकी यही इच्छा रही थी और उन्होंने कई बार व्यक्त की थी, लेकिन एक बार इतने खूबसूरत शब्दों में कि मुझे आज भी याद है।
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पाकिस्तानी शायर हाफिज जालंधरी दिल्ली आए थे 1978 में बंटवारे के बाद पहली दफा। उनके स्वागत में गालिब अकादमी में समारोह रखा गया था, जिसमें वाजपेयी खास मेहमान थे। समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने इन शब्दों में भारत और पाकिस्तान की पुरानी दुश्मनी का जिक्र किया, हम एक थे, एक हैं, हमारे बीच सियासत ने दीवार खड़ी कर दी है।
मैं यह नहीं कहता गिराई जा सकती है, यह कहता हूं कि एक-दो ईंटें खिसका दी जाएं, ताक-झांक तो हो। यह सुनकर हाफिज जालंधरी की आंखें भर आईं, और हम सुनने वालों में शायद ही कोई था, जिसके दिल तक ये शब्द न पहुंचे हों। प्रधानमंत्री बनने के बाद फरवरी, 1999 में, अटल जी एक सुनहरी बस पर सवार होकर वाघा की सीमा पार करके लाहौर गए।
मैं उन भारतीय पत्रकारों में थी, जिनको दिल्ली से लाया गया था एक दिन पहले इंडियन एयरलाइंस की एक खास फ्लाइट से। अटल जी जब पाकिस्तान की धरती पर उतरे और एक पाकिस्तानी सैनिक बैंड ने जन-गण-मन बजाकर उनका स्वागत किया, तो हम पत्थर दिल पत्रकार भी जज्बाती हो गए थे। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और अन्य राजनेताओं ने अटल जी का दिल से वाघा में स्वागत किया, लेकिन उस स्वागत समिति में मुशर्रफ नहीं थे, इसलिए कि ठीक उसी समय वह कारगिल युद्ध की तैयारी में लगे हुए थे।
कारगिल में बुरी तरह हारने के बाद उन्होंने जेहादी आतंकवादियों के दस्ते तैयार किए और हाफिज सईद व मौलाना अजहर मसूद जैसे सरगनाओं को जन्म दिया। अगर 9/11 का हमला न होता अमेरिका पर, तो संभव है कि ओसामा बिन लादेन के हाथों में पाकिस्तानी परमाणु बम भी पहुंच गया होता।
मुशर्रफ अगर थोड़ा पीछे हटे 9/11 के बाद, तो सिर्फ इसलिए कि अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने उनको साफ शब्दों में खबरदार किया कि अगर वह जेहादी आतंकवाद को समाप्त करने में अमेरिका की सहायता नहीं करते हैं, तो पाकिस्तान की तबाही के लिए तैयार हो जाएं।
मुशर्रफ ने मजबूर होकर मदद तो की अमेरिका की, लेकिन भारत के साथ अपना गुप्त युद्ध जारी रखा। कितनी ही बार इस देश के शहरों, मंदिरों, बाजारों में निहत्थे लोगों पर हमले किए हैं पाकिस्तानी आतंकवादियों ने। 26/11 वाले हमले की भी पूरी तैयारी तब हुई पाकिस्तान की भूमि पर, जब मुशर्रफ का राज था, बावजूद इसके कि हमला हुआ मुंबई पर उनके जाने के बाद। संसद पर जेहादी हमला उनके दौर में हुआ और आईसी-814 को भी अगवा किया गया उन्हीं के दौर में।
ऐसा भी नहीं है कि मुशर्रफ ने अपने देश के लिए कुछ अच्छा किया हो। जब पाकिस्तान छोड़कर भागे वह 2008 में, उन पर गद्दारी का इल्जाम लग चुका था और इतने अलोकप्रिय हो गए थे वह कि उनके जाने पर किसी ने आंसू भी न बहाए। समझ में नहीं आता कि वह वापस क्यों आए।
मुशर्रफ को पाकिस्तानी कानून के तहत सजा होती है, तो मेरी नजरों में इसे न्याय माना जाएगा। एक पुराना पंजाबी नारा याद आया मुझे जो बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद सुना था लाहौर में, गो मुशर्रफ गो, मुक्क गया तेरा शो।