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दृष्टिकोण: नौकरी और बेरोजगारी के बीच की स्थिति, जिस पर चिंता करना 'मना है'

Sun, 18 Jan 2026 06:35 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 18 Jan 2026 06:35 AM IST
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सार
एक तरफ पद खाली पड़े हैं, दूसरी ओर कुछ नौकरियां करने में युवाओं की दिलचस्पी नहीं है। यह स्थिति किसी एक सरकार की देन नहीं है। यह समस्या बढ़ती ही जा रही है।
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Perspective: situation between employment and unemployment
नौकरी और बेरोजगारी के बीच की स्थिति - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

चारों तरफ अच्छी खबरें सुनने को मिल रही हैं। खुदरा महंगाई की दर 1.33 प्रतिशत है। वित्त वर्ष  2025-26 में जीडीपी की वृदि्ध दर 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। मुझे लगता है कि इसमें एक बात और जोड़ी जानी चाहिए कि भारत में  बेरोजगारी नहीं है। कम से कम वैसी तो नहीं है, जिसकी हमें चिंता करनी चाहिए।


आंकड़े बताते हैं कि सरकारी और अर्द्ध-सरकारी क्षेत्र में लाखों पद खाली पड़े हैं, लेकिन उन्हें भरने की चिंता किसी को नहीं है। आठवां वेतन आयोग आने के बाद लोगों की स्थिति और बेहतर हो जाएगी। महंगाई भत्ते, वार्षिक वेतन वृद्धि, पदोन्नति, नौकरी की सुरक्षा, चिकित्सा सुविधाएं, एचआरए, परिवहन भत्ता व अन्य भत्ते, अवकाश सुविधाएं, अग्रिम और ऋण तथा एकीकृत पेंशन योजना, जैसी सुविधाओं के होने के बावजूद युवा पुरुष और महिलाएं इन सरकारी स्वीकृत पदों को स्वीकार करने के क्या इच्छुक नहीं हैं। खाली पदों को भरने में दिलचस्पी न दिखाना तो इसी बात को दर्शाता है। इस स्थिति से आप और क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं, सिवाय इसके कि भारत में बेरोजगारी नहीं है। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, एक अप्रैल 2024 तक केंद्रीय विश्वविद्यालयों में स्वीकृत और खाली पद इस प्रकार हैं-

 
पदों के प्रकार   स्वीकृत रिक्त
शिक्षण पद   18940 5060
गैर-शिक्षण पद 35640  16719

आंकड़ों के हिसाब से केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 27 प्रतिशत शिक्षण पद और 47 प्रतिशत गैर-शिक्षण पद खाली थे। जून 2025 तक केंद्रीय विद्यालय संगठन में 7765 और नवोदय विद्यालय समिति में 4323 शिक्षण पद खाली थे। फिर भी हमें आश्वस्त किया जाता रहा है कि भारत में शिक्षा व्यवस्था अच्छी तरह से चल रही है।

आंकड़ों की जुबानी
इस तरह के उदाहरण पूरे देश में देखे जा सकते हैं। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में कांस्टेबल के 25487 पद रिक्त हैं। राजस्थान में एलडीसी/क्लर्क ग्रेड-दो के 10644 पद खाली हैं। बिहार में 12199 पद खाली हैं। उत्तर प्रदेश में कांस्टेबल के 60244 पद रिक्त हैं। तमिलनाडु में स्टाफ नर्सों के 2255 पद खाली हैं। गौरतलब है कि इन पदों के लिए आवेदन करने वाले आम तौर पर निम्न व मध्यम वर्ग के वह छात्र-छात्राएं होते हैं, जिन्होंने हाल ही में 12वीं या स्नातक की पढ़ाई पूरी की है। उच्च शिक्षा की तरफ जाएं तो 21 एम्स में 3485 फैकल्टी तैनात हैं, जबकि 1731 पद खाली चल रहे हैं। ओडिशा राज्य के केंद्रपाड़ा जिले में डॉक्टर और पैरा मेडिकल स्टाफ के 805 पद खाली हैं। भरे पदों की संख्या 1087 है।
बैंकिंग सेक्टर को प्रतिष्ठित और आकर्षक माना जाता है। 12 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में कर्मचारियों की स्थिति इस प्रकार है-
 
  कार्यरत रिक्त
अधिकारी 430599 17500
क्लर्क 243817 12861
अधीनस्थ कर्मचारी 84092 2206

       
प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना की शुरुआत अक्तूबर 2024 में की गई थी। एक अखबार में दो दिसंबर, 2025 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, दो चरणों में कंपनियों ने कुल 165000 इंटर्नशिप ऑफर दिए, लेकिन उनमें से केवल 20 प्रतिशत को ही स्वीकार किया गया। ऑफर स्वीकार करने वालों में पांच में से एक ने इंटर्नशिप पूरी होने से पहले उसे छोड़ दिया। इस तरह लगभग 140000 ऑफर किसी ने स्वीकार नहीं किए। भारत में बेरोजगारी को समस्या न मानने वाले, यहां निराश हो सकते हैं।

हमें निष्पक्षता के साथ यह स्वीकार करना होगा कि एक ओर बड़ी संख्या में पद खाली पड़े हैं और दूसरी ओर कुछ नौकरियों में युवाओं की दिलचस्पी नहीं है। वह उन्हें करना नहीं चाहते। यह स्थिति केवल भाजपा सरकार की देन नहीं है। यह समस्या कई सरकारें और कई दशकों से चली आ रही है। हां, दो घटनाओं ने इस स्थिति को और गंभीर बना दिया है।

दो घटनाओं का असर
पहली घटना-नोटबंदी। यह एक थोपी गई घटना थी। जैसा कि मैं पहले भी लिख चुका हूं, यह असलियत में नोटबंदी थी ही नहीं, क्योंकि किसी भी मुद्रा को स्थायी रूप से अमान्य कर प्रणाली से बाहर नहीं किया गया। यह दरअसल ‘पुराने नोटों के बदले नए नोट’ देने की एक योजना भर थी। जितनी मुद्रा बाजार में थी, उतनी जल्द ही बाजार में लौट आई, बल्कि उससे भी आगे निकल गई। चार नवंबर, 2016 को प्रचलन में मुद्रा का मूल्य 17.97 लाख करोड़ रुपये था, दिसंबर 2025 के अंत तक यह दोगुने से भी अधिक बढ़कर 39.24 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। नोटबंदी का दुष्प्रभाव यह रहा कि हजारों छोटे और मध्यम उद्यम बंद हो गए और लाखों नौकरियां चल गईं-हालांकि सरकार इससे इनकार करती है। लेकिन ऑल इंडिया व्यापार मंडल के अनुसार, 2016 में देश में 6.25 करोड़ छोटे व्यवसाय थे, जिनमें से लगभग 48 प्रतिशत पिछले एक दशक में बंद हो चुके हैं।

दूसरी घटना-कोविड महामारी है। 2022 में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, 14 प्रतिशत एमएसएमई महामारी के कारण स्थायी रूप से बंद हो गए। एक सरकारी रिपोर्ट बताती है कि जुलाई 2020 से फरवरी 2025 के बीच 75000 पंजीकृत एमएसएमई बंद हुए (मतलब यह प्रभाव कोविड काल से आगे तक गया)। यूएनसीटीएडी का अनुमान है कि फरवरी 2022 तक भारत में लगभग 47 प्रतिशत एमएसएमई अस्थायी या स्थायी रूप से बंद हो चुके थे। इन आंकड़ों की पुष्टि भले ही न हो, लेकिन सच्चाई से मेल खाते हैं।

मनरेगा को एक ऐसी योजना से बदलना जो मांग आधारित नहीं है, जिसमें रोजगार की गारंटी नहीं है और जो पैसे की कमी से जूझ रही है, ग्रामीण गरीबों की स्थिति को और खराब बना देगा। उन्हें बेरोजगारी या अर्द्ध-बेरोजगारी का सामना करना पड़ सकता है। इससे ग्रामीण परिवारों, विशेषकर महिलाओं की अतिरिक्त आय का स्रोत छिन सकता है। यह मानना कि बेरोजगारी कोई बड़ी समस्या नहीं है, सच से मुंह फेरना है। सरकार अपनी प्रशंसा में डूबी है और बेरोजगारी देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रही है। Licensed by The Indian Express Limited
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