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खेल रत्न पर निशाना
हेमेन्द्र मिश्र
Updated Fri, 23 Aug 2013 08:16 PM IST
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दो साल पहले जब 2010-11 के खेल पुरस्कारों की घोषणा हुई थी, तब रोंजन सोढ़ी को यह सुनकर धक्का लगा था कि राष्ट्रमंडल खेलों और एशियन गेम्स में बेहतर प्रदर्शन करने के बाद भी सरकार ने उन्हें राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार के 'लायक' नहीं समझा। उनके दिल में यह कसक भी थी कि जसपाल राणा तथा रणधीर सिंह जैसे बेहतरीन निशानेबाजों की तरह एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक पर निशाना लगाने के बाद भी उनकी प्रतिभा का सम्मान नहीं किया गया।
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लेकिन इस टीस को उन्होंने अपने खेल पर कभी हावी नहीं होने दिया। नतीजतन, वह उसी वर्ष न सिर्फ विश्व के नंबर एक निशानेबाज बने, बल्कि अब खेल के सर्वोच्च सम्मान से भी नवाजे जा रहे हैं। हालांकि 2009 में वह अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं।
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फिरोजपुर (पंजाब) के शाही सोढ़ी परिवार में जन्म लेने के कारण निशानेबाजी रोंजन के खून में है। दादाजी जब भी शिकार को जाते, उन्हें जरूर ले जाते। बस फिर क्या था, रोंजन की छोटी-छोटी उंगलियों ने शिकार वाली बंदूकों से खेलना शुरू कर दिया। निशानेबाजी का ककहरा उन्होंने ट्रैप शूटिंग से सीखा, लेकिन जब छोटे भाई को भी इसी तरह की शूटिंग करते देखा, तो वह डबल ट्रैप खेलने लगे। इसकी वजह काफी दिलचस्प है। असल में, रोंजन नहीं चाहते थे कि आने वाले दिनों में ट्रैप शूटिंग का मुकाबला दोनों भाइयों के बीच ही हो, लिहाजा अपने भाई के साथ किसी भी तरह की प्रतिस्पर्धा से बचने के लिए उन्होंने डबल ट्रैप का रास्ता चुना।
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सोढ़ी परिवार भले ही समृद्ध परिवारों में गिना जाता हो, लेकिन शॉटगन जैसे महंगे खेलों का खर्च वहन करना उसके लिए भी दुरूह था। लेकिन रोंजन की राह में सिर्फ यही मुश्किल नहीं थी। उन्हें अच्छी बंदूक की भी जरूरत थी, जो कानूनी बंदिशों के चलते गिनी-चुनी ही अपने देश में हैं।
लिहाजा शुरुआत उधार की बंदूक से हुई, और जब वह राष्ट्रीय फलक पर चर्चित हुए, तो उन्हें न सिर्फ स्पॉन्सर मिले, बल्कि इटली और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बेहतर प्रशिक्षण का मौका भी मिला। पिछले चार-पांच वर्षों में रोंजन ने जितने पदक जीते हैं, उतने किसी भी अन्य भारतीय ने नहीं जीते हैं, लेकिन यही उनकी मंजिल नहीं! अब वह ‘गन लॉ’ को उदार बनाने और अत्याधुनिक शूटिंग क्लब की स्थापना का सपना देख रहे हैं, ताकि श्यान मसूद, आशेर नोरिया जैसे उभरते निशानेबाजों को उन मुश्किलों से न जूझना पड़े, जो उन्होंने झेली हैं।
- हेमेन्द्र मिश्र