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क्रोध से भजन-पूजन निष्फल

Tue, 30 Apr 2013 09:39 PM IST
Updated Tue, 30 Apr 2013 09:39 PM IST
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people should not be angry

आवेश में आने के बाद हम भले-बुरे का अंतर नहीं कर पाते और अपना पतन कर बैठते हैं। हमारे धर्मग्रंथों में ऐसे कई प्रसंग हैं, जिनमें यह सीख दी गई है कि क्रोध को कदापि हावी नहीं होने देना चाहिए।

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अगर हम वक्त-बेवक्त क्रोधित हो जाते हैं, तो मानना चाहिए कि हमने पूजा-उपासन कर जो भी फल प्राप्त किए, वे बेकार हो गए।

श्रीमद्भागवत के महान आचार्य स्वामी अखंडानंद सरस्वती एक बार वृंदावन से हरिद्वार कार से जा रहे थे। कार की मालकिन सेठानी स्वामी जी की भक्त थीं तथा वह प्रायः साधना-भक्ति में लगी रहती थीं।
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चलते समय उनकी कार का ड्राइवर ठंडे पानी की बोतल साथ रखना भूल गया। रास्ते में जब सेठानी ने पानी मांगा, तो पता चला कि बोतल वृंदावन आश्रम में रह गई है। सेठानी ड्राइवर पर क्रोध करके उसे अपशब्द कहने लगी। संयम खोकर वह बोली, तुझे मैं नौकरी से निकलवा दूंगी।
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स्वामी जी को यह अच्छा नहीं लगा। वह बोले, देवी जी, आज क्रोध ने तुम्हारा तमाम भजन-पूजन व साधना निष्फल कर डाला है। इस प्रकार की साधारण-सी भूल यदि तुम्हारे पतिदेव या पुत्र से हो जाती, तो क्या उन्हें भी तुम अपने घर से निकाल देतीं?


स्वामी जी के शब्द सुनते ही महिला का क्रोध काफूर हो गया। उसने जहां भविष्य में क्रोध न करने का संकल्प लिया, वहीं ड्राइवर से अपने कटु शब्दों के लिए क्षमा भी मांगी।

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