फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   People have to break the silence against the current government, hand over the command to another party or Alliance

बिहार चुनाव: सरकार के विरुद्ध मूक लोगों को चुप्पी तोड़नी होगी

Sun, 25 Oct 2020 07:21 AM IST
पी. चिदंबरम पी चिदंबरम
पी चिदंबरम Published by: पी. चिदंबरम Updated Sun, 25 Oct 2020 07:21 AM IST
विज्ञापन
People have to break the silence against the current government, hand over the command to another party or Alliance
गरीबी (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : PTI

एक ऐसी दुनिया में जो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से निरंतर समृद्ध हो रही है, गरीब होना वाकई दुर्भाग्य है। एक गरीब देश में किसी का गरीब होना लोकतंत्र की नाकामी है। एक गरीब देश के एक गरीब राज्य में किसी का गरीब होना राजनीति का ही कोप है।


loader

बिहार के औसत नागरिक दुर्भाग्य, लोकतंत्र की नाकामी और राजनीतिक कोप के पीड़ित हैं। उनके पास अपने भविष्य को बेहतर बनाने का एक मौका है, जैसा कि वहां इस महीने चुनाव होने जा रहे हैं। उनके पास एनडीए (जद यू, भाजपा और एचएएम) महागठबंधन [राजद, कांग्रेस, सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई (एमएल)], लोजपा (पासवान) और छोटे दलों के एक अन्य गठबंधन जैसे विकल्प हैं, जिनमें से उन्हें अपनी पसंद चुननी है।

बिहार की गरीबी
बिहार कितना गरीब है? कुछ मापदंड पर गौर करें। 2019-20 में भारत की सकल प्रति व्यक्ति आय 1,34,226 रुपये थी और बिहार की 46,664 रुपये-यह पूरे भारत के आंकड़े का एक तिहाई है-और यह सारे राज्यों में न्यूनतम थी। 3,888 रुपये की औसत मासिक आय से औसत बिहारी को पर्याप्त भोजन या कपड़े या सम्मानजनक आसरा नहीं मिल सकता। (भारत में अत्यधिक असमानता को देखते हुए, बिहारियों में एक बड़े अनुपात में औसत से कम आय होगी।)

किसान बदहाल स्थिति में हैं। बिहार ने कृषि के लिए अपने कुल खर्च का महज 3.5 फीसदी ही आवंटित किया है, जो कि देश में सबसे न्यूनतम है और सभी राज्यों का औसत 7.1 फीसदी है। 42.5 फीसदी कृषक परिवार कर्जदार हैं; सीमांत किसानों में यह आंकड़ा 86.7 फीसदी है। राज्य का एपीएमसी ऐक्ट निरस्त कर दिया गया है और बिहार फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) से बाहर हो चुका है। फरवरी, 2019 (कोविड काल से पूर्व) से बेरोजगारी की दर 10 फीसदी है; युवाओं में यह 55 फीसदी है। नियोजित लोगों में 87 फीसदी के पास नियमित वेतन वाली नौकरियां नहीं हैं। मनरेगा के तहत दो करोड़ परिवारों ने पंजीयन करवाया है, मगर सिर्फ 36.5 फीसदी को काम मिला।

विरासत से छल
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय राज्य में मजबूत प्रशासनिक ढांचा था, ईमानदार और प्रगतिशील नेता थे और जनसेवकों की फौज थी। गंगा बिहार से होकर बहती है, जिसके कारण दक्षिण बिहार देश का सर्वाधिक उर्वर क्षेत्र है। बिहार की उल्लेखनीय उपलब्धि थी, शुरुआत में हो गया भूमि सुधार, जमींदारी प्रथा का उन्मूलन, और भूमिहीनों को भूमि का वितरण (इस मामले में केवल जम्मू और कश्मीर उसका प्रतिद्वंद्वी था)। मिशनरीज ने वहां अच्छी शिक्षा के बीज बोए थे। और इन सबसे ऊपर उसके पास अत्यंत मेहनती और भरोसेमंद कार्यबल था। (यहां तक कि आज भी कंस्ट्रक्शन वर्कर और खेती के काम में प्रवासी बिहारी पुरुष श्रमिकों की सर्वाधिक मांग होती है।)

यह सब पिछले तीस वर्षों में नाटकीय रूप से बदल गया, जिसमें पंद्रह वर्ष नीतीश कुमार (जिसमें वे 278 दिन भी हैं, जब उन्होंने खुद पद छोड़ दिया था) के कार्यकाल के हैं। इन सारी बीमारियों की जड़ बदहाल शासन है। 2011-12 से 2018-19 के दौरान बिहार की जीडीपी औसत 6.6 फीसदी की दर से आगे बढ़ रही थी, जबकि पूरे भारत की औसत विकास दर थी 7.73 फीसदी। 2005 से 2019 के दौरान इसका सार्वजनिक कर्ज 43,183 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,61,980 करोड़ रुपये हो गया। कैग (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की रिपोर्ट के मुताबिक नए कर्ज का 85 फीसदी हिस्सा तो ब्याज और मूलधन को चुकाने में ही खर्च हो जाता है। अपने सीमित संसाधनों, कर्ज की बहुत कम राशि और बदहाल प्रशासनिक ढांचे के कारण पूंजीगत खर्च न्यूनतम स्तर पर है और नई नियमित नौकरियां भी कम हैं।

नतीजतन गरीबी बढ़ रही है। नीति आयोग द्वारा समर्थित निष्कर्षों के मुताबिक राज्य का गरीबी अनुपात बढ़कर 55 फीसदी (2018-19) हो गया है। ऐसे में गरीब बिहारी क्या करता है? वह अक्सर परिवार के साथ पलायन करता है। कोई भी उस मानवीय त्रासदी को नहीं भूलेगा, जब लाखों मजदूरों को  (24 मार्च, 2020 को अचानक लगाए गए लॉकडाउन की मेहरबानी से) बिहार और उत्तर प्रदेश के अपने शहरों और गांवों तक जाने के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलना पड़ा, ताकि वे बेघर होने और भूख से बच सकें। उन सबकी एक ही पीड़ा थी, 'यदि हमें मरना ही है, तो हमें अपनों के बीच मरने दें।'

अक्षम लोगों को बाहर करें
यह स्पष्ट है कि बिहार के लोग या तो नीतीश कुमार के पक्ष में वोट करें या उनके खिलाफ। कुमार जेपी आंदोलन की उपज हैं और समाजवादी हैं। यह माना जाता था कि वह पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष हैं और नरेंद्र मोदी के उभार का विरोध करेंगे। जब वह पहली बार मुख्यमंत्री बने तो ऐसा लगा था कि कानून और व्यवस्था कायम करेंगे और ईमानदारी से विकास के प्रति समर्पित होंगे।

जुलाई, 2017 में अचानक यह सब बदल गया, जब उन्होंने मोदी का विरोध त्याग दिया और राजद के साथ गठबंधन वाली सरकार तोड़कर भाजपा से हाथ मिला लिया और मुख्यमंत्री बने रहे, बस फर्क यह था कि वह एनडीए सरकार के मुखिया बन गए। इसके बाद से उन्होंने खुद को बिहार के लोगों से कम और मोदी से अपना अधिक जुड़ाव प्रदर्शित किया है, ताकि उनकी सत्ता बची रहे। यह तब भी क्षम्य होता, यदि उन्होंने बिहार को आर्थिक सीढ़ी पर कुछ ऊपर पहुंचाया होता। इसके उलट राज्य तो नीचे फिसलता गया। श्री कुमार तो अच्छी कानून-व्यवस्था तक कायम नहीं कर सके। 2005 से 2019 के दौरान संज्ञेय अपराध 157 फीसदी बढ़ गए। औसतन रोजाना महिलाओं के विरुद्ध 51 अपराध, दलितों के विरुद्ध 18 अपराध और बलात्कार के चार मामले दर्ज किए जाते हैं।

कष्टकर गरीबी और बढ़ते अपराध ने बिहार के लोगों को मूक रहने को मजबूर कर दिया है। उन्हें यह चुप्पी तोड़नी होगी और मौजूदा सरकार के विरुद्ध वोट देकर किसी अन्य पार्टी या गठबंधन को इस चेतावनी के साथ कमान सौंपनी होगी कि यदि वह सरकार भी मर्यादित तथा सक्षम शासन प्रदान करने में नाकाम रहती है, तो उसे भी बेदखल कर दिया जाएगा। 'सत्ता से बेदखल' करने की चेतावनी ही मतदाता की असली ताकत है। 2020 में यह समय आ गया है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed