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पेगासस जासूसी: पंख वाले घोड़े पर सवार सरकार...कुछ अहम सवाल उठा रहे हैं चिदंबरम

Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 25 Jul 2021 03:08 AM IST
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पेगासस जासूसी
पेगासस जासूसी - फोटो : social media
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एक मंत्री पद की शपथ लेता/लेती है कि वह अपने कर्तव्य का पालन बिना किसी भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के करेगा/करेगी। यहां तक तो अच्छा है, लेकिन क्या सत्य, पूर्ण सत्य और सत्य के अलावा कुछ भी नहीं कहने का वादा इसमें अंतर्निहित नहीं है (जैसा कि एक गवाह को अदालत में होना चाहिए)?
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स्पष्ट रूप से ऐसा नहीं है। सत्य के अपने आपमें कई वैरिएंट हैं और यह (सार्स कोरोना वायरस-2 की तरह) म्यूटेट (रूपांतरित) भी हो सकता है। सत्य है; सत्य के पचास रंग हैं; पूर्ण सत्य है; और वैकल्पिक सत्य है। मुझे लगता है कि कोई मंत्री अवसर के आधार पर उनमें से किसी एक को चुन सकता है।


एक नए मंत्री ने अपने पहले भाषण में यही किया। जब राजनेताओं, जजों, पत्रकारों, नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं, विद्यार्थियों, कारोबारियों और 'पसंदीदा लोगों'में शामिल मित्रों की जासूसी को लेकर तूफान उठा, तब पता चला कि हजारों मोबाइल फोन धारकों को पर्सन्स ऑफ इंटरेस्ट' के रूप में सूचीबद्ध किया गया था। इनमें से सैकड़ों मोबाइल फोनों में पेगासस नामक मालवेयर का इस्तेमाल कर स्पाईवेयर के जरिये सेंध लगाई गई और उन्हें हैक किया गया। 'पर्सन्स ऑफ इंटरेस्ट' की सूची में यह मंत्री भी शामिल थे!

पौराणिक कथा की यात्रा
(यहां पौराणिक कथाओं की ओर थोड़ा-सा विषयांतर संदर्भ से अलग नहीं होना चाहिए। ग्रीक पौराणिक कथा के अनुसार पेगासस एक पंखों वाला घोड़ा था, जो मेडुसा के खून से निकला था। वह ज्यूस का सेवक बन गया और जब जरूरत होती थी, तब वह ज्यूस के लिए बादलों की गड़गड़ाहट पैदा करता था और बिजली चमकाता था। पेगासस एक रहस्यमय प्राणी है और 'सब कुछ करने में सक्षम है, दैवीय प्रेरणा या स्वर्ग की यात्रा का प्रतीक है'। वह कुछ कुछ कुछ इस नारे की तरह था, मोदी है, तो मुमकिन है। )

इस्राइल के एक समूह एनएसओ ग्रुप के मालिकाना हक वाला यह सॉफ्टवेयर पेगासस अब भारत सरकार का सेवक है और यह सरकार को सक्षम बना सकता है कि वह जब भी जरूरत हो गिरफ्तार करने और हिरासत में रखने के असाधारण अधिकार का इस्तेमाल कर सके (जो कि इन दिनों बहुत सामान्य है)। यह अच्छे दिन की यात्रा भी करा सकता है।

दुर्लभ किस्म की उदारता और क्षमा का प्रदर्शन करते हुए मंत्री ने जासूसी के आरोपों को लेकर सरकार का बचाव किया। उनका यह बचाव प्रत्याशित था। उन्होंने कहा, यदि कोई प्रिज्म से भी देखे, तो समझ सकता है कि किसी भी तरह की 'अवैधानिक निगरानी' नहीं हुई है। उनका यह बचाव, वैसा ही था, जैसे किसी आईआईटी, कानपुर और वार्टन बिजनेस स्कूल के पूर्व छात्र से अपेक्षा कर सकता है। ऐसे त्रुटिहीन तर्क का खंडन करना मुश्किल है।

हालांकि एक औसत नागरिक जिसकी औसत शिक्षा हुई हो और जो प्रिज्म के तर्क से वाकिफ न हो, वह इस सीधे प्रश्न का उत्तर जानना चाहता है : क्या पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल कर कोई आधिकारिक निगरानी हुई है? मंत्री पक्के तौर पर आधिकारिक और गैरआधिकारिक निगरानी का फर्क जानते होंगे। वह सबसे पहले कुछ बुनियादी प्रश्नों का उत्तर तलाश कर नागरिक के प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं :

साधारण प्रश्न
-क्या इस बात के प्रमाण हैं कि पेगासस ने भारत में फोनों में सेंध लगाई थी?
-क्या सरकार या उसकी किसी एजेंसी ने पेगासस स्पाइवेयर हासिल किया?
-यह सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करने के लिए कितनी राशि का भुगतान किया गया और प्रत्येक डिवाइस में इसे इन्सटॉल करने में कितना खर्च आया? ( जो दरें बताई गई हैं वह बहुत अधिक हैं, लेकिन थोक में आदेश देने में रियायत भी है)
-क्या मंत्री यह पता लगाने के लिए कि क्या उनका फोन हैक किया गया था, अपना फोन (उस उल्लेखित समय में उपयोग किया गया फोन) फोरेंसिक जांच के लिए देंगे?

यहां रुचि की एक अन्य बात भी है। मंत्री ने एनएसओ ग्रुप के इस इन्कार का भी हवाला दिया, 'ऐसी सेवाएं किसी के लिए भी, कहीं भी और किसी भी समय उपलब्ध हैं, और आम तौर पर सरकारी एजेंसियों के साथ ही निजी कंपनियां द्वारा दुनिया भर में इस्तेमाल की जाती हैं।'

मुझे भय है, ग्रीक पौराणिक कथा से उधार लेकर कहूं, तो गलतियां हुई हैं। एनएसओ ग्रुप ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि, 'एनएसओ अपनी प्रौद्योगिकी सिर्फ जांची-परखी सरकारों (हमारी भी) की कानून पर अमल करने वाली और खुफिया एजेंसियों को ही बेचती है।'

एनएसओ ग्रुप के बयान में, खुले तौर पर उपलब्ध सेवाओं का संदर्भ एचएलआर लुकअप सेवाओं के लिए था, पेगासस के लिए नहीं।

यदि पेगासस सिर्फ जांची-परखी सरकारों को बेचा गया है, तो एक साधारण प्रश्न है कि क्या भारत की सरकार उसी तरह की कोई जांची-परखी सरकार है?

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नए मंत्री को अपनी पारी कठिन विकेट पर शुरू करनी पड़ी। लेकिन मंत्री को फ्रांस और इस्राइल के उत्तर तलाश कर हमसे साझा करने से पहले उत्तर उपलब्ध कराना चाहिए। (फ्रांस ने राष्ट्रपति मैंक्रो की संदिग्ध जासूसी की जांच शुरू कर दी है और इस्राइल ने एनएसओ ग्रुप के खिलाफ लगे आरोपों की जांच के लिए एक आयोग की नियुक्ति कर दी है।)

क्या निजता की कोई कीमत है?
मेरे पास एक उकसाने वाला सुझाव है। आत्मनिर्भरता वाले इन दिनों में यह मायूस करने वाली बात है कि भारत की सरकार ने प्राचीन भारत के पराक्रमी राजाओं द्वारा अश्वमेध यज्ञ के लिए काम में लाए गए किसी भारतीय घोड़े के नाम वाले स्पाइवेयर के बजाय 'पेगासस' को पसंद किया। सरकार बीजक के नाम वाले स्पाइवेयर की तलाश कर सकती थी, यह कवि-नाटककार चीनू मोदी के गुजराती नाटक अश्वमेध के घोड़े का नाम था। या फिर पुरुकुत्स, कुमारविष्णु, समद्रुगुप्त, पुलकेशिन द्वितीय और राजराजा चोल जैसे राजाओं से प्रेरित होकर श्री मोदी की सरकार कोई सफेद घोड़ा तलाश कर अश्वमेध यज्ञ कर सकती थी और उसके बाद लड़ाका भक्तों के साथ उस घोड़े को सारे राज्यों में भेज राज्यों के शासकों की निष्ठा को नियंत्रित कर सकती थी और भारत के पूरे क्षेत्र में सत्तारूढ़ पार्टी की सर्वोच्चता कायम कर सकती थी। जासूसी को लेकर उठ रहे सवालों का 'राष्ट्र विरोधियों, 'विदेशी ताकतों' और 'वामपंथी संगठनों की अंतरराष्ट्रीय साजिश' जैसे दोषारोपण के जरिये प्रतिकार किया जा सकता है। जासूसी को देशभक्ति का कर्तव्य बताया जा सकता है। और जब तक ऐसे लोग पर्याप्त संख्या में रहेंगे, जो कि सरकार द्वारा जासूसी करने को जायज ठहराएं, भले ही निजता का अधिकार कुचल दिया जाए, उन्हें निरंकुश भारत की ओर आगे बढ़ने से कौन रोक सकता है?
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