{"_id":"166bb604-9306-11e2-b06d-d4ae52bc57c2","slug":"peace-4","type":"story","status":"publish","title_hn":"राग-द्वेष से रहित हृदय में शांति","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
राग-द्वेष से रहित हृदय में शांति
Updated Fri, 22 Mar 2013 09:05 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विख्यात आर्य संन्यासी महात्मा आनंदस्वामी सरस्वती उन दिनों लाहौर के दैनिक मिलाप के संपादक थे। वह प्रायः कुछ दिन के लिए अज्ञातवास के लिए चले जाते थे तथा कुछ दिन साधना कर लौट आते थे।
विज्ञापन
एक बार कांगड़ा के वनों में वह साधना कर रहे थे। जैसे ही साधना में बैठते कि उन्हें लाहौर के एक ऐसे व्यक्ति की याद आने लगती, जो उन्हें दुश्मन मानता था। महात्मा जी भी बदले में उसके प्रति घृणा का भाव रखते थे। जब साधना में उनका मन नहीं लगा, तो उनकी अंतरात्मा ने जैसे चेतावनी दी, एक ओर तू आत्मशांति चाहता है, दूसरी ओर तेरे हृदय में घृणा भरी है। जब तक हृदय में घृणा रहेगी, शांति कदापि नहीं मिलेगी।
विज्ञापन
स्वामी जी तुरंत उठे और लाहौर जा पहुंचे। वह सीधे उस व्यक्ति के घर गए, जिससे उनकी शत्रुता थी। वह उन्हें देख सकपका उठा। महात्मा जी ने अपनी पगड़ी उसके पैरों में रख दी तथा बोले, शत्रुता की भावना के कारण मेरा मन साधना में नहीं लगता। मुझे क्षमा कर दो, तमाम गलतियां मेरी ही थीं।
विज्ञापन
यह सुनते ही दोनों की आंखों से आंसू बहने लगे। शत्रुता व घृणा जैसे आंसू के साथ बहकर काफूर हो गए। दूसरे दिन महात्मा जी फिर से साधना में बैठे, तो समाधि लग गई। राग-द्वेष से रहित हृदय ने अपूर्व शांति की अनुभूति की।