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कर्ज चुकाएं या बाहर जाएं

Fri, 28 Nov 2014 07:30 PM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Fri, 28 Nov 2014 07:30 PM IST
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Pay debt or go out

रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने एक गंभीर बहस छेड़ते हुए कहा है कि देश में राजनीतिक संरक्षण प्राप्त कुछ पूंजीपति 'जोखिम रहित पूंजीवाद' चला रहे हैं। 'जोखिम रहित पूंजीवाद' से उनका आशय यह है कि जब देश की आर्थिक विकास दर ऊंची थी, तो उसका इन व्यवसायियों ने खूब फायदा उठाया, पर जैसे ही आर्थिक विकास की गति सुस्त पड़ी और मुनाफा कम होने लगा, तो उन्होंने बैंकों को कर्ज की राशि चुकाना बंद कर दिया। चूंकि इन बड़े पूंजीपतियों में से कई राजनीतिक दलों को चंदा देते हैं, इसलिए सरकारी बैंकों को इन कंपनियों द्वारा लिए गए 'कर्जों को पुनर्गठित करने' का निर्देश दिया गया। कर्ज पुनर्गठन का मतलब कर्ज की अदायगी बंद करना और कई मामलों में मौजूदा ब्याज में छूट होता है। कर्ज न चुकाने वाली कंपनियों को बैंकों द्वारा अक्सर अतिरिक्त ऋण मुहैया कराया जाता है, ताकि कंपनी बंद न हो जाए और बैंक का पिछला कर्ज डूब न जाए।

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रिजर्व बैंक के गवर्नर ने स्पष्ट तौर पर कहा, 'देश में बहुत से बड़े कर्जदार व्यवसाय में नई पूंजी लगाने के बजाय व्यवसाय को नियंत्रण में रखना अपना दैवीय अधिकार मानते हैं। नतीजतन इस खेल में कंपनी, उसके कर्मचारी और बैंक द्वारा दिए गए कर्ज की स्थिति बंधक जैसी होती है। कंपनी के प्रमोटर सरकार, बैंक और नियामक को धमकी देते हैं कि यदि उन्हें जरूरी रियायत नहीं दी गई, तो कंपनी बंद करनी पड़ेगी।'
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दरअसल कंपनी को इतना बड़ा बताया जाता है कि उसे बंद करने की अनुमति देना मुश्किल होता है। सरकार को ब्लैकमेल करते हुए ये पूंजीपति कहते हैं कि यदि कारोबार बंद किया गया, तो बहुत लोग बेरोजगार हो जाएंगे। लिहाजा दबाव में सरकार ऐसे उद्योग को राहत पैकेज देती है। राजन का कहना है कि दुर्भाग्य से ऐसे व्यवसायी उद्योग जगत के नायक माने जाते हैं, जबकि ये देश के करदाताओं पर बोझ होते हैं।
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रिजर्व बैंक गवर्नर का यह बयान राजनीतिक क्षेत्र से जुड़ी इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के विवाद के मद्देनजर आया है, जिनके कर्ज-इक्विटी का अनुपात 6ः1 से ज्यादा होने के बावजूद बैंकों से अतिरिक्त कर्ज दिया गया है। जब कर्ज सीमा से ज्यादा हो जाता है, तब ब्याज का बढ़ता बोझ कंपनी को कर्ज के शिकंजे में फंसा देता है। सामान्य तौर पर जब किसी कंपनी के कर्ज-इक्विटी का अनुपात 3ः1 से ज्यादा हो जाता है, तो उसे स्वीकृत लेखा मानकों के अनुसार, काफी जोखिम भरा माना जाता है। इसका मतलब यह कि अगर कोई उद्यमी अपने इक्विटी फंड में 1,000 करोड़ रुपये लगाता है, तो उसका बैंक कर्ज और दूसरे ऋण 3,000 करोड़ से अधिक नहीं होने चाहिए।

ऊर्जा संयंत्र, टेलीकॉम नेटवर्क, रोड, बंदरगाह और विमानन से जुड़ी अनेक इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों का कर्ज-इक्विटी अनुपात 3ः1 से ज्यादा है। बैंकिंग जगत के ज्यादातर पुनर्गठित कर्ज का लाभ भी इन्हीं इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों को मिलता है! ऐसी कई कंपनियों के प्रमोटर आज डिफॉल्टर हैं, पर उनका राजनीतिक संपर्क बहुत मजबूत है। मसलन, बदतरीन डिफॉल्टर कंपनी किंगफिशर एयरलाइन्स के प्रमोटर न सिर्फ राज्यसभा सदस्य थे, बल्कि कुछ वर्ष पहले नागरिक उड्डयन पर बनी संसदीय स्थायी समिति के सदस्य थे! क्या हितों के टकराव का इससे बड़ा उदाहरण हो सकता था?

एक दूसरे प्रभावशाली राजनीतिक व्यवसायी ने, जिनके समूह की कंपनियों को पिछले दिनों 70,000 करोड़ से ज्यादा कर्ज चुकाने के लिए दबाव डाला गया, सार्वजनिक घोषणा की कि उनका उपक्रम 'राष्ट्रीय हितों' से जुड़ा था। राजनीति से जुड़े ज्यादातर पूंजीपति सरकारी बैंकों से राहत पाने के लिए 'राष्ट्रीय हित' की दुहाई देने में देर नहीं लगाते। जबकि असली कुशल व्यवसायी कभी 'राष्ट्रीय हित' की दुहाई नहीं देते और उचित लाभ पर ईमानदारीपूर्वक व्यवसाय करते हैं।
यहां गौरतलब है कि निजी बैंक इन उद्यमियों के 'राष्ट्रीय हित' की अपील नहीं सुनते। इसे इन आंकड़ों से समझा जा सकता है ः जहां सार्वजनिक बैंकों का 12 फीसदी कर्ज पुनर्गठित या राहत पैकेज की श्रेणी में आता है, वहीं निजी बैंकों द्वारा दिए कर्ज का मात्र चार फीसदी ही इस श्रेणी में आता है। इससे पता चलता है कि 2008 में वित्तीय संकट के भारत पहुंचने और पूंजी के दुर्लभ और महंगी होने के बाद किस निर्ममता से सार्वजनिक बैंकों का दोहन किया गया। निजी बैंक इससे बचे रहे, क्योंकि उन पर राजनेताओं का नियंत्रण नहीं था।

इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में व्याप्त इस क्रोनी कैपिटलिज्म के खिलाफ, जिसमें पूंजीवाद का अनुचित लाभ अपनी पहचान के लोगों को दिलाया जाता है, रघुराम राजन समय-समय पर चेताते रहे हैं। पिछले दशक में सड़क, बंदरगाह, टेलीकॉम नेटवर्क और ऊर्जा संयंत्र बनाने के काम में लगे उद्यमियों ने यह मानना शुरू किया कि वे 'राष्ट्र निर्माण' का काम कर रहे हैं, लिहाजा उनके कारोबारी जोखिम का बड़ा हिस्सा सरकार को झेलना चाहिए! स्पेक्ट्रम और कोयला आवंटन घोटाले इसी गंभीर बीमारी के लक्षण थे। इसकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि मौजूदा शासन भी यह मानता प्रतीत होता है कि कर्ज में डूबी ये इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियां देश को वैश्विक स्तर पर ऊपर उठाने में मदद कर सकती हैं।


वर्ष 2012 में जब एक बार मनमोहन सिंह को सम्मानित किया जा रहा था, तब उसी मंच से प्रधानमंत्री के मानद आर्थिक सलाहकार रघुराम राजन ने कहा था कि यूपीए सरकार इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में संसाधनों के आवंटन में पक्षपात को रोकने में विफल रही है, जिस कारण विकास की गति धीमी रही। राजन एनडीए सरकार को भी अब यही चेतावनी दे रहे हैं। सरकार को चाहिए कि वह राजन की इस चेतावनी को गंभीरता से ले। भारतीय उद्यमियों का ऐसा कोई दैवीय अधिकार नहीं है कि कर्ज चुकाने में विफल रहने पर भी वे अपना व्यवसाय चलाते रहें। अगर वे समय पर कर्ज नहीं चुका सकते, तो इसका एकमात्र समाधान यही है कि उन्हें कारोबार से अलग होने के लिए कहकर दूसरे उद्यमियों के लिए जगह बनाई जाए।

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