संसद: बहुत कुछ तय करेगा विशेष सत्र, 2024 की पृष्ठिभूमि में सार्थक हो सकता है आयोजन
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विस्तार
वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव एक नया विश्व रिकॉर्ड बनाएगा। दुनिया के सबसे बड़े चुनाव में देश की 1.431 अरब की आबादी में से अनुमानतः एक अरब लोग अपने लोकतांत्रिक अधिकार यानी मतदान का उपयोग करने के पात्र होंगे। हालांकि लोकतंत्र के इस उत्सव में अभी कुछ महीने की देरी है, लेकिन पहले से ही हैशटैग 2024 चुनाव लोगों का ध्यान खींच रहा है। सरकार द्वारा संसद के पांच दिवसीय विशेष सत्र बुलाने की घोषणा करने के बाद से ही अटकलों का दौर शुरू हो गया है। सरकार ने एक एजेंडा जारी किया है- 75 साल की संसदीय यात्रा और अन्य चीजों के अलावा नए मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए एक विधेयक पर चर्चा। लेकिन विपक्षी दल इस बात से आश्वस्त नहीं हैं और जानकारों को भी संदेह है कि विशेष सत्र में कुछ आश्चर्यजनक होने वाला है।
राष्ट्रीय राजनीति को जो चीज सर्वाधिक प्रभावित करने वाली है, उसका खुलासा तो खैर संसद के इस विशेष सत्र में ही होगा। जिन मुद्दों को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं, उनमें 'इंडिया' पर 'भारत' को प्राथमिकता देने, समान नागरिक संहिता विधेयक, एक राष्ट्र-एक चुनाव का प्रस्ताव, महिला आरक्षण विधेयक, सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए कोटा और रोहिणी आयोग की रिपोर्ट पेश करने जैसे मुद्दे शामिल हैं। लेकिन कोई भी निश्चित रूप से कुछ नहीं जानता। मोदी सरकार का एक अनुमानित पहलू आश्चर्यचकित करने की इसकी क्षमता रही है।
अटकलों का बाजार गर्म है। एक सिद्धांत यह है कि एक साथ चुनाव कराने की तैयारी आगामी विधानसभा चुनावों में मतदाताओं के संभावित गुस्से की आशंका को ध्यान में रखकर की जा रही है। लेकिन यह सिद्धांत कार्ल पॉपर के मिथ्याकरण सिद्धांत से पूरी तरह मेल नहीं खाता। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जीत हासिल की थी। इसके बावजूद 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राजस्थान की 25 में से 23, मध्य प्रदेश की 29 में से 28 और छत्तीसगढ़ की 11 में से नौ सीटें जीतीं!
विपक्षी दलों का मानना है कि पुलवामा आतंकी हमले ने 2019 के लोकसभा चुनाव में देश की प्रतिक्रिया की दिशा बदल दी। इसे जांचने के लिए 1965 और 1999 के जनादेश की समीक्षा करनी होगी। वर्ष 1965 के युद्ध में भारत ने निर्णायक रूप से जीत हासिल की, लेकिन 1967 में, लोकसभा में कांग्रेस की 75 से अधिक सीटें कम हो गईं और वह आठ राज्यों में हार गई थी। जैसा कि आप कह सकते हैं कि तात्कालिकता मायने रखती है। कारगिल युद्ध के बाद संसद में वाजपेयी सरकार की एक वोट से हार के बाद वर्ष 1999 में देश में चुनाव हुए। युद्ध में जीत के बावजूद भाजपा की सीटें 182 पर ही अटकी रहीं, जितनी उसने 1998 में जीती थीं। इसका एक कारण उत्तर प्रदेश में भाजपा में आपसी फूट था, जहां उसकी सीटें 58 से घटकर 29 रह गईं। हालांकि कांग्रेस की सीटें भी 141 से घटकर 114 रह गईं।
जैसा कि इतिहास से पता चलता है, चुनावी नतीजे कई चीजों से तय होते हैं।
लोकप्रिय सिद्धांतों की विश्वसनीयता को विरोधी तथ्यों द्वारा चुनौती दी जा सकती है। यह सच है कि अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन मतदाताओं पर असर डालता है और उनकी वोटिंग को प्रभावित करता है। लेकिन याद रखना चाहिए कि 1988 में दहाई अंकों की विकास दर ने 1989 में कांग्रेस की मदद नहीं की थी, न ही अर्थव्यवस्था के उदारीकरण का 1996 के चुनाव में उसे कोई फायदा हुआ था। इसी तरह 'इंडिया शाइनिंग' अभियान के बावजूद वर्ष 2004 में एनडीए हार गया था।
वर्ष 2024 के चुनाव में वाई फैक्टर युवाओं का वोट होगा। अनुमान है कि अगले वर्ष नौ करोड़ से अधिक नए मतदाता वोट डालने के योग्य होंगे। कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही युवाओं को लुभाने में लगी हैं, क्योंकि युवा मतदाताओं का महत्व है। वर्ष 2014 में भाजपा की जीत (जो कि 25 वर्षों में पहला बहुमत का जनादेश था) युवा आकांक्षाओं और नरेंद्र मोदी की गुजरात मॉडल की पेशकश से संचालित थी, तो 2019 का जनादेश एक निर्णायक सरकार की धारणा से प्रेरित था। यह सच है कि गर्व मायने रखता है-और जी-20 तथा चंद्रयान-3 की सफलताएं भावनाओं को प्रेरित करेंगी-इसमें कोई संदेह नहीं है।
रोजगार और अपने भविष्य को लेकर युवाओं में नाराजगी जनमत सर्वेक्षणों में लगातार उजागर होती रही है। कोटे से संबंधित आंदोलन सरकारी नौकरियों की खोज से प्रेरित है, और सरकार द्वारा आयोजित रोजगार मेलों द्वारा इसे रेखांकित किया गया है। वर्ष 2024 में पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं को पिछली सरकारों के बारे में शायद ही पता होगा और उनके पास संदर्भ का अभाव होगा। वर्ष 2014 में पहली बार मतदान करने वाले युवाओं की उम्र अब लगभग 28 वर्ष होगी और वे अपने वोट का फैसला पूरी और पूरी न हुई उम्मीदों के आधार पर करेंगे। युवा अब अपनी परिस्थितियों को कैसे समझते हैं और उनके मतदान करने की संभावना किस प्रकार है, यह जनमत सर्वेक्षण का एक प्रमुख विषय है।
उम्मीद है कि लोकसभा चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण ताकत महिला मतदाता होंगी। पिछले दो दशकों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत बढ़ा है। वर्ष 2019 के चुनाव में महिला मतदाताओं की संख्या 67.18 प्रतिशत थी, जो पुरुष मतदाताओं की संख्या (67.01 प्रतिशत) से अधिक थी। महत्वपूर्ण बात यह है कि देश भर के विधानसभा चुनावों में महिलाएं निर्णायक के रूप में उभर रही हैं।
हैरानी नहीं है कि विभिन्न राज्य सरकारें महिलाओं को सीधे धन हस्तांतरित करने के लिए योजनाएं शुरू करने की होड़ में हैं- तमिलनाडु में कलैग्नार मगलिर उरीमाई थोगई थिट्टम, कर्नाटक में गृह लक्ष्मी योजना और मध्य प्रदेश में लाडली बहना योजना इसके उदाहरण हैं। यह भी कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि विपक्ष इस बात से चिंतित है कि मोदी महिला आरक्षण विधेयक पारित कराकर मतदाताओं का मूड बदल सकते हैं।
ऐसे में इस उम्मीद का कारण है कि सांसद प्रतिस्पर्धी विचारों पर एक सम्मोहक बहस के साथ संसदीय लोकतंत्र के 75 साल पूरे करेंगे। अलबत्ता अगर यह आयोजन निरंतर बयानबाजी के समारोह में बदल जाए, तो भी हैरानी नहीं होगी। लेकिन एक बात जो निश्चित है, वह यह कि इस हफ्ते की घटनाएं वर्ष 2024 के चुनाव के लिए माहौल तैयार करेंगी।