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चुनावी व्यवस्था का समानांतर तंत्र

Tue, 19 Mar 2019 06:38 PM IST
virag gupta विराग गुप्ता
Updated Tue, 19 Mar 2019 06:38 PM IST
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Parallel system of electoral system
चुनाव प्रचार

वसंत ऋतु और कुंभ के बाद अब चुनावों का शाही पर्व शुरू हो गया है। नियमों के अनुसार एक प्रत्याशी 70 लाख रुपये से ज्यादा खर्च नहीं कर सकता। इसके हिसाब से गंभीर प्रत्याशियों द्वारा दो हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का खर्च नहीं होना चाहिए। जबकि कॉरनेगी थिंक टैंक संस्था के अनुसार, इस बार के चुनावों में 50 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का खर्च होने का अनुमान है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद चुनाव आयोग ने प्रत्याशियों को अब पिछले पांच साल के आयकर के ब्यौरे देने का निर्देश जारी किया है। तय सीमा से ज्यादा किए गए खर्चों का ब्यौरा जब चुनाव आयोग को ही नहीं दिया जाता, तो फिर आयकर विभाग इसकी जांच कैसे करेगा?


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देश में 2,000 से ज्यादा पंजीकृत राजनीतिक दल हैं, जिनको अपनी आमदनी पर आयकर की छूट मिलती है। इन तमाम दलों द्वारा दो हजार रुपये तक का नकद चंदा लेने के नियम की आड़ में गुमनाम समर्थकों का चंदा दिखाकर अरबों रुपये के कालेधन को राजनीति में खपाया जाता है। नोटबंदी के दौरान आम जनता को लाख तकलीफ हुई हों, लेकिन राजनीतिक दलों के खातों में बड़ी नकदी जमा होने के बावजूद, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं की गई। इन सारी छूटों के बावजूद अनेक नेता चुनावी शपथ-पत्र में पैन नंबर भी नहीं दर्शाते और ऐसे गंभीर अपराधों के लिए उनके खिलाफ अभियोजन की कार्यवाही भी नहीं होती। देश सेवा के नाम पर अनेक छूट और लाभ पाने वाले राजनीतिक दलों के खातों का यदि सीएजी ऑडिट शुरू हो जाए, तो इस धांधली पर लगाम लग सकती है!

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अनेक फैसलों में राजनीति और अपराध के भ्रष्टतंत्र को देश के लिए दीमक बताया है। दूसरी तरफ लोकतंत्र के चौकीदारों द्वारा चुनाव को केंद्रीकृत व्यापार बना दिया गया है। सांसद और विधायक जीतने के बाद कई करोड़ की निधियों का स्वामित्व हासिल करने के साथ आजीवन पेंशन के हकदार बन जाते हैं। जबकि समर्थकों को सरकारी विभाग की ठेकेदारी, माइनिंग की लीज, शराब के ठेके जैसे बेनामी लाभों से नवाज दिया जाता है।

डिजिटल युग में चुनाव आयोग अब भी हाथी और कमल के प्रतीकों को ढकने में व्यस्त है। सरकारी वेबसाइटों में मंत्रियों की फोटो हटाई जा रही हैं। चुनावी आचार संहिता के कागजी अनुपालन के दौर में सरकारी कार्य के लिए बनाए गए फेसबुक और ट्वीटर खातों से सभी मंत्रियों का चित्र चुनावी अधिसूचना लगने के बाद क्यों नहीं हटाना चाहिए। दिल्ली उच्च न्यायालय में के. एन. गोविंदाचार्य की याचिका के बाद सोशल मीडिया के नियमन हेतु अनेक कानून बने। चुनाव आयोग ने भी हमारे प्रतिवेदन के बाद 2013 में इस बारे में अनेक नियम बनाए, जिनका अभी तक अनुपालन नहीं हो रहा है। पिछले आम चुनावों में सोशल मीडिया के माध्यम से विज्ञापन और प्रचार पर 10 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का खर्च हुआ, लेकिन सिर्फ पांच सांसदों ने इस बारे में चुनाव आयोग को खर्चों का ब्यौरा दिया।

इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से पूरे देश में फेक न्यूज का जवाबी शोर है, फिर इसके खर्चों के बारे में नेताओं और दलों के खाते क्यों मौन हैं। पूरे देश में सोशल मीडिया के माध्यम से चुनावी प्रचार जोरों पर है। भारत में शिकायत अधिकारी नियुक्त कराने के साथ चुनावी खर्चों की जानकारी के लिए चुनाव आयोग सोशल मीडिया कंपनियों को बाध्य क्यों नहीं करता? दिल्ली में चुनाव आयोग का मुख्यालय है, जहां पर सोशल मीडिया के माध्यम से विज्ञापनों के अनुमोदन के लिए सिर्फ 17 आवेदन आए हैं। चुनाव आयोग ने बम्बई उच्च न्यायालय के सम्मुख इन नियमों के अनुपालन के लिए शपथ-पत्र दिया है। आयोग द्वारा राजनीतिक दलों के आईटी सेल में छापे की कार्रवाई की जाए तो देश में चुनावी व्यवस्था का समानांतर तंत्र बेनकाब होने के साथ लोकतंत्र का शुद्धीकरण भी हो सकता है।

साड़ी, शराब और नगदी की भेंट पर काफी बहस होती है पर बाइक रैली, रोड शो और सोशल मीडिया के गेम चेंजर पर चुनाव आयोग की वक्र दृष्टि क्यों नहीं पड़ती? पूरे चुनाव के दौरान रोड शो और बाइक रैलियों में वाहन, डीजल-पेट्रोल और समर्थकों की फौज जुटाने में अरबों रुपये खर्च होते हैं। नियमों के अनुसार सभी गाड़ियों और चालकों के बारे में निर्वाचन अधिकारी को पहले से सूचना देने के साथ नियमानुसार अनुमति भी ली जानी चाहिए। रोड शो के एक काफिले में दस से ज्यादा गाड़ियां नहीं हो सकतीं। सड़कों पर रोड शो करने के दौरान आधी सड़क खाली रहनी चाहिए। वाहनों को शाही अंदाज में बदलकर चुनावों में इस्तेमाल किए जाने वाले रथ राजनीतिक जुगाड़ की पराकाष्ठा है। सीट बेल्ट और हेलमेट नहीं लगाने पर देश में करोड़ों चालान होते हैं, तो फिर स्टार प्रचारकों को रथ की छत में चढ़कर शाही रोड शो की इजाजत क्यों मिलती है? पुलवामा में सीआरपीएफ के सुरक्षित काफिले पर एक आतंकी ने हमला करके हमारे अनेक जवानों को शहीद कर दिया। भारत में राजीव गांधी और पाकिस्तान में बेनजीर भुट्टो की चुनाव प्रचार के दौरान ही हत्या हुई थी। इन आतंकी खतरों की वजह से भारत में वीवीआईपी और स्टार प्रचारकों को एसपीजी और जेड सुरक्षा मिलती है। चुनाव आयोग द्वारा गैर-कानूनी तरीके से किए जा रहे रोड शो और बाइक रैलियों पर प्रतिबंध लगाने से जनबल और धनबल पर लगाम लगने के साथ पर्यावरण संरक्षण भी हो सकेगा।

चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद-324 के तहत निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने के लिए समस्त अधिकार मिले हैं। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने इसी कानूनी व्यवस्था के तहत भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र में हड़कंप मचा दिया था। परंतु उसके बाद से चुनाव आयोग किसी भी बड़ी कार्रवाई के लिए कानूनों में बदलाव हेतु सरकार के सामने नतमस्तक होता गया। अभी तक का तर्जुबा यह बताता है कि चुनावों के दौरान कानून डाल-डाल तो नेता पात-पात होते हैं। शाही रोड शो और सोशल मीडिया की मार्केटिंग की  बदौलत चुने गए लचर जनप्रतिनिधियों से भी आने वाले दौर में, चुनाव सुधारों के लिए सख्त नियमों को बनाने की अपेक्षा कैसे की जाए?

लेखक सुप्रीम कोर्ट में वकील और ‘इलेक्शन ऑन दी रोड्स’ पुस्तक के लेखक हैं।

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