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पंचायतें किसके साथ?

Sun, 24 Dec 2017 01:23 PM IST
महीपाल
महीपाल Updated Sun, 24 Dec 2017 01:23 PM IST
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 Panchayats with whom?
ग्रामीण मतदाता

गुजरात के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी जीत गई है। कांग्रेस भी दावा कर रही है कि वह भी पीछे नहीं है। विभिन्न आलोचक, पत्रकार, समाज-वैज्ञानिक, राजनेता मूल्यांकन कर बता रहे हैं कि भाजपा किन कारणों से जीती और कांग्रेस क्यों हारी। ग्रामीण एवं नगरीय खाई की बात हुई, लिखा भी गया। लेकिन, इस चुनाव का पंचायत के संदर्भ से कहीं मूल्यांकन नजर नहीं आया।


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यहां कुछ तथ्यों पर चर्चा करते हुए आगे बढ़ते हैं। वर्ष 2012 चुनाव के संदर्भ से देखें, तो पाते है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों का मत-प्रतिशत बढ़ा है। भाजपा का मत प्रतिशत 48 प्रतिशत से 49.1 प्रतिशत हो गया, तो कांग्रेस का 39 प्रतिशत से 41.4 प्रतिशत हुआ है। भाजपा की विधानसभा की पहले की सीटों की तुलना में इस बार सीटों की संख्या कम हुई है, जबकि कांग्रेस की सीटों की संख्या बढ़ी है। वृहत स्तर पर देखें, तो मतों का प्रतिशत जो 2012 के चुनाव में 71.3 प्रतिशत था, वह गिरकर 68.5 प्रतिशत रह गया है। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा शगुन नहीं है। अगर मतदाताओं की भागीदारी को ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों के संदर्भ में देखें, तो पाते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में मतों का प्रतिशत शहरों के मतों के प्रतिशत से पांच प्रतिशत अधिक रहा है। यह इस बात का संकेत देता है कि गांवों के अंदर अपने मत के प्रयोग करने की महत्ता के प्रति जागरूकता आ रही है।

अब जरा पंचायत के संदर्भ से मूल्यांकन करते है, वर्तमान में आए नतीजों का। गुजरात में पिछले पंचायत चुनाव 2015 एवं 2016 में संपन्न हुए थे। वैसे चुनाव राजनीतिक दलों के आधार पर नहीं हुए थे, लेकिन कांग्रेस दावा कर रही थी कि उसकी भागीदारी भाजपा समर्थित पंचायत-प्रतिनिधियों से अधिक रही है। उसी समय से लग रहा था कि कांग्रेस में ग्रामीण विधानसभा क्षेत्रों में उभार आना है। भाजपा ने 150 सीटों का दावा किया था, लेकिन 99 सीटें ही आ पाई। कितना दमखम भाजपा ने इन चुनाव में लगाया है, यह किसी से छुपा नहीं है। भाजपा अपनी उम्मीद पर खरी नहीं उतर पाई, उसके क्या कारण हो सकते हैं?

पंचायतें ग्रामीण सरकार हैं, अर्थात यों कहें कि वह तीसरी सरकार है। प्रथम, केंद्र सरकार, दूसरी, राज्य सरकार एवं तीसरी पंचायत। ऐसा मैं नहीं कह रहा हूं, बल्कि संविधान की धारा 243 जी ऐसा कहती है। लेकिन अगर गुजरात में इनकी जमीनी स्थिति देखते हैं, तो पाते हैं कि ये पंचायतें अर्थात तीसरी सरकार राज्य में उभर कर नहीं आ पाई है।

पंचायती राज मंत्रालय भारत-सरकार की हस्तांतरण रिपोर्ट 2015-2016 बताती है कि पंचायतों को राज्य में कार्यों, संसाधनों एवं कर्मचारियों का हस्तांतरण, जो कि 100 प्रतिशत होना चाहिए था, वह मात्र 48 प्रतिशत ही हो पाया है। जबकि 73वें संविधान संशोधन को लागू हुए दो दशक से ज्यादा हो गया है। अगर अन्य राज्यों की तुलना में देखते हैं, हम पाते हैं कि गुजरात आठवें स्थान पर है। पहले स्थान पर केरल है, दूसरे पर कर्नाटक, तीसरे स्थान पर महाराष्ट्र, चौथे स्थान पर तमिलनाडु, पांचवें स्थान पर तेलंगाना, छठे स्थान पर सिक्किम एवं सातवें स्थान पर पश्चिम बंगाल है। पंचायतों को सशक्त न बनाने का नकारात्मक प्रभाव ग्रामीण क्षेत्र के इस चुनाव के नतीजों पर पड़ा है। संसाधन पंचायतों के लिए ऑक्सीजन है, उनकी सज्जा है, लेकिन गुजरात का आंकड़ा बताता है, कि राज्य-वित्त-आयोग की सिफारिशों का मात्र 17 प्रतिशत ही अमल में आया है। इस समय ग्रामीण क्षेत्रों में जिला-परिषद के अध्यक्ष, तालुका के अध्यक्ष, ग्राम पंचायत अध्यक्ष व पंचायतों के सदस्यों को नजरअंदाज करके चुनाव जीतना टेढ़ी खीर है। यह बात विधानसभाओं के चुनावों में अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि पंचायतों को अधिकारों एवं शक्तियों का हस्तांतरण करना मुख्य रूप से राज्य-सरकार का ही कार्य है।

पंचायतों के संदर्भ में गुजरात की एक अन्य महत्वपूर्ण बात है कि इस प्रदेश के कुछ हिस्से संविधान की पांचवीं अनुसूची में आते हैं, जहां पर ‘पेसा’ अर्थात पंचायतों का पांचवीं अनुसूची में विस्तार अधिनियम 2006 लागू है। इन क्षेत्रों में पंचायतों को खासतौर पर ग्राम-सभाओं को जल, जंगल एवं जमीन से संबंधित विशेष अधिकार दिए गए हैं। गुजरात में कुल ग्रामीण आबादी का लगभग 22 प्रतिशत अनुसूचित-जनजाति है और अगर देश की कुल अनुसूचित-जनजाति के संदर्भ में देखते हैं, तो पाते हैं कि यहां पर यह आबादी लगभग नौ प्रतिशत है। ‘पेसा’ अधिनियम का  ‘फोकस’ ग्राम-सभा के ऊपर है, लेकिन गुजरात में जमीन अर्जित करने एवं पुनर्स्थापन व पुनर्वास करने का कार्य ग्राम-सभा को न देकर तालुका पंचायत को दिया गया है। इसी प्रकार छोटे जल-श्रोतों की योजना एवं प्रबंधन का कार्य भी ग्राम-सभा को न देकर ग्राम-पंचायत के पास है। गुजरात जैसे राज्य में, जहां खेती एवं चरागाहों के लिए उपलब्ध जमीन का अधिग्रहण अन्य कार्यों के लिए करना तक महत्वपूर्ण मुद्दा है। इसका रोष भी जनजातियों में होगा। आंकड़े बताते हैं कि आदिवासियों का केवल 50 प्रतिशत मत ही भाजपा को मिला है।
 
इसी प्रकार अन्य महत्वपूर्ण कार्य जैसे लघु-वन उत्पाद, भूमि छीनने पर रोक लगाने की शक्ति और गैर-कानूनी ढ़ंग से ली गई जमीन को बहाल करना, ग्राम के बाजारों का प्रबंधन और ब्याज पर धन देने पर नियंत्रण का अधिकार ग्रामसभा को न देकर या तो ग्राम-पंचायतों को या तालुका-पंचायतों को या जिला-पंचायतों को दिया गया है। इस संदर्भ में ग्राम-सभा (जिसमें सभी मतदाता सदस्य होते हैं) की भूमिका ‘सबका साथ, सबका विकास’ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिसके लिए ग्राम-सभा को मजबूत करना जरूरी है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उसका प्रभाव भी विधानसभा के चुनाव में हुआ है।
 
अगले महीने गुजरात में पंचायती-राज 56वें वर्ष में प्रवेश करेगा। मगर वहां पंचायतें सही मायनों में तीसरी सरकार नहीं बन पाई हैं। इस समय ग्रामीण-क्षेत्र में हर गली में चुनाव-प्रतिनिधि हैं, जिसकी अपनी कुछ उम्मीदें हैं, जो पूरी नहीं हो रही हैं, वह एक महत्वपूर्ण धमकी साबित हो सकती है।

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