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लोकसभा चुनाव 2019: पंचायती राज को सशक्त कर ही मजबूत होगा लोकतंत्र
Tue, 30 Apr 2019 04:35 AM IST
Raman Singh
महीपाल
महीपाल
Published by: Raman Singh
Updated Tue, 30 Apr 2019 04:35 AM IST
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पंचायती राज विभाग (प्रतीकात्मक)
लोकसभा के चुनाव चल रहे हैं। विभिन्न संस्थाएं और मीडिया इन चुनावों के नतीजों के बारे में अपनी-अपनी राय दे रहे हैं, पर अधिकतर राय निष्पक्ष नहीं हैं। कोई यह नहीं देख रहा कि देश की लगभग 68 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है। वहां पर पंचायतें स्थानीय शासन की संस्थाएं हैं। इन संस्थाओं के चुनावों में मतों का प्रतिशत भी शत प्रतिशत होता है। पर पंचायतों की ओर कोई ध्यान नहीं है। राजनीतिक पार्टियों द्वारा पंचायतों की ओर ध्यान न देना उनके लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
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राजनीतिक दल किसानों एवं मजदूरों का वोट लेने के लिए अनेक तरह के वादे कर रहे हैं। कांग्रेस ने साल में 72,000 रुपये गरीबों के खाते में डालने का वादा किया है। भाजपा ने साल में 6,000 रुपये छोटे एवं सीमांत काश्तकारों के खाते में डालने का वादा किया और पहली किस्त उन्हें दे भी दी। पर उसे पता नहीं कि यह प्रयास घोड़े के सामने गाड़ी खड़े करने जैसा है। अधिकतर छोटे एवं सीमांत किसान खुद खेती न कर बटाई पर जमीन अन्य को देते हैं।
चूंकि बटाई वाला किसान जोखिम झेलता है, अतः उसे ही यह पैसा मिलना चाहिए था। इसका प्रभाव उल्टा भी पड़ सकता है। अगर गांवों में पंचायतों को हस्तांतरित होने वाले पैसे की बंदर बांट न हो, तो किसानों या मजदूरों को अलग से कुछ देने की जरूरत नहीं है। 14 वें वित्त आयोग द्वारा दो लाख करोड़ से अधिक पैसा सिर्फ ग्राम पंचायतों को जा रहा है। ग्रामीण विकास मंत्रालय का 2018-19 का बजट प्रावधान लगभग एक लाख पंद्रह हजार करोड़ था। इसके अलावा केंद्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं के तहत पैसा पंचायतों को जाता है। ग्राम पंचायतों में वार्ड सदस्य की कोई भागीदारी नहीं है। देश में करीब छह लाख गांव हैं, और करीब ढाई लाख ग्राम पंचायतें हैं। इनमें ग्राम पंचायत के अध्यक्षों को छोड़कर अन्य की भागीदारी न के बराबर है। वार्ड सदस्य असंतुष्ट हैं, क्योंकि गांव के विकास में कोई भागीदारी नहीं है। एक तिहाई से अधिक महिलाएं पंचायतों में विभिन्न पदों पर हैं, पर उनकी भी भागीदारी नहीं है।
ग्राम पंचायतों की बैठकों में वार्ड सदस्यों को बुलाया ही नहीं जाता। प्रत्येक महीने ग्राम पंचायत की बैठक होनी चाहिए, पर ऐसा कहीं नहीं होता। ग्राम पंचायत में कितना पैसा किस-किस मद के लिए आ रहा है और कहां-कहां खर्च हो रहा है, वह गांव में बोर्ड या दीवार पर लिखा जाना चाहिए, ताकि ग्रामीण उसे देख सकें। स्पष्ट है कि सांसद या नेता इस पर ध्यान नहीं देते, जिसका नतीजा इस चुनाव में सामने आएगा।
साफ है कि 'सबका साथ सबका विकास' मात्र नारा है। अभी दिया गया नारा, मैं चौकीदार हूं, तेजी से चलन में है। गांवों के अनेक युवा खुद को चौकीदार कह रहे है। मैं उनसे पूछता हूं कि अगर वे चौकीदार हैं, तो गांवों में पंचायतें सही कार्य क्यों नहीं कर रहीं, उसकी निगरानी करें। क्यों पैसा उचित प्रकार से विकास कार्यों में नहीं लग रहा है, उसकी जांच करें।
राजनीतिक पार्टियों द्वारा पंचायतों की कार्यवाही अधिनियम के अनुसार क्रियात्मक करने की जरूरत है। इस समय पैसे से ज्यादा जरूरी है भागीदारी। पंचायतों को सशक्त करने का अर्थ लोकतंत्र को मजबूत करना तथा स्थानीय स्तर पर आर्थिक विकास एवं सामाजिक न्याय की योजना बनाना व उनको लागू करना है। ऐसा नहीं हुआ है और पंचायतें व ग्राम सभाएं खुद को ठगी गई महसूस कर रही हैं। इसका असर चुनावी नतीजे पर पडे़गा, ऐसा प्रतीत होता है।