Bengal Panchayat Elections: बंगाल में पंचायत चुनाव की आहट, फिर हिंसा की आशंका
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विस्तार
पश्चिम बंगाल में अगले दो-तीन महीनों में पंचायत चुनाव होने वाले हैं। जिस राज्य में क्लब, छात्र संघ और सहकारिता के चुनावों में रक्तपात होता हो, वहां पंचायती राज जैसे निकायों के चुनावों को लेकर चिंता स्वाभाविक है। 2018 के चुनावों में जिस पैमाने पर हिंसा हुई थी, उसने झकझोर दिया था। आधिकारिक आंकड़े भले ही 50 से कम मौतों के हों, पर भाजपा के मुताबिक इससे कहीं ज्यादा विपक्षी कार्यकर्ता मारे गए थे, और सैकड़ों घायल हुए थे। यही नहीं, भय का आलम यह रहा कि 2018 में तृणमूल ने 34 फीसदी सीटें निर्विरोध जीत लीं। 58, 692 पंचायत सीटों में 20,076 ऐसी सीटें थीं, जहां तृणमूल के अलावा किसी और राजनीतिक दल या स्वतंत्र उम्मीदवार ने नामांकन नहीं भरा। यह पिछले 40 साल तक के रिकॉर्ड के तौर पर दर्ज हुआ। पहले के आंकड़ों पर गौर करें, तो 2003 में 11 फीसदी, 2008 में 5.6 फीसदी, 2013 में 10.7 फीसदी सीटें सत्तारूढ़ दलों ने निर्विरोध जीती थीं।
इस निर्विरोध जीत के पीछे के आतंक की कहानियां भी टीवी और अखबारों के जरिये उजागर होती रही हैं। आतंक फैलाने के लिए विपक्ष के संभावित उम्मीदवारों के घर पर बमबाजी, धमकी भरे फोन और कहीं-कहीं एक चिट के साथ घर के अहाते में उजली साड़ी फेंकने जैसे कायदे अपनाए जाते हैं और उस चिट में लिखा रहता है-अपने पति को चुनाव लड़ने से रोक दो, नहीं तो यह उजली साड़ी पहननी पड़ेगी। बंगाल में पंचायत चुनावों की अहमियत वाम जमाने से ही रही है और इन्हें सत्ता पाने की सबसे बड़ी सीढ़ी माना जाता रहा है।
बंगाल में वाम मोर्चे के सत्ता में आने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने बड़े पैमाने पर भूमि सुधार की प्रक्रिया शुरू की। 1977 से 80 के बीच 10 लाख एकड़ अतिरिक्त जमीन भूमिहीनों में बंटी। राज्य में उग्र ट्रेड यूनियनवाद और कई दूसरे कारणों से जब बंगाल के पुराने उद्योग-धंधे बंद होने लगे, तो वाम मोर्चा सरकार के तत्कालीन मुखिया बुद्धदेव भट्टाचार्य ने नई औद्योगिक नीति बनाई और बड़े निवेशकों के लिए लाल कालीन बिछा दी। अपनी जमीन के प्रति किसानों का भावात्मक लगाव सूंघकर ममता ने अपना आंदोलन गांवों की तरफ मोड़ा। नतीजा यह हुआ कि 2006 के सिंगुर आंदोलन और 2007 के नंदीग्राम कांड के बाद ममता बनर्जी बंगाल की ग्रामीण आबादी की प्रिय बन गईं, जो अब तक वाम मोर्चे का गढ़ था।
2011 में तृणमूल के सत्ता में आने के साथ ही लोक-लुभावन सरकारी योजनाओं से लोगों को खुश करने के साथ-साथ हर हालत में स्थानीय निकायों पर अपना कब्जा रखने की लपलपाती इच्छा ममता के कैडरों में भी पैदा हुई। भ्रष्टाचार का खुला खेल शुरू हो गया। इसकी बानगी प. बंगाल में प्रधानमंत्री आवास योजना में घपले की जांच के लिए चल रहे सर्वे से मिलती है। प. बंगाल में प्रधानमंत्री आवास योजना के लाभार्थियों की सूची से अब तक 5.5 लाख से अधिक लोगों के नाम हटाए जा चुके हैं। केंद्र सरकार की टीम जिलों के दौरे पर है और अब खुलासा हो रहा है कि इस योजना में कितने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है।
बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और खराब कानून-व्यवस्था से पैदा हुए प्रतिकूल मौसम में पंचायत चुनाव जीतने के लिए ममता ने दीदीर सुरक्षा कवच यानी दीदी का सुरक्षा कवच कार्यक्रम शुरू किया है। इसमें ममता सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का चक्र बनाकर घर-घर में स्टीकर के रूप में चिपकाया जा रहा है। हालांकि विपक्षी दल इसे घर-घर जाकर धमकाने की कवायद कह रहे हैं। एक योजना केवल चार महीनों के लिए (पंचायत चुनाव तक) शुरू की गई है, जिसमें प्रधानमंत्री पोषण योजना के तहत मिड डे मील में हर सप्ताह चिकन और मौसमी फल दिए जा रहे हैं। पर पूर्व मिदनापुर के एक स्कूल में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने आरोप लगाया कि उनके बच्चों को हलाल मीट खिलाकर उनका धर्म भ्रष्ट किया जा रहा है। पता नहीं, दीदी इस हलाल और झटका विवाद को कैसे सुलझाएंगी, पर राज्य की जनता तो बस इतना ही चाहती है कि आगामी पंचायत चुनावों में कुछ पैसों की एवज में झंडा ढोने वाले बेचारे निरीह कार्यकर्ताओं को हलाल न होना पड़े।