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फलस्तीन के दोस्त या दुश्मन

Thu, 17 May 2018 06:55 PM IST
ब्रेट स्टीफंस
ब्रेट स्टीफंस Updated Thu, 17 May 2018 06:55 PM IST
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Palestine's friends or enemies
फलस्तीन
दो हफ्ते में तीसरी बार गाजा पट्टी में फलस्तीनियों ने केरेम शलोम सरहद को आग के हवाले किया है, जबकि यहीं से उन्हें इस्राइल से आने वाली दवाएं, ईंधन और अन्य जरूरी सहायता मिलती हैं। ऐसे में हमें जल्द ही गाजा की भारी बदहाली की खबर मिलेगी। भूलना नहीं चाहिए कि इस बदहाली के किरदार ही संभावित पीड़ित भी हैं। 

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यह एक तरह का पैटर्न बन गया है, खुद को नुकसान पहुंचाओ और दूसरों पर दोष मढ़ो। इसे रेखांकित किया जाना जरूरी है, क्योंकि इस्राइली जब भी फलस्तीन के हिंसक हमलों के खिलाफ खुद का बचाव करते हैं, उन्हें अंधी नैतिकता और ऐतिहासिक रूप से अक्षम आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है।

1970 में गाजा सीमा के नजदीक औद्योगिक क्षेत्र स्थापित किया था, ताकि आर्थिक सहयोग बढ़ाकर फलस्तीनियों को रोजगार मुहैया कराया जा सके। पर 2004 में हुए अनेक आतंकी हमलों के बाद इसे बंद करना पड़ा। 2005 में यहूदी अमेरिकियों ने ग्रीन हाउस के निर्माण के लिए 1.4 करोड़ डॉलर का दान दिया था, जिनका इस्तेमाल इस्राइली लोगों ने तब तक किया था, जब एरियल शैरोन की सरकार ने गाजा पट्टी से वापसी का फैसला नहीं कर लिया। इस्राइल के वहां से जाने के तुरंत बाद ही फलस्तीनियों ने दर्जनों ग्रीन हाउस लूट डाले।

2005 में हमास ने अपने प्रतिद्वंद्वी फतह गुट के खिलाफ खूनी विद्रोह कर गाजा पर नियंत्रण कर लिया था। उसके बाद से हमास, इस्लामिक जेहाद और अन्य आतंकी गुटों ने गाजा पट्टी से इस्राइल पर तकरीबन दस हजार रॉकेट और मोर्टार दागे हैं और आर्थिक 'नाकेबंदी' की आलोचना की। इस्राइल ने इस कदम यह दिखाया था कि वह उन्हें नहीं खिला सकता, जो पलटकर उसे काटने दौड़ते हैं। मिस्र और फलस्तीन प्राधिकरण ने भी इस नाकेबंदी में हिस्सेदारी की थी। 

2014 में इस्राइल ने गाजा में ऐसी 32 सुरंगों का पता लगाया, हमास ने जिसका निर्माण इस्राइली लोगों की हत्या करने या उन्हें अगवा करने के लिए किया था। ऐसी एक सुरंग के निर्माण में तकरीबन साढ़े तीन सौ ट्रक भवन निर्माण सामग्री की जरूरत पड़ी थी। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने आकलन किया था कि इतनी सामग्री से 86 मकान, सात मस्जिद, छह स्कूल या 19 अस्पताल बन सकते थे। ऐसे में यदि आप यह जानना चाहते हैं कि गाजा गरीब क्यों है? तो यह उसका जवाब है। नतीजतन हम पिछले कुछ हफ्ते में गाजा में देख रहे हैं कि किस तरह से हजारों फलस्तीनी बाड़ तोड़कर इस्राइल में घुसने की कोशिश कर रहे हैं और उनमें से कई अपनी जान तक गंवा दे रहे हैं।

आखिर फलस्तीनियों के इस 'द ग्रेट रिटर्न मार्च' का मकसद क्या है? यह कोई रहस्य नहीं है। इसी हफ्ते न्यूयॉर्क टाइम्स में इस मार्च के एक आयोजक अहमब अबू अर्तमा का लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने इस्राइल की मूल सीमा पर स्थित अपनी जमीन का हवाला देते हुए लिखा, 'हम तब तक संघर्ष करेंगे, जब तक कि इस्राइल अपनी जमीन और अपने घर लौटने के हमारे अधिकार को मान्यता नहीं देता।' उनकी आपत्ति 'कब्जे' को लेकर नहीं है, जैसा कि अक्सर पश्चिमी उदारवादी 1967 के छह दिन के युद्ध के बाद इस्राइल द्वारा अधिग्रहीत की गई जमीन के संदर्भ में कहते हैं। इसका आशय इस्राइल के अस्तित्व से ही है। आप उनसे सहानुभूति रख सकते हैं, लेकिन उनकी राजनीति पर गौर कीजिए, वह यहूदी राज्य के खात्मे की बात कह रहे हैं। 

दुनिया आज मांग कर रही है कि प्रदर्शनकारियों पर की जा रही फायरिंग के लिए येरूशलम को जिम्मेदार ठहराया जाए, लेकिन इस संकट से उबरने के लिए कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं सुझाया जा रहा है। लेकिन तब नाराजगी क्यों नहीं दिखाई गई जब हमास ने फलस्तीनियों को बाड़ की ओर जाने के लिए उकसाया, जबकि इस्राइल उन्हें मोर्टार का शिकार होने की चेतावनी दे रहा था? या तब जब प्रदर्शन के आयोजक महिलाओं को आगे कर रहे थे, जैसा कि टाइम्स ने रिपोर्ट दी, इस्राइली सैनिक लगता नहीं कि महिलाओं पर फायरिंग करेंगे? या तब जब सात साल तक के बच्चों को बाड़ लांघने के लिए भेजा गया? या फिर तब जब इस्राइल की हमास नेताओं को दी गई इस चेतावनी के बाद कि उनके छिपने के ठिकाने जिनमें गाजा का अस्पताल भी शामिल है, निशाने पर आ सकते हैं और उनका खुद का जीवन जोखिम में पड़ जाएगा, प्रदर्शन रोक दिए गए?

दुनिया के किसी भी हिस्से में ऐसा होता, तो उसे खतरनाक करार दिया जाता। आत्मघाती और कायराना बताकर इसकी आलोचना की जाती। यह पश्चिम एशिया की राजनीति का रहस्य है कि आखिर क्यों फलस्तीनियों को इन साधारण नैतिक सवालों से अलग रखा गया। आखिर क्यों तथाकथित प्रगतिशील हमास के हत्यारों, महिला और समलैंगिकता विरोधियों के प्रति सहानुभूति जताते हैं? वह इस पर गौर क्यों नहीं करते कि खुद हमास ने स्वीकार किया है कि सोमवार को जिन 62 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई, उनमें से पचास हमास के सदस्य थे? आखिर क्यों वे इस्राइल के खुद की रक्षा करने के अधिकार का विरोध करते हैं? आखिर क्यों फलस्तीनियों से कुछ भी अपेक्षित नहीं है, और उनके हर कृत्यों को माफ कर दिया जाता है, जबकि इस्राइल से अपेक्षा की जाती है कि वह हर संभव कदम उठाए और उसके किसी कृत्य को माफ नहीं किया जाता?

इन सवालों के जवाब सहजता से मिल सकते हैं। ठीक इसी समय यह भी विचार किया जाना चाहिए कि पश्चिमी दखल ने फलस्तीनी आकांक्षाओं को कितना नुकसान पहुंचाया। हिंसा और खुद को पीड़ित बताने की संस्कृति से कोई उदार फलस्तीनी समाज नहीं उभर सकता। कोई सुयोग्य फलस्तीन सरकार तब तक नहीं उभर सकती, जब तक कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय भ्रष्ट और यहूदी विरोधी फलस्तीन प्राधिकरण को समर्थन देना बंद नहीं करता और हमास के कृत्यों की आलोचना कर उस पर प्रतिबंध नहीं लगाता। फलस्तीन की अर्थव्यवस्था तब तक फल-फूल नहीं सकती जब तक कि वह आत्मघाती कदम उठाना बंद नहीं करता।

 © The New York Times
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