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नापाक मंसूबे : पंजाब के बहाने कश्मीर पर नजर, राष्ट्रीय आपातकालीन योजना की दरकार

Sat, 25 Mar 2023 06:23 AM IST
Maroof Raza मारूफ रजा
Updated Sat, 25 Mar 2023 06:23 AM IST
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सार
पाकिस्तान शुरू से ही पंजाब के जरिये कश्मीर में अस्थिरता पैदा करना चाहता है। पंजाब की समस्या सिर्फ घरेलू कानून-व्यवस्था की नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी है। इसलिए केंद्र सरकार को राज्य सरकार के साथ मिलकर एक राष्ट्रीय आपातकालीन योजना बनानी चाहिए।
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Pakistan wants to create instability in Kashmir through Punjab
सुरक्षाबलों का फ्लैग मार्च। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

एक बार फिर पंजाब सुर्खियों में है। 'वारिस पंजाब दे' संगठन के प्रमुख अमृतपाल सिंह ने खालिस्तान की मांग उठाकर फिर से 1980 के दशक की खौफनाक यादें ताजा कर दी हैं। यह सिर्फ आतंरिक सुरक्षा का मामला नहीं है, बल्कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई गहरी साजिश के तहत खालिस्तानी आतंकवाद को हवा दे रहा है। इसलिए इस मामले को शुरू में ही खत्म कर देना चाहिए, ताकि खालिस्तानी आतंकवाद फिर से नासूर न बने और देश की सुरक्षा के लिए खतरा न पैदा हो। पाकिस्तान की गहरी साजिश को समझने के लिए अतीत पर नजर डालना समीचीन होगा।



पाकिस्तान की यह बहुत पुरानी सोच रही है कि पंजाब के जरिये कश्मीर में अस्थिरता पैदा की जाए। पाठकों को याद होगा कि 1989-90 में जब कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था, उससे पहले ही पाकिस्तान ने पंजाब में खालिस्तान की मांग को हवा देनी शुरू कर दी थी। सत्तर के दशक की शुरुआत में पहली बार खालिस्तान की मांग उठी थी। पंजाब के लोग भी भड़के हुए थे। उनका कहना था कि हम सबसे ज्यादा अनाज उगाकर देते हैं, पंजाब के बहुत से लोग सेना में हैं, देश और विदेशों में भी पंजाब के लोग बड़े-बड़े पदों पर काबिज हैं और पंजाबियों के कारण भारत में काफी विदेशी मुद्रा भी आ रही है। यह देश का सीमांत राज्य है, इसलिए पंजाब को विशेष राज्य का दर्जा मिलना चाहिए।


इन मांगों को लेकर 1978 में आनंदपुर साहिब प्रस्ताव भी पारित हुआ था। कट्टरपंथियों की मांग थी कि पंजाब के पानी पर उनका पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए, विशेष सुविधा मिलनी चाहिए। उनका कहना था कि या तो हमारी मांगें पूरी करें या हम बगावत करेंगे। उस समय सीमा पर सुरक्षा बंदोबस्त इतनी मजबूत नहीं थी, तो पाकिस्तान से हथियार और मादक पदार्थों की तस्करी पंजाब में होती थी। तब पंजाब में काफी खून-खराबा भी हुआ था, पर राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने शुरू में कोई सख्त कदम नहीं उठाया, क्योंकि राजनीतिक वर्ग पंजाब के अकालियों के साथ शांतिपूर्ण ढंग से समझौते के पक्ष में था। उस समय देश के राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह थे, जो खुद भी एक ग्रंथी थे और जरनैल सिंह भिंडरावाले वगैरह को जानते थे और उन्होंने समझौते की कोशिश भी की थी।

पाकिस्तान जो खेल हमारी सरकार को खिलवाना चाहता था, हमारे नेता वही खेल खेल रहे थे। यह मामला इतना बिगड़ गया कि स्वर्ण मंदिर में दिन दहाड़े पंजाब के डीआईजी एएस अटवाल की हत्या कर दी गई। राज्य में अशांति फैलने से पंजाब की अर्थव्यवस्था को बहुत नुकसान हुआ था। इसलिए युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा था और वे गलत रास्तों पर आगे बढ़ गए थे। राज्य में इतना खून-खराबा हुआ कि पांचों नदियों का पानी इंसानी लहू से लाल हो गया। इस घटना के बाद दिल्ली की सरकार की आंख खुली। फिर ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984) और ऑपरेशन ब्लैक थंडर (1988) हुआ था, तब जाकर दस साल बाद पंजाब में स्थिति नियंत्रण में आई। लेकिन इसकी कीमत देश को प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के रूप में चुकानी पड़ी।

इस बीच, पंजाब में हम इतने उलझ गए थे कि कश्मीर में क्या हो रहा है, उधर से हमारा ध्यान हट गया और फिर कश्मीर सुलगने लगा। इस समय भी जब कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था सख्त होने से पाकिस्तान की योजनाओं पर पानी फिरता नजर आ रहा है और उसके मंसूबे पूरे होते नहीं दिख रहे हैं, तो वह एक बार फिर से भारत को पंजाब में उलझाना चाहता है। उसकी योजना है कि एक बार यदि नई दिल्ली को पंजाब में उलझा दिया जाए, तो वे धीरे-धीरे कश्मीर में फिर से अपनी योजना को अंजाम देंगे। आईएसआई खालिस्तानी समर्थकों को हमेशा पनाह और हर तरह की सुविधा देता रहा है। वह उन-उन जगहों पर भारत विरोधी कार्रवाइयों को बढ़ावा दे रहा है, जहां सिख समुदाय के साथ पाकिस्तानी लोग भी बड़ी संख्या में हैं। अगर आपको इतिहास पता हो, तो आप देखेंगे कि पाकिस्तान उन्हीं पुराने नक्शे-कदम पर चलकर भारत को उलझाना चाह रहा है।

असल में पाकिस्तान 1971 की शिकस्त का अपमान अब भी पचा नहीं पाया है। 1971 के युद्ध में हार के बाद पाकिस्तान की सेना और आईएसआई ने  भारत से इसका बदला लेने के लिए कश्मीर या पंजाब को भारत से अलग करने की कसम खाई थी, जिसमें उनका इरादा कश्मीर को 'दूसरा बांग्लादेश' बनाने की है। इसलिए वह पंजाब और कश्मीर में अलगाववाद की आग को हवा दे रहा है। दूसरी बात यह है कि पंजाब के भीतर अब भी कई लोग ऐसे हैं, जो चाहते हैं कि पंजाब को विशेष दर्जा मिले। वे लोग खालिस्तान की मांग करने वाले कट्टरपंथियों के समर्थक हैं। इसके अलावा, पाकिस्तान कई वर्षों से पंजाब में मादक पदार्थों की आपूर्ति करता रहा है, जिस पर एक फिल्म भी बनी थी-उड़ता पंजाब।

इस तरह से पंजाब के युवाओं को पाकिस्तान ने एक तरह से ड्रग्स का गुलाम बना दिया। साथ ही पंजाब में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी अब भी हथियारों की आपूर्ति कर रहा है। सीमा पर सख्ती होने के चलते अब ड्रोन से हथियारों की आपूर्ति हो रही है। इन हथियारों को भविष्य में कभी इस्तेमाल किए जाने के लिए जमीन में गाड़ कर रखा जाता है। इस तरह की तैयारियां कई वर्षों से पाकिस्तान पंजाब में करता आ रहा है। एक समय केपीएस गिल ने पंजाब पुलिस को बेहतर बना दिया था, लेकिन अब पंजाब पुलिस बुरी तरह से नाकाम हो चुकी है, क्योंकि उनका प्रशिक्षण नहीं हो रहा है। उनके नेतृत्व में इन स्थितियों की गंभीरता को समझने की क्षमता नहीं है, वे अपने राजनीतिक आका के पिछलग्गु बने हुए हैं। इन वजहों से पंजाब का हाल बिगड़ चुका है।

जब तक केंद्र सरकार इसमें मदद नहीं करेगी, तब तक सुधार की गुंजाइश कम है। वैसे भी अभी पंजाब में उस पार्टी की सरकार है, जिसका केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी से अच्छा संबंध नहीं है। हमारी व्यवस्था में एक कमी है कि पुलिस राज्य सरकारों के अधीन होती है। केंद्र सरकार घरेलू कानून-व्यवस्था में ज्यादा हस्तक्षेप नहीं कर सकती है। यह स्थिति पाकिस्तान के लिए फायदेमंद है। लेकिन पंजाब की समस्या सिर्फ घरेलू कानून-व्यवस्था की नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी है। इसलिए केंद्र सरकार को राज्य सरकार के साथ मिलकर एक राष्ट्रीय आपातकालीन योजना बनानी पड़ेगी, जिसके तहत केंद्र सरकार को राज्य सरकार की मदद करनी होगी, क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा तो केंद्र की जिम्मेदारी है।

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