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पुलवामा पर घिरा पाकिस्तान, संयोग या चालबाजी, बता रहे हैं मारूफ रजा
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पुलवामा आतंकी हमला
- फोटो : PTI
यह संयोग ही प्रतीत होता है कि जिस हफ्ते भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा पुलवामा हमले में शामिल पाकिस्तानी आतंकवादियों के खिलाफ 13,500 पन्नों की चार्जशीट दाखिल करने की खबर अखबारों के पहले पन्ने की सुर्खियां बनी, उसी हफ्ते पाकिस्तान ने आधिकारिक रूप से कम से कम 87 आतंकियों की पुष्टि की, जो पाकिस्तान में हैं और वहां से अपनी गतिविधियां चला रहे हैं।
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पाकिस्तान की यह स्वीकारोक्ति फाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) से एक और राहत पाने के लिए आई है, क्योंकि पाकिस्तान संभावित काली सूची से बाहर रहने की कोशिश में लगा है, जो दिवालिया होने के कगार पर खड़े मुल्क पर वित्तीय प्रतिबंध आयद करेगा।
यह एफएटीएफ के लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि वह पाकिस्तान को काली सूची में डाले या नहीं, क्योंकि चीन उस पर बहुत ज्यादा दबाव बनाए हुए है। काली सूची में डाले जाने पर किसी भी देश के लिए अंतरराष्ट्रीय सहायता और धन पाना मुश्किल होता है, जिसकी पाकिस्तान को बहुत जरूरत है।
इस सूची को नियमित रूप से अपडेट किया जाता है और इसके दो स्थायी सदस्य ईरान और उत्तर कोरिया हैं। इस तरह पाकिस्तान उम्मीद करता है कि उसके ताजा वादों और अधिसूचनाओं के साथ, जिसमें उसने पाकिस्तान में रहने वाले आतंकियों की नई सूची घोषित की है, उसे थोड़ी राहत मिल सकती है।
इस प्रकार वर्षों के इन्कार के बाद वह यह मानने के लिए तैयार है कि दाऊद इब्राहिम पाकिस्तान में है, जो कि मुंबई में 1993 में हुए बम धमाकों का मास्टरमाइंड है। हालांकि एक दिन बाद अधिकारियों ने इससे इन्कार कर दिया। एनआईए की चार्जशीट इस बात की पुष्टि करता है कि पाकिस्तान की सेना और आतंकवादियों में साठ-गांठ कितनी गहरी है, कम से कम 25 वर्षों से भारत जोर देकर यह बात कह रहा है।
फोन कॉल और तस्वीरों के रिकॉर्ड के साथ अगर हम इसे एफएटीएफ तक पहुंचा सकें, तो यह निश्चित रूप से एफएटीएफ के लिए और भी सबूत का काम करेगा कि कैसे पाकिस्तानी सैन्य खुफिया एजेंसी आईएसआई ने न केवल आतंकवादियों को सीआरपीएफ के काफिले पर हमले के लिए उकसाया, बल्कि उसे धन भी मुहैया कराया और उसकी निगरानी भी की।
अगर पाकिस्तान को अंततः काली सूची में डाला गया, तो उससे हमें थोड़ी राहत मिलेगी, लेकिन केवल अस्थायी रूप से। पाकिस्तान की अपने आतंकी तंत्र के साथ साठ-गांठ जगजाहिर है और यह उसकी सामरिक नीति का हिस्सा है, जिसे वहां की सेना आसानी से नहीं त्यागने वाली है।
आश्चर्य नहीं कि इमरान खान नहीं, बल्कि पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल बाजवा ने हाल ही में कुछ और ज्यादा फंड पाने की चाहत में सऊदी अरब की यात्रा की थी। गौरतलब है कि इससे पहले भी सऊदी अरब से पाकिस्तान फंड पाता रहा है। बाजवा को डर है कि मुल्क और सैन्य प्रतिष्ठान को चलाने के लिए पाकिस्तान के पास धन नहीं बचेगा।
लेकिन सऊदी अरब से उन्हें दोहरी निराशा हाथ लगी। न केवल उन्हें मुल्क के वास्तविक शासक क्राउन प्रिंस सलमान से मिलने से मना कर दिया गया, बल्कि रियाद ने पाकिस्तान से तीन अरब डॉलर की सहायता राशि वापस लौटाने की मांग की, जो उसे पहले दिया गया था।
जाहिर तौर पर ऐसा पाकिस्तान के विदेश मंत्री कुरैशी द्वारा सऊदी अरब की अगुआई वाले इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के प्रति असंतोष जताने के दंड स्वरूप किया गया, जिन्होंने कहा था कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाए जाने के बाद ओआईसी ने भारत के खिलाफ पाकिस्तान के पक्ष में प्रस्ताव पारित नहीं किया।
पाकिस्तान के कई आतंकी संगठन कश्मीर में हिंसा भड़काने के लिए एक सस्ता सैन्य विकल्प हैं। यह पाकिस्तानी राजनेताओं को कश्मीर के मुद्दे पर जनता का ध्यान भटकाने में मदद करता है और विफल होने के कगार पर खड़े मुल्क को भारत-विरोध के करीब लाता है।
यह पाकिस्तान को अफगानिस्तान के एक बड़े हिस्से पर वास्तविक नियंत्रण रखने, किंगमेकर बनने और आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में अमेरिका का सहयोगी बनने की अनुमति देता है। इसने पाकिस्तान को आतंकवाद से लड़ने के लिए कम से कम 33 अरब डॉलर का अनुदान मुहैया कराया।
यह अलग बात है कि पाकिस्तान ने इसका उपयोग सीमापार भारत के खिलाफ आतंकवाद को प्रायोजित करने में किया। लेकिन अब वह फंडिंग बंद हो गई है और इस तरह से पाकिस्तान को नुकसान हो रहा है। इस प्रकार पाकिस्तान का अंतिम सहारा चीन है, क्योंकि खाड़ी में बहुत कम देश ही उसके दोस्त बचे हैं, जो वित्तीय सहायता देंगे, तो मुश्किलों के साथ।
चीन के पास हालांकि पाकिस्तान के लिए अपने सामरिक एजेंडे को पूरा करने की योजना है। पहला वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर अपने मौजूदा गतिरोध में उसने पाकिस्तान का इस्तेमाल किया, ताकि एलओसी से लेकर एलएसी तक भारत पर सैन्य दबाव बनाया जाए।
जैसा कि हाल ही में राष्ट्र को याद दिलाया गया कि भारत अकेला राष्ट्र है, जिसके दो परमाणु संपन्न, शत्रु पड़ोसी देश हैं। दूसरा है, पाकिस्तान को उतनी ही मदद, जितना वह चीन के बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव में मदद दे सकता है।
और अंत में ईरान और तुर्की के साथ अमेरिका और खाड़ी देशों के खिलाफ एक अक्ष बनाने के लिए पाकिस्तान का उपयोग करना। और इसके लिए पाकिस्तान कीमत चुकाने को तैयार हो सकता है। अंत में, कई पर्यवेक्षकों का यह मानना कि भारत को हजार टुकड़ों में काटने के लिए पाकिस्तान द्वारा आतंकवादियों के इस्तेमाल के पीछे जनरल जिया उल हक का दिमाग था, गलत है।
भारत के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध का इस्तेमाल वास्तव में जनरल अयूब खान ने अपने विचारकों की सलाह पर किया था, जिसका इस्तेमाल उन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध के शुरू में असफल रूप से किया था। हालांकि 1980 के दशक के उत्तरार्ध में जनरल जिया ने भारत से कश्मीर को अलग करने की पाकिस्तानी योजना की रूपरेखा पेश की थी।
यह पाकिस्तानियों के लिए भरोसे की चीज बन गया, हालांकि भारत की जवाबी कार्रवाई के चलते वह ऐसा करने में विफल रहा। लेकिन उसने यह किया कि पाकिस्तान को एक भारी हथियारों से सुसज्जित आतंकी मशीनरी के साथ छोड़ दिया, जिसे न तो वे खत्म कर सकते हैं और न ही पाकिस्तानी सेना उससे संघर्ष कर सकती है।