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पड़ोस: कार्यवाहक सरकार से निपटता पाकिस्तान, सांविधानिक भूमिका भूली हुकूमत और हुकमरान

Fri, 29 Sep 2023 07:42 AM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Fri, 29 Sep 2023 07:42 AM IST
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सार
संविधान के मुताबिक, पाकिस्तान के कार्यवाहक सरकार की एकमात्र भूमिका स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित कराना है, लेकिन यहां की मौजूदा कार्यवाहक सरकार अपने सांविधानिक अधिकार से परे जाकर नीतिगत घोषणाएं कर रही है और करदाताओं के पैसे पर प्रधानमंत्री विदेशों की सैर कर रहे हैं।
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Pakistan caretaker govt taking policy decision beyond constitutional power pm kakar touring in foreign
पाकिस्तान के कार्यवाहक प्रधानमंत्री अनवार-उल-काकर - फोटो : UN TV

विस्तार

कनेक्टिविटी ने पाकिस्तान में, खासकर मुल्क के उन हिस्सों में बड़ी भूमिका निभाई है, जो कमोबेश कटे हुए थे। सात दशकों बाद अब कई इलाकों को धीरे-धीरे खोजा जा रहा है। सिंधु घाटी सभ्यता के इतिहास और विरासत पर हाल ही में एक रिपोर्ट आई है, जिसमें हड़प्पा के सींगों से लेकर शिव के रथ तक अमर उजाला के पाठकों के लिए दिलचस्प जानकारियां हैं। ये जानकारियां मोहनजो दारो और हड़प्पा में खोजी गई पुरानी मुहरों से संबंधित हैं। इनमें से कई मुहरों पर बैल को दर्शाया गया है। बैल एक ऐसा पशु है, जो इन प्राचीन मुहरों पर दिखने वाले कई अन्य पशुओं की तुलना में कई मुहरों पर पाया जाता है।



इन प्राचीन घटनाओं को दर्ज करने वाले इतिहासकारों का कहना है कि एक मिथक के अनुसार, जब शिव त्रिपुरासुर से युद्ध करने वाले थे, तो जिस रथ पर वह सवार थे वह धंस गया, और न तो शिव और न ही ब्रह्मा उसे वापस खींच सके। देवताओं की निराशा को देखकर भगवान विष्णु एक बैल में बदल गए। उस बैल ने शिव और ब्रह्मा को ले जा रहे रथ को अपनी सींगों से उठा लिया और एक शक्तिशाली गर्जना की। लेखक अरशद अवान का कहना है कि सिंधु घाटी सभ्यता की खोज के समय से मोहनजो दारो की तथाकथित आदिम शिव मुहर, जिसे पशुपति मुहर भी कहा जाता है, व्यापक बहस का विषय रही है।


इन ऐतिहासिक विषयों से अलग, राजधानी इस्लामाबाद में मुल्क एक कार्यवाहक सरकार से निपटने की कोशिश कर रहा है, जो संविधान के अनुसार, तब गठित की जाती है, जब एक निर्वाचित सरकार का कार्यकाल खत्म हो जाता है और नए चुनाव का आह्वान किया जाता है। बांग्लादेश को छोड़कर मुझे नहीं लगता कि दक्षिण एशिया में कोई ऐसा देश है, जिसके संविधान में इस तरह की विवादास्पद जरूरत का प्रावधान हो। हालांकि कार्यवाहक सरकार की एकमात्र भूमिका स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित कराना है, लेकिन यहां की मौजूदा कार्यवाहक सरकार अपने सांविधानिक अधिकार से परे जाकर नीतिगत घोषणाएं कर रही है।

इन दिनों मुल्क में मीडिया अपेक्षाकृत स्वतंत्र है, हालांकि सुरक्षा प्रतिष्ठान पर टिप्पणी करने के मामले में स्व-प्रतिबंध जारी है। सोशल मीडिया ही वह जगह है. जहां सुरक्षा प्रतिष्ठान पर टिप्पणी की जाती है या उसका विश्लेषण किया जाता है, लेकिन अब उस पर भी निगरानी रखी जा रही है और हर दिन सरकार ट्विटर (अब एक्स) से उस व्यक्ति की शिकायत करती है, जिसने मुल्क के कानून का उल्लंघन किया है।

मेरे साथ ऐसा कई बार हुआ है, जब ट्विटर ने मुझे ई-मेल से सरकार की शिकायत के बारे में बताया है। आखिरी शिकायत एक ट्वीट से संबंधित थी, जिसमें वजीरिस्तान के उन बच्चों की तस्वीर थी, जो सेना द्वारा आतंकवादियों के खिलाफ लगाई गई बारूदी सुरंग में घायल होकर अपंग हो गए थे। वहां इस बात का कोई संकेत नहीं है कि अब वह इलाका अपेक्षाकृत शांत है और आतंकवादी वहां से चले गए हैं। यदि लाल झंडा या कुछ अन्य संकेतक लगा दिए जाएं, तो हर कोई बारूदी सुरंग वाले क्षेत्र से दूर रहेगा। मुझे याद है कि जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान छोड़ा था, जिस पर उन्होंने वर्षों तक कब्जा जमाए रखा था, तो जाने से पहले उन्होंने संयुक्त राष्ट्र को उन इलाकों का नक्शा दिया था, जहां उन्होंने बारूदी सुरंग लगाई थी, ताकि कोई नागरिक हताहत न हो।

स्वतंत्र मीडिया कार्यवाहक प्रधानमंत्री अनवर उल हक काकड़ की सरकार के बारे में खुले तौर पर आलोचनात्मक रहा है, जो इस तथ्य से कतराते नहीं हैं कि उन्हें और उनके मंत्रिमंडल को सुरक्षा प्रतिष्ठान द्वारा नामित किया गया है। एक ही दिन में कई इंटरव्यू देने के साथ-साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले कक्कड़ के अलावा कोई दूसरा प्रधानमंत्री मीडिया के लिए उपलब्ध नहीं रहा। शिक्षित और स्पष्टवादी होने के कारण वह मीडिया के सवालों को संभाल लेते हैं और सबसे कठोर प्रश्न से भी नहीं कतराते। लेकिन हाल के दिनों में करदाताओं की मेहनत की कमाई से कई देशों की अनावश्यक यात्रा को लेकर स्वतंत्र मीडिया और सोशल मीडिया में उनकी आलोचना हो रही है।

एक आलोचक का कहना है कि 'क्या इन फिजूलखर्ची वाली विदेशी यात्राओं की कोई जरूरत थी, जिनसे देश को कोई फायदा नहीं होता? कार्यवाहक सरकार को सुचारु लोकतांत्रिक सत्ता परिवर्तन का निष्पक्ष पर्यवेक्षक माना जाता है। किसी भी परिस्थिति में इससे समझौता नहीं किया जा सकता।' इसकी शुरुआत संयुक्त राष्ट्र महासभा के निमंत्रण से हुई, जिसमें विश्व के कुछ महत्वपूर्ण नेता अनुपस्थित रहे और उनका प्रतिनिधित्व उनके वरिष्ठ मंत्री कर रहे थे।

लेकिन काकड़ ने अपने और अपने परिवार के लिए पाकिस्तानी वायुसेना के विमान का इस्तेमाल किया और वह रावलपिंडी से उड़ान भरने के बाद ईंधन भरने के लिए पेरिस पहुंचे। रिपोर्टों में कहा गया है कि प्रधानमंत्री न्यूयॉर्क के लिए उड़ान भरने से पहले अपने परिवार को एफिल टावर पर एक रेस्तरां में डिनर के लिए ले गए थे। वहां उनकी किसी भी बड़ी राजनीतिक हस्ती से मुलाकात नहीं हो पाई। न्यूयॉर्क से काकड़ ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम के लिए लंदन गए, जहां वह कई दिनों तक रहे। यह यात्रा कैमरे में कैद हुई, जिसमें पैसे की कमी वाले मुल्क के प्रधानमंत्री को एक बहुत महंगे इतालवी ब्रांड के कपड़ों की दुकान से बाहर निकलते हुए देखा गया। हालांकि अब वह लौट आए हैं, लेकिन इससे पहले वह करदाताओं के पैसे पर फिर से उमरा के लिए सऊदी अरब में रुके।

लेकिन काकड़ की जिस बात के लिए सबसे कठोर आलोचना हो रही है, वह है जटिल विदेश नीति पर उनका बयान देना, जो उनके अधिकार से बाहर की बात है। हालांकि उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि चुनाव हो सकते हैं। लेकिन सबसे बड़ा डर यह है कि जिस तरह से कार्यवाहक सरकार काम कर रही है, उससे यह भी सवाल पैदा है कि क्या वह संविधान द्वारा निर्धारित अवधि से ज्यादा समय तक सत्ता में बने रहेंगे। पाकिस्तान के निर्वाचन आयोग ने बिना किसी निश्चित तिथि की घोषणा किए कहा है कि जनवरी के अंत में चुनाव होंगे, जिससे संदेह पैदा हो गया है। जनवरी के अंत में मुल्क के कई हिस्सों में कड़ाके की ठंड पड़ती है, खासकर उन इलाकों में जहां भारी बर्फबारी होती है और सड़क संपर्क टूट जाता है। 

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