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विश्लेषण: कठपुतली सरकार की तैयारी, सैन्य व्यवस्था के गणित में शरीफ को गले लगाने की बारी
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सार
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पाकिस्तान चुनाव आयोग
- फोटो :
सोशल मीडिया
विस्तार
कई विरोधाभासों एवं उथल-पुथल के बीच पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने वहां के चुनाव आयोग को आठ फरवरी, 2024 को आम चुनाव कराने की अंतिम तारीख तय करने के लिए मजबूर करने में अहम भूमिका निभाई, जिसे किसी न किसी बहाने से टाला जा रहा था और अनिश्चितता चरम पर थी। विश्लेषकों का मानना है कि इससे दो उद्देश्य पूरे हो सकते हैं। पहला, इससे पाकिस्तान के नाजुक लोकतंत्र के बारे में उम्मीदें जगेंगी, जिस पर हमेशा वहां की ताकतवर सेना द्वारा कब्जा किए जाने का खतरा रहता है। दूसरा, इससे स्थिरता की भावना पैदा होगी और कार्यवाहक सरकार को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से राहत पैकेज के लिए बातचीत करने में मदद मिलेगी।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि पाकिस्तान में लोकतंत्र कायम रहता है, तो यह भारत के लिए अच्छा संकेत है, क्योंकि पड़ोस में शांति रहने से सकारात्मक माहौल बनता है। आज जैसी स्थिति है, उसमें सेना की मदद से नवाज शरीफ के अगले प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं प्रबल हैं, जिससे भारत के प्रति शत्रुता थोड़ी कम हो सकती है। नवाज शरीफ ने पहले भी शांति की पहल की कोशिश की थी, हालांकि सैन्य जनरलों ने उसे विफल कर दिया था। कूटनीतिक सिद्धांत के अनुसार, भले ही दोनों देशों के रिश्तों को शत्रुता नियंत्रित करती हो, लेकिन बातचीत जारी रहनी चाहिए। यदि पाकिस्तान गंभीरता दिखाए और कश्मीर का मोह छोड़ दे, तो भारत फिर से बातचीत शुरू कर सकता है।
शहबाज शरीफ की सरकार ने वित्तीय संकट को प्रमुख कारण बताकर चुनाव में देरी करने की कोशिश की थी और शीर्ष अदालत के आदेश को मानने से इन्कार कर दिया था, जिसे सेना का भी समर्थन था। विगत नौ अगस्त को पाकिस्तान की संसद भंग हो गई थी, जिससे अराजक शासन का अंत हुआ और आम चुनाव का मार्ग प्रशस्त हो गया। प्रधानमंत्री अनवार उल हक के नेतृत्व में कार्यवाहक सरकार ने चुनाव कराने की प्रक्रिया तेज कर दी।
दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने जनगणना और निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन आदि का हवाला देकर संसद भंग करने के बाद निर्धारित 90 दिनों के भीतर चुनाव कराने में असमर्थता जताई थी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन, पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ तथा अन्य ने चुनाव आयोग को समय पर चुनाव कराने का निर्देश देने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को राष्ट्रपति अल्वी के साथ इस मुद्दे पर चर्चा करने का निर्देश दिया। इस तरह आम चुनाव कराने की अंतिम तारीख आठ फरवरी तय की गई।
पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की वतन वापसी का समय कोई संयोग नहीं है, बल्कि असीम मुनीर के सेना प्रमुख बनने के बाद सेना ने सावधानीपूर्वक इसकी योजना बनाई थी, जिसका उद्देश्य पाकिस्तान की सियासत में सेना की सर्वोच्चता को चुनौती देने वाले इमरान खान को ठिकाने लगाना है। जिस सैन्य व्यवस्था ने कभी नवाज शरीफ को देश से बाहर जाने पर मजबूर किया था, वही आज उन्हें गले लगाने के लिए तैयार है, क्योंकि पाकिस्तान के मौजूदा उथल-पुथल भरे दौर में उनसे बेहतर विकल्प उपलब्ध नहीं है। सेना ने तीन बार नवाज शरीफ को सत्ता से बेदखल किया और अब चुनाव से ठीक पहले नवाज की वापसी ने सेना का काम आसान कर दिया।
नवाज शरीफ इमरान खान के प्रति कटुता से भरे हुए हैं, इसलिए सुलह की कोई संभावना नहीं है और प्रमुख विपक्षी दल पीटीआई को कोई मौका नहीं दिया जा रहा है। इमरान की गिरफ्तारी के बाद उनकी पार्टी पीटीआई की स्थिति खराब हो गई है और एक अदालत ने उनके खिलाफ मुल्क के गोपनीय दस्तावेजों को लीक करने का आरोप लगाया है, जिसमें उन्हें मौत की सजा भी हो सकती है। चुनाव आयोग द्वारा अयोग्य घोषित कर दिए जाने के बाद जब तक उन्हें हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिल जाती, तब तक वह चुनाव नहीं लड़ सकते।
विश्लेषकों का कहना है कि पिछले एक साल के दौरान चार घटनाओं ने पूरे पाकिस्तान के सियासी माहौल को बदलकर रख दिया है। पहली घटना, मई, 2023 में नेशनल एसेंबली में एक विधेयक पारित किया गया, जिसमें आजीवन अयोग्यता की अवधि को घटाकर पांच साल कर दिया गया, जिसका उद्देश्य नवाज शरीफ की वापसी सुनिश्चित करना था। दूसरी घटना, नौ मई को इमरान समर्थकों द्वारा सेना मुख्यालय में तोड़फोड़ की है, जब सेना प्रमुख मुनीर को अपनी स्थिति मजबूत करने का सुनहरा मौका मिला। मुनीर ने तीन वरिष्ठ अधिकारियों को बर्खास्त करके अपने अधिकार को प्रदर्शित किया, जो देश की घरेलू राजनीति को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त है।
तीसरी घटना इमरान समर्थक सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश की जगह नए प्रधान न्यायाधीश के रूप में काजी फैज ईसा की नियुक्ति है, जिसने नवाज की पार्टी को बड़ी राहत दी, जो उनसे निष्पक्ष फैसले की उम्मीद करती है। चौथी घटना नवाज की पाकिस्तान वापसी है, अगर वह पाकिस्तान के अगले प्रधानमंत्री बनते हैं, तो भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव कम हो सकता है। नवाज ने संकेत दिया है कि वह पड़ोसियों के साथ शांति चाहते हैं और बदले की राजनीति से बचना चाहते हैं।
नवाज उम्मीद करते हैं कि चुनाव कराने के लिए परिसीमन और जनगणना की प्रक्रिया समय पर पूरी हो जाएगी। नवाज शरीफ ने अपने परिवार के साथ किए गए दुर्व्यवहार के बारे में लोगों को बताया और अपने भ्रष्टाचारों पर पर्दा डालने के लिए इमरान सरकार के बदले की राजनीति का जिक्र किया। इस्लामाबाद स्थित विशेषज्ञ यह संभावना भी जताते हैं कि शरीफ बंधु भारत कार्ड भी खेल सकते हैं और इमरान खान को भारतीय एजेंट बता सकते हैं। उनका मानना है कि ऐसा लगता है कि सेना ने इमरान खान की पार्टी की जीत की किसी भी संभावना को कम करने के लिए नवाज शरीफ पर भरोसा करने का आखिरी विकल्प चुना है।
अगले साल की शुरुआत में आम चुनाव होने वाले हैं, जिसका मतलब होगा कि पाकिस्तान में छद्म ही सही, लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया जारी रहेगी। इमरान खान के अमेरिका विरोधी और भारत विरोधी रुख को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि नवाज शरीफ थोड़े बेहतर साबित हो सकते हैं, पर हमें रुककर आगे की घटनाओं को देखना होगा।