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पाकिस्तान और सहिष्णुता: अल्पसंख्यकों के बीच असुरक्षा की भावना चिंताजनक, अल्पसंख्यक आयोग का गठन आशावादी पहल

Fri, 12 Jul 2024 07:17 AM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Fri, 12 Jul 2024 07:17 AM IST
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सार
मुल्क विभाजन के वक्त पाकिस्तान की आबादी का 23 फीसदी हिस्सा अल्पसंख्यक यानी गैर-मुस्लिम था। अफसोसनाक बात है कि आज यह आंकड़ा घटकर तीन से चार फीसदी मात्र रह गया है। ऐसे में गिनी-चुनी जगहों पर कुछ अल्पसंख्यकों का पहुंचना पाकिस्तान को सहिष्णु और पूर्ण समावेशी बनाने के लिए काफी नहीं।
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Pakistan and tolerance insecurity among minorities worrying Minority Commission formation optimistic initiativ
पाक सेना के अधिकारी जूलियन (फाइल) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यह महिलाओं के एक समूह की सच्ची दास्तां है, जिसने एक बेहद जरूरी छुट्टी पर जाने का फैसला किया। लेकिन छुट्टी पर समूह में जाने की एक शर्त थी, जिस पर यात्रा से पहले सबको सहमत होना था। शर्त यह थी कि यह छुट्टी फोन मुक्त होगी। किसी को भी मोबाइल फोन ले जाने की अनुमति नहीं थी। यदि कोई तस्वीरें लेना चाहती है, तो उसे अपने साथ पारंपरिक कैमरा लेकर जाना होगा या वे डिस्पोजेबल कैमरा से फोटो ले सकती हैं, जो अब बेहद आम है। 



क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जिन महिलाओं को अपने मोबाइल फोन की लत थी, उन्हें बातचीत की कला सीखनी पड़ी? वास्तव में उन्हें एक-दूसरे से बातचीत करनी पड़ी और हमेशा एक्स (ट्विटर) या इंस्टाग्राम पर संदेश भेजने से वंचित रहना पड़ा। ऐसा करना सबके लिए आसान नहीं होता, क्योंकि लोगों को मोबाइल फोन की इतनी ज्यादा लत लग गई है कि वे रात में अपने बिस्तर के बगल में टेबल पर फोन रखते हैं।  


क्या किसी को याद है कि कैसे दशकों पहले जब लोग विदेश में छुट्टियां मनाने जाते थे और घर पर दोस्तों व परिवार के साथ संपर्क में रहने का एकमात्र तरीका रंगीन पोस्टकार्ड भेजना था या कोई अपने वतन में किसी से बात करना चाहता था, तो उसे होटल से लैंडलाइन या बाहर किसी सार्वजनिक टेलीफोन बूथ से कॉल बुक करनी पड़ती थी? यह निश्चित रूप से एक अलग दुनिया लगती है। लेकिन आज जब आप छुट्टियों पर रहते हैं, तब भी किसी चीज से वंचित नहीं रहते, क्योंकि मोबाइल फोन और ऑनलाइन खबरें आपको दुनिया में हो रही हर हलचल से वाकिफ रखती हैं। आपसे कुछ भी नहीं छूटता है। इसके अलावा टेलीविजन सेट तक आसान पहुंच यह भी सुनिश्चित करती है कि आप वास्तविक दुनिया से कटे न रहें और हर गतिविधि की अद्यतन जानकारी आपको मिलती रहे। 

खैर, मैं एक बेहतरीन खबर के साथ लौटी हूं, जो एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार एक गैर-मुस्लिम (वास्तव में ईसाई) व्यक्ति मुल्क के विशेष सेवा समूह में बहुत वरिष्ठ पद तक पहुंचा है। अमर उजाला के अपने पाठकों को बता दूं कि मुल्क विभाजन के वक्त पाकिस्तान की आबादी का 23 फीसदी हिस्सा अल्पसंख्यक यानी गैर-मुस्लिम था। अफसोसनाक बात है कि आज यह आंकड़ा घटकर तीन से चार फीसदी मात्र रह गया है। विभाजन के बाद बड़ी संख्या में हिंदू और सिख पलायन करके पाकिस्तान से भारत चले गए। आज पाकिस्तान में बचे अल्पसंख्यकों में हिंदू, सिख, ईसाई, पारसी, बौद्ध, अहमदिया, बहाई और अन्य शामिल हैं।

पाकिस्तान ने अंतर-धार्मिक सद्भाव बनाने के लिए एक राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग गठित किया है। इसलिए जब मेजर जनरल जुलियन जेम्स सेना के विशेष सेवा समूह में दो-सितारा जनरल का पद हासिल करने वाले पहले गैर-मुस्लिम बने, तो इसे एक बड़ी उपलब्धि माना गया। उनकी पदोन्नति के बाद एक टिप्पणी में कहा गया, 'सरकारी हलकों में महत्वपूर्ण माना जाने वाला यह मील का पत्थर न केवल मेजर जनरल जेम्स के लिए व्यक्तिगत जीत का प्रतीक है, बल्कि जाति और पंथ से परे प्रदर्शन और योग्यता को पुरस्कृत करने की सशस्त्र बलों की प्रतिबद्धता का भी उदाहरण है।' 

ऐसी घटनाएं अक्सर नकारात्मक आख्यानों को चुनौती देती हैं और ज्यादा आशावादी नजरिया पेश करती हैं। ऐतिहासिक रूप से, धार्मिक असहिष्णुता से प्रेरित घटनाओं ने पाकिस्तान के अल्पसंख्यक समुदायों के बीच असुरक्षा की भावना को बढ़ाया है-एक ऐसी भावना, जो मुल्क के विभिन्न हिस्सों में हाल ही में हुई मजहबी हिंसा की घटनाओं से और भी ज्यादा तेज हो गई है।

हालांकि, मेजर जनरल जेम्स की पदोन्नति इस विपरीत धारणा को सार्वजनिक रूप से पुष्ट करती है कि सैन्य और सरकारी सेवाओं में अल्पसंख्यक समूहों के प्रति पूर्ण स्वीकृति, समावेशन और न्यायसंगत व्यवहार होता है। इससे पहले एक और उल्लेखनीय उपलब्धि तब देखने को मिली थी,  जब डॉ. हेलेन मैरी रॉबर्ट्स मेडिकल कोर में ब्रिगेडियर बनने वाली पहली ईसाई महिला बनीं। डॉ. रॉबर्ट्स की सफलता पूरे पाकिस्तान में महिलाओं को प्रेरित करती है, खासकर ईसाई समुदाय की महिलाओं को। आर्मी मेडिकल कोर से जुड़ी ब्रिगेडियर डॉ. हेलन की पदोन्नति ने भी व्यवस्था में गहरी जड़ जमाए बैठी रूढ़ियों को तोड़ा है और महिलाओं एवं अल्पसंख्यकों के उच्च पदों तक पहुंचने की क्षमता को दर्शाया है। निश्चित रूप से उनकी सफलता लड़कियों एवं अल्पसंख्यक समुदायों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। 

अब बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सेना में हिंदू और सिख समुदायों के लोग शामिल हो रहे हैं और तथ्य यह है कि वे शिक्षा हासिल करना चाहते हैं और सेना उन्हें प्रोत्साहित कर रही है मुझे याद है कि सबसे पहले मैंने ही हिंदू अधिकारी डॉ. कैलाश कुमार का इंटरव्यू लिया था, जब उन्हें लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर प्रोन्नत किया गया था। जब मुझे उनका इंटरव्यू लेने का मौका मिला, तब वह काकुल सैन्य एकेडमी से पास ही हुए थे। लेकिन सबसे दिलचस्प इंटरव्यू पाकिस्तानी सेना में शामिल होने वाले पहले सिख अधिकारी का था। वह सिख अधिकारी हैं हरचरण सिंह, जो पाकिस्तानी सेना में मेजर के पद पर कार्यरत हैं। 

लेकिन दिलचस्प तथ्य यह भी है कि पाकिस्तान के संविधान के मुताबिक मुल्क का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने के लिए मुसलमान होना जरूरी है। पाकिस्तान में गैर-मुस्लिम प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पदों पर कभी आसीन नहीं हो सकते। अच्छी बात है कि पाकिस्तानी सेना में शामिल होने के लिए इस तरह के नियम व विनियम आवश्यक नहीं हैं। किसी गैर-मुस्लिम के सेना प्रमुख बनने पर सांविधानिक रोक नहीं है, कम से कम इस मामले में पाकिस्तानी सेना सहिष्णु और लोकतांत्रिक है, हालांकि तथ्य यह भी है कि मुल्क में अब तक कोई गैर-मुस्लिम सेना प्रमुख नहीं बना है।

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