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पाकिस्तान में किसकी शह पर मुखर है विपक्ष, बता रही हैं मरिआना बाबर
Fri, 25 Sep 2020 04:44 AM IST
मरिआना बाबर
पाकिस्तान में किसकी शह पर मुखर है विपक्ष मरिआना बाबर
पाकिस्तान में किसकी शह पर मुखर है विपक्ष मरिआना बाबर
Published by: मरिआना बाबर
Updated Fri, 25 Sep 2020 04:44 AM IST
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सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा और बिलावल भुट्टो
- फोटो : facebook
पीपीपी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो के साथ शेरी रहमान, पीएमएल (एन) प्रमुख शहबाज शरीफ और विपक्षी दलों के अन्य प्रमुखों एवं सदस्यों को चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल कमर जावेद बाजवा द्वारा गिलगिट-बाल्टिस्तान पर चर्चा के लिए आमंत्रित किया गया था, जिसे पाकिस्तान में काफी महत्व मिला। इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) के मेस में आईएसआई के महानिदेशक जनरल फैज हमीद भी मौजूद थे। ‘हम यहां आईएसआई के मेस में क्यों पहुंचे हैं? प्रधानमंत्री कहां हैं? गिलगिट-बाल्टिस्तान पर चर्चा प्रधानमंत्री आवास पर क्यों नहीं हो रही है?’ वरिष्ठ सांसद और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के उपाध्यक्ष शेरी रहमान ने हैरानी के साथ ये सवाल पूछे।
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उनके सवाल वाजिब थे, क्योंकि गिलगिट-बाल्टिस्तान एक राजनीतिक मुद्दा है, लिहाजा लाजिमी यही है कि इमरान खान विपक्ष के साथ बैठक करें और संसद में इस पर बहस हो कि क्या इसे कानूनी रूप से पाकिस्तान का पांचवां प्रांत घोषित किया जाना चाहिए? जनरल बाजवा को उम्मीद थी कि विपक्षी दलों के सदस्यों के साथ इस बैठक को गुप्त रखा जा सकता है। पर डिनर में शामिल रेल मंत्री शेख रशीद ने इसे सार्वजनिक कर दिया। बाद में जब मीडिया ने पीएमएल (एन) की वरिष्ठ नेता मरियम नवाज शरीफ को घेरा कि उनकी पार्टी के सदस्यों ने सैन्य नेतृत्व के साथ गिलगिट-बाल्टिस्तान पर चर्चा क्यों की, तो वह बहुत शर्मिंदा हुईं। उन्होंने कहा कि ‘मैं मानती हूं कि यह गलत है। यह एक राजनीतिक मुद्दा है और इस पर चर्चा संसद में होनी चाहिए, न कि सैन्य मुख्यालय में।'
इस बैठक का समय बहुत दिलचस्प था। संसद में एफएटीएफ से संबंधित मनी लॉन्ड्रिंग संबंधी एक विधेयक पर बहस चल रही थी। इस पर कानून बनाने के लिए संसद का संयुक्त अधिवेशन बुलाया गया, लेकिन विपक्षी दल इसमें संशोधन की मांग कर विधेयक का विरोध कर रहे थे। उन्हें लगता था कि अगर मौजूदा स्वरूप में यह कानून बन जाता है, तो सरकार चाहे, तो विभिन्न मामलों में विपक्षी दलों के सदस्यों के खिलाफ इसका इस्तेमाल कर सकती है। पर सरकार के साथ सेना की सहमति बन गई थी, जो विधेयक को पास कराने की जल्दी में थी, और विपक्ष के करीब पचास सदस्य संयुक्त सत्र से गायब थे। इस प्रकार विपक्ष ने बहुमत खो दिया। ऐसे में सत्ता पक्ष को बिल पास कराने में कोई समस्या नहीं आई, क्योंकि उनके पास आवश्यक संख्या बल था। उसकी अगली रात जनरल बाजवा ने विपक्षी नेताओं को डिनर पर बुलाया।
दिलचस्प है कि कुछ दिनों बाद रविवार को पीपीपी द्वारा दर्जनों विपक्षी दलों के नेताओं का एक बहुदलीय सम्मेलन किया गया। दो साल में पहली बार पीएमएल (एन) के नेता ने सम्मेलन को संबोधित किया और सरकार द्वारा रोकने की पूरी कोशिश करने के बावजूद टीवी पर विपक्षी नेताओं के भाषणों का लाइव प्रसारण हुआ। नवाज शरीफ ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए जो कहा, उसमें कुछ भी नया नहीं था। उन्होंने जनता के मतों का सम्मान करने और नागरिक सरकार की सर्वोच्चता की बात की। उन्होंने कहा कि उनकी लड़ाई इमरान खान से नहीं है, जिन्हें प्रधानमंत्री के रूप में थोपा गया है, बल्कि उनकी लड़ाई उसके खिलाफ है, जिसने उन्हें थोपा है। उनका मतलब सैन्य प्रतिष्ठान से था।
अंग्रेजी दैनिक डॉन ने अपने संपादकीय में लिखा, 'इस्लामाबाद में हुए बहुदलीय सम्मेलन में नवाज शरीफ ने अपने भाषण में ऐसा कुछ भी नहीं कहा, जो उन्होंने पहले न कहा हो। पर उनके भाषण से लग रहा था, जैसे वह फिलहाल बिखरे हुए विपक्ष को जोड़ने की कोशिश कर रहे हों। लंबे समय तक चुप रहने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री ने अपनी सत्ता विरोधी भावना को पुनर्जीवित किया, जिसे लगता है कि उनकी पार्टी ने राजनीतिक लाभ के लिए पीछे छोड़ दिया था।' नवाज शरीफ ने अपने भाषण के जरिये मुल्क में तूफान खड़ा कर दिया और यह भी दिखाया कि वह अब भी बहुत लोकप्रिय नेता हैं, और फिलहाल स्वास्थ्य कारणों से दूर हैं। नवाज शरीफ ने कहा कि ‘पहले कहा जाता था कि पाकिस्तान में एक सत्ता के भीतर एक और सत्ता है, लेकिन आज वह दूसरी सत्ता जनता के शासन से भी ऊपर है।' ऐसा कहकर उन्होंने इशारा किया कि सैन्य प्रतिष्ठान ने राजनीतिक सत्ता पर
पूरी तरह कब्जा कर लिया है।
एक राजनीतिक विश्लेषक का कहना है कि ‘लोकतांत्रिक संस्थानों के कमजोर पड़ने के कारण ही सैन्य प्रतिष्ठान राजनीतिक सत्ता पर छा गया है। राजनीतिक दल भी इसके लिए बराबर के जिम्मेदार हैं।' मंत्रिमंडल के सदस्यों ने अगले दिन भारतीय अखबारों को लहराते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिनमें नवाज शरीफ के भाषण को सुर्खियों में छापा गया था। हिंदुस्तान टाइम्स की कॉपी लहराते हुए वरिष्ठ मंत्री असद उमर ने कहा, नवाज शरीफ के भाषण से भारतीय मीडिया में उत्साह का माहौल है। विपक्षी दलों ने सम्मेलन इसलिए किया, क्योंकि पिछले दो साल से इमरान खान सरकार द्वारा किए जा रहे उत्पीड़न से त्रस्त थे, और प्रधानमंत्री ने उनसे मिलने और बात करने से भी इंकार कर दिया था।
जैसा कि इतिहास बताता है कि सत्ता पर काबिज सरकार को सड़क पर किए जाने वाले आंदोलनों से तब तक हटाना आसान नहीं है, जब तक कि उसे सैन्य प्रतिष्ठान का समर्थन न प्राप्त हो। क्या विपक्षी दलों को सरकार को हटाने की खातिर एकजुट होने के लिए सैन्य प्रतिष्ठान से कोई संकेत मिला है? विपक्षी दलों के पास संसद से इस्तीफ देने का भी एक विकल्प है, पर वे अभी इंतजार करना चाहते हैं। इस बीच जोरदार आवाज उठी कि गिलगिट-बाल्टिस्तान को प्रांत का अंतिम दर्जा देने से पहले अंतरराष्ट्रीय कानून की अनदेखी नहीं की जा सकती है। विशेषज्ञों की सलाह है कि उसे पांचवां प्रांत बनाने से संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के अनुसार कश्मीर की विवादित स्थिति प्रभावित नहीं होनी चाहिए। इस क्षेत्र के लोग लंबे समय से कहते आ रहे हैं कि वे बाहरी महसूस करते हैं और पाकिस्तान में एकीकृत होना चाहते हैं। एक सलाह यह भी है कि गिलगिट-बाल्टिस्तान को अस्थायी तौर पर ही प्रांत का दर्जा दिया जाए, क्योंकि अंतिम स्थिति कश्मीर मुद्दे के समाधान पर निर्भर करेगी।