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पाकिस्तानी फौज के मोहरे
Updated Mon, 22 Apr 2013 10:48 PM IST
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दक्षिण एशिया में चुनावी अफरा-तफरी कोई नई बात नहीं है। हालांकि आश्चर्यजनक घटनाएं आम तौर पर मतदान के बाद परिणाम सामने आने पर घटती हैं। पर पाकिस्तान में होने वाले आम चुनाव ने वहां के आतंकित लोगों को चुनाव से पहले ही काफी झटके दिए हैं।
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यह वास्तव में दुर्लभ है कि उस सरकार के प्रधानमंत्री को ही चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा दिया गया है, जिसने चुनाव कराने के लिए कार्यवाहक सरकार का रास्ता साफ किया था। राजा परवेज अशरफ के प्रधानमंत्री बनने से पहले ही उन पर भ्रष्टाचार के आरोप रहे हैं।
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लेकिन पाकिस्तान में लंबे समय तक मार्शल लॉ लगाने और सैन्य शासन का नेतृत्व करने वाले एक भगोड़े जनरल की गिरफ्तारी की अकल्पनीय घटना अपनी तरह का पहला मामला है। जो व्यक्ति पाकिस्तान को बचाने के लिए निर्वासन से लौटा था, वह अपयश से खुद को ही नहीं बचा सका।
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परवेज मुशर्रफ यदि हथकड़ी लगाए जाने से बच गए, तो शायद इसलिए कि फौज का दबाव काम कर गया, जिसके वह कभी प्रमुख थे।
पाकिस्तान का आम चुनाव राजनीतिक वर्ग एवं न्यायपालिका (राजा अशरफ की गिरफ्तारी वारंट निकाले जाने के कारण), फौज एवं न्यायपालिका (वर्ष 2007 में 60 जजों को बर्खास्त करने एवं हिरासत में लेने के लिए मुशर्रफ पर दोषारोपण के कारण) एवं इस्लामी चरमपंथियों एवं कुछ राजनीतिक दलों के बीच जंग का मैदान बन गया है।
जाहिर है, वहां के लोग निराश हैं।
बीबीसी के एक सर्वे में बताया गया है कि उन्हें लोकतंत्र एवं चुनाव में जरा भी भरोसा एवं विश्वास नहीं रह गया है। वे चुने हुए प्रतिनिधियों के बजाय धर्म आधारित राजनीति को पसंद करते हैं, जो उन्हें शांति एवं समृद्धि दे सके।
वैसे भी केवल 45 फीसदी लोग ही वहां चुनाव में मतदान करते हैं। वहां के लोग रोजमर्रा के स्तर पर विभिन्न इस्लामी आतंकवादी गुटों की बढ़ती हिंसक गतिविधियों से भी आतंकित हैं। विगत जनवरी से वहां मरने वालों की संख्या में बढ़ोतरी शुरू हुई, जो चुनाव प्रचार के दौरान काफी बढ़ गई।
ओसामा बिन लादेन के सहयोगी अल-जवाहिरी का गुट तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) विशेष रूप से धर्मनिरपेक्ष दलों (जिनके एजेंडे में इस्लाम का नारा नहीं है) के उम्मीदवारों एवं कार्यकर्ताओं को अपना निशाना बनाता है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी, मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट ऑफ मुजाहिर और अवामी नेशनल पार्टी को धमकियों का सामना करना पड़ा है और उनके लोग हताहत हुए हैं। इन पार्टियों की रैलियां लगातार रद्द की जा रही हैं और प्रचार कार्य बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर इन सबका फायदा वैसे दलों एवं उम्मीदवारों को होगा, जिनका चरमपंथियों के साथ दोस्ताना संबंध रहा है। मसलन, पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग, इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए इंसाफ एवं जमाइत-उल-उलेमा-ए-पाकिस्तान, जमात-ए-इस्लामी जैसी इस्लामी पार्टियां उनमें शामिल हैं। लेकिन इस्लामी पार्टियां नवाज शरीफ एवं इमरान खान की पार्टियों के साथ चुनाव पूर्व गठजोड़ कर मुत्तहिदा मजलिस-ए-अमल (एमएमए) बनाने में विफल रही हैं।
अतीत में पाकिस्तान को बचाने के नाम पर सत्ता पर कब्जा करने वाली फौज, जिसकी छवि अमेरिका द्वारा एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन को खोजने के बाद बहुत खराब हुई थी, फिलहाल फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। मुशर्रफ को 'मसीहा' के रूप में पेश करने की फौज की योजना विफल हो गई है। अगर उन्हें चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित नहीं किया जाता, तो वह नेशनल एसेंबली के सदस्य जरूर बन जाते और संभवतः चुनाव के बाद राजनीतिक एवं सांविधानिक खेल करते।
सेना बाकी नेताओं में से किसी को चुन सकती है। तो क्या वह पीपीपी के नेतृत्व वाला गठबंधन होगा, जिसके साथ उसके संबंध असहज रहे हैं और जिसके बारे में माना जाता है कि वह तालिबान के हमले से बचकर किसी तरह बहुमत जुटा लेगा? या नवाज शरीफ, जो सर्वाधिक आबादी वाले पंजाब में काफी लोकप्रिय हैं और जिन्हें शायद मुख्यधारा की इस्लामी पार्टियों में शामिल होने पर तालिबान की धमकियों का लाभ मिलेगा?
इमरान खान पाकिस्तान के राजनीतिक क्षितिज के नए स्टार हैं। वह तालिबान समर्थक एवं पश्चिम विरोधी हैं तथा तालिबान की धमकियों का फायदा उठाने वालों में प्रमुख हैं। सुशिक्षित समाज एवं युवाओं के बीच वह काफी लोकप्रिय हैं, लेकिन पाकिस्तान में भी ज्यादातर मतदाता गांवों में रहते हैं।
चुनाव के बाद चाहे जो भी सत्ता में आए, तालिबान को कोई नहीं रोक सकता, क्योंकि वे अब कबीलाई इलाकों तक सिमटे नहीं हैं। प्रतिष्ठित साप्ताहिक फ्राइडे टाइम्स ने चेतावनी दी है कि वर्ष के अंत तक अफगानिस्तान एक और गृह युद्ध झेलने पर मजबूर होगा, जिसमें पाकिस्तान बिना सोचे-समझे कूद पड़ेगा। तालिबानी गुटों की पैसे की भूख बढ़ती जाएगी और जब कराची को पूरी तरह निचोड़ लिया जाएगा, तो वे लाहौर का रुख करेंगे और फिर वहां अपहरण एवं बैंक डकैती की घटनाएं बढ़ेंगी।
व्यावहारिक रूप से भारत के लिए स्थिति नहीं बदलेगी। छवि खराब होने के बावजूद वहां की फौज भारत, कश्मीर और परमाणु संबंधी नीति का निर्धारण करती रहेगी। बेशक पहले से ज्यादा व्यापार होंगे, आवाजाही बढ़ेगी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जन्मस्थान का दौरा करने के लिए नए सिरे से निमंत्रण दिए जाएंगे, लेकिन विभिन्न मंचों पर कश्मीर मुद्दे को उठाया जाएगा, सैन्य एवं कूटनीतिक स्तर पर भारत का विरोध जारी रहेगा और मुंबई जैसा हमला भी हो सकता है। जिन्होंने वाघा सीमा पर मोमबत्ती जलाई थी, वे भारत-पाक शांति का भ्रम अब भी पाल सकते हैं।