{"_id":"5d0e863e8ebc3e0a3936ef4d","slug":"p-chidambaram-says-government-within-government","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"सरकार के भीतर सरकार : आखिर में जिम्मेदारी मुखिया यानी सीएम या पीएम पर ही आती है","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया","slug":"opinion"}}
सरकार के भीतर सरकार : आखिर में जिम्मेदारी मुखिया यानी सीएम या पीएम पर ही आती है
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पी चिदंबरम
हर सरकार तब हैरत में पड़ जाती है, जब उसका सामना किसी गंभीर संकट से होता है। इसमें किसी न किसी की तो गलती होती है, लेकिन कोई जिम्मेदारी नहीं लेता। आखिर में जिम्मेदारी सरकार के मुखिया यानी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री पर ही आती है। हालांकि गहरी जांच से पता चलेगा कि वह पहले व्यक्ति नहीं हैं, जिन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
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हर सरकार तब हैरत में पड़ जाती है, जब उसका सामना किसी गंभीर संकट से होता है। इसमें किसी न किसी की तो गलती होती है, लेकिन कोई जिम्मेदारी नहीं लेता। आखिर में जिम्मेदारी सरकार के मुखिया यानी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री पर ही आती है। हालांकि गहरी जांच से पता चलेगा कि वह पहले व्यक्ति नहीं हैं, जिन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
क्रूर मौतें
इंसेफेलाइटिस के प्रकोप ने बिहार के मुजफ्फरपुर में 140 बच्चों को लील लिया है, जिस पर गौर किया जाना चाहिए। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मैनेजमेंट इन्फर्मेशन सिस्टम के मुताबिक जिले में स्थित सभी 103 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और एकमात्र सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को पांच में से शून्य रेटिंग मिली थी, क्योंकि वे मूल्यांकन के लिए अनिवार्य आवश्यकताओं (चिकित्सा अधिकारी, नर्स और आया) को पूरा नहीं करते थे।
मजफ्फरपुर के श्री कृष्णा मेडिकल कॉलेज और अस्पताल की बाल चिकित्सा इकाई, जहां प्रभावित बच्चों का इलाज किया गया था, बाल चिकित्सा से संबंधित आईसीयू के रूप में अर्हता प्राप्त करने के मापदंड पूरा नहीं करती। इन तथ्यों के आधार पर किसे जिम्मेदारी उठानी चाहिए? कोई इसके लिए तैयार नहीं, इसलिए हम एक छोटे (और स्वादिष्ट) फल को जिम्मेदार ठहराएंगे, जिसे लीची के नाम से जाना जाता है!
डॉक्टर कहते हैं कि लीची का सिर्फ उन बच्चों पर बुरा असर होता है, जिन्होंने रात को भोजन नहीं किया। तो उन बच्चों ने रात को भोजन क्यों नहीं किया? इसलिए क्योंकि वे गरीब हैं और उन्हें भोजन नहीं मिल सका। क्या कोई चीज इससे भी अधिक हताशाजनक और पीड़ादायक हो सकती है? (2008 और 2014 के दौरान इंसेफेलाइटिस से 6000 मौतें हुईं।)
अभी कुछ दिन पहले गुजरात के सूरत में एक सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय सात सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई। यह पहला मौका नहीं था, जब ऐसी त्रासदी हुई और दुखद है कि यह आखिरी बार नहीं है। सेप्टिक टैंक की सफाई कोई राकेट साइंस नहीं है। इसकी सफाई के लिए मशीनें उपलब्ध हैं और केरल के एक स्टार्ट अप ने इसका एक भारतीय संस्करण तैयार किया है। यदि किसी वजह से सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति जरूरी ही हो जाए, तो इसके लिए विशेष तरह के कपड़े, मास्क और ऑक्सीजन सिलेंडर उपलब्ध हैं।
ऐसे किसी उपकरण की न तो कमी है और न ही गुजरात के सबसे अमीर नगर निगमों में से एक सूरत की वित्तीय क्षमता से बाहर की चीज है, इसके बावजूद सात गरीब व्यक्तियों को मरने दिया गया। (2011 से 2018 के दौरान भारत के सभी राज्यों में कुल 114 सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई।)
क्रूर मौतें
इंसेफेलाइटिस के प्रकोप ने बिहार के मुजफ्फरपुर में 140 बच्चों को लील लिया है, जिस पर गौर किया जाना चाहिए। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मैनेजमेंट इन्फर्मेशन सिस्टम के मुताबिक जिले में स्थित सभी 103 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और एकमात्र सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को पांच में से शून्य रेटिंग मिली थी, क्योंकि वे मूल्यांकन के लिए अनिवार्य आवश्यकताओं (चिकित्सा अधिकारी, नर्स और आया) को पूरा नहीं करते थे।
मजफ्फरपुर के श्री कृष्णा मेडिकल कॉलेज और अस्पताल की बाल चिकित्सा इकाई, जहां प्रभावित बच्चों का इलाज किया गया था, बाल चिकित्सा से संबंधित आईसीयू के रूप में अर्हता प्राप्त करने के मापदंड पूरा नहीं करती। इन तथ्यों के आधार पर किसे जिम्मेदारी उठानी चाहिए? कोई इसके लिए तैयार नहीं, इसलिए हम एक छोटे (और स्वादिष्ट) फल को जिम्मेदार ठहराएंगे, जिसे लीची के नाम से जाना जाता है!
डॉक्टर कहते हैं कि लीची का सिर्फ उन बच्चों पर बुरा असर होता है, जिन्होंने रात को भोजन नहीं किया। तो उन बच्चों ने रात को भोजन क्यों नहीं किया? इसलिए क्योंकि वे गरीब हैं और उन्हें भोजन नहीं मिल सका। क्या कोई चीज इससे भी अधिक हताशाजनक और पीड़ादायक हो सकती है? (2008 और 2014 के दौरान इंसेफेलाइटिस से 6000 मौतें हुईं।)
अभी कुछ दिन पहले गुजरात के सूरत में एक सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय सात सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई। यह पहला मौका नहीं था, जब ऐसी त्रासदी हुई और दुखद है कि यह आखिरी बार नहीं है। सेप्टिक टैंक की सफाई कोई राकेट साइंस नहीं है। इसकी सफाई के लिए मशीनें उपलब्ध हैं और केरल के एक स्टार्ट अप ने इसका एक भारतीय संस्करण तैयार किया है। यदि किसी वजह से सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति जरूरी ही हो जाए, तो इसके लिए विशेष तरह के कपड़े, मास्क और ऑक्सीजन सिलेंडर उपलब्ध हैं।
ऐसे किसी उपकरण की न तो कमी है और न ही गुजरात के सबसे अमीर नगर निगमों में से एक सूरत की वित्तीय क्षमता से बाहर की चीज है, इसके बावजूद सात गरीब व्यक्तियों को मरने दिया गया। (2011 से 2018 के दौरान भारत के सभी राज्यों में कुल 114 सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई।)
आहत करने वाली उपेक्षा
एक और आहत करने वाला अविश्वसनीय आंकड़ा हैः दिल्ली में रोजाना औसतन चार लोगों की सड़क हादसों में मौत हो जाती है। आप कल्पना कर सकते हैं कि चार लोग कल मारे जाएंगे, चार परसों और इसी तरह से चार के औसत से लोग रोजाना अकेले दिल्ली में मारे जाते हैं। पूरी दुनिया में एक साल के दौरान हवाई हादसों में मारे जाने वालों की संख्या इस आंकड़े का छोटा-सा हिस्सा भर होती है! आखिर हवाई यात्रा के लिए तो कड़े नियम हैं, लेकिन सड़क यात्रा के लिए शिथिल नियम क्यों हैं? (2011 से 2017 के दौरान दिल्ली में सड़क हादसों में 12,724 लोगों की मौत हो गई।)
क्या आपने कभी दिल्ली के बारापुला फ्लाईओवर से होकर यात्रा की है, जिस पर दिल्ली सरकार का पीडब्ल्यूडी विभाग 'गर्व' करता है और जिसे तैयार होने में बरसों लग गए? यह एक औसत फ्लाईओवर है, इसकी डिजाइन भी औसत है, यहां का सफर भी औसत ही है और इसका निर्माण भी बहुत खराब है।
जरा रास्ते में वाहन के दोनों ओर की दीवारों पर नजर डालें, तो पता चलेगा कि ये या तो चिपट गई हैं या टूट गई हैं, ऊंचाई असमान है, स्लैब उखड़ गए हैं, बहुत ही खराब ढंग से प्लास्टर और रंग-रोगन किया गया और कुल मिलाकर यह बहुत बदसूरत है। इसके बावजूद यह सभी गुणवत्ता परीक्षण पास कर गया और ठेकेदार को भुगतान भी कर दिया गया और 2010 में फ्लाईओवर का उद्घाटन भी हो गया। अधिक दिन नहीं हुए जब इसे मरम्मत के लिए बंद करना पड़ा।
क्या आपने कभी दिल्ली के बारापुला फ्लाईओवर से होकर यात्रा की है, जिस पर दिल्ली सरकार का पीडब्ल्यूडी विभाग 'गर्व' करता है और जिसे तैयार होने में बरसों लग गए? यह एक औसत फ्लाईओवर है, इसकी डिजाइन भी औसत है, यहां का सफर भी औसत ही है और इसका निर्माण भी बहुत खराब है।
जरा रास्ते में वाहन के दोनों ओर की दीवारों पर नजर डालें, तो पता चलेगा कि ये या तो चिपट गई हैं या टूट गई हैं, ऊंचाई असमान है, स्लैब उखड़ गए हैं, बहुत ही खराब ढंग से प्लास्टर और रंग-रोगन किया गया और कुल मिलाकर यह बहुत बदसूरत है। इसके बावजूद यह सभी गुणवत्ता परीक्षण पास कर गया और ठेकेदार को भुगतान भी कर दिया गया और 2010 में फ्लाईओवर का उद्घाटन भी हो गया। अधिक दिन नहीं हुए जब इसे मरम्मत के लिए बंद करना पड़ा।
इरादे और अमल
इन सारे मामलों में, और आप ऐसे दूसरे मामलों पर भी विचार कर सकते हैं, कोई नीतिगत नाकामी नहीं थी। किसी भी सरकार की नीति होती है, स्वास्थ्य सुविधाओं और अस्पतालों का निर्माण तथा संसाधनों और कर्मचारियों का इंतजाम करना; शहरों और कस्बों में गुणवत्ता युक्त ढांचे का निर्माण करना और सौंदर्यीकरण इत्यादि। विधायिका और कार्यपालिका (मंत्रीगण) नीति बनाते हैं और स्वाभाविक रूप से चाहते हैं कि उस पर प्रभावी तरीके से अमल हो। लेकिन इरादे और अमल के बीच बड़ा अंतर है।
क्यों? हम इसका जवाब देने में हिचकते हैं, लेकिन कहना जरूरी हैः सरकार यानी गवर्नमेंट (जिसमें 'जी' केपिटल है) के भीतर एक और गवर्नमेंट ( स्माल 'जी') है। इस स्माल-जी गवर्नमेंट ने बिग-जी गवर्नमेंट के साथ ही, कम से कम भारत में, लोगों को भी विफल कर दिया है। दो विरोधाभासी उदाहरणों से मैं इसे स्पष्ट करता हूं। नोटबंदी एक बड़ी नीतिगत भूल थी; जिन मंत्रियों ने इस नीति पर विचार किया और बिग-जी गवर्नमेंट का निर्माण किया उन्हें इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
दूसरी ओर जीएसटी एक अच्छी नीति है। इसके बावजूद इसने नोटबंदी जैसी परेशानी पैदा की, तो इसकी जिम्मेदारी स्माल-जी गवर्नमेंट को उठानी चाहिए। स्वच्छ भारत एक अच्छी नीति है, लेकिन राज्यों और गांवों में खुले में शौच करने की स्थिति से संबंधित गलत आंकड़े अंकित हैं और यह स्माल जी-गवर्नमेंट की धोखेबाजी को ही दर्शाता है। उज्जवला एक अच्छी नीति है, लेकिन एक वर्ष में तीन सिलेंडर बदलने जाने की दर स्माल-जी गवर्नमेंट की नाकामी है।
हम जब वोट देते हैं, तो हम लोग बिग-जी गवर्नमेंट के लिए वोट देते हैं। वहां एक स्माल-जी गवर्नमेंट भी होती है, जिस पर हम लोगों का कोई बस नहीं होता। उसके चयन, नियुक्ति, प्रशिक्षण, क्रमिक विकास, पदस्थापना, मूल्यांकन या पदोन्नति में हमारी कोई भूमिका नहीं होती।
क्यों? हम इसका जवाब देने में हिचकते हैं, लेकिन कहना जरूरी हैः सरकार यानी गवर्नमेंट (जिसमें 'जी' केपिटल है) के भीतर एक और गवर्नमेंट ( स्माल 'जी') है। इस स्माल-जी गवर्नमेंट ने बिग-जी गवर्नमेंट के साथ ही, कम से कम भारत में, लोगों को भी विफल कर दिया है। दो विरोधाभासी उदाहरणों से मैं इसे स्पष्ट करता हूं। नोटबंदी एक बड़ी नीतिगत भूल थी; जिन मंत्रियों ने इस नीति पर विचार किया और बिग-जी गवर्नमेंट का निर्माण किया उन्हें इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
दूसरी ओर जीएसटी एक अच्छी नीति है। इसके बावजूद इसने नोटबंदी जैसी परेशानी पैदा की, तो इसकी जिम्मेदारी स्माल-जी गवर्नमेंट को उठानी चाहिए। स्वच्छ भारत एक अच्छी नीति है, लेकिन राज्यों और गांवों में खुले में शौच करने की स्थिति से संबंधित गलत आंकड़े अंकित हैं और यह स्माल जी-गवर्नमेंट की धोखेबाजी को ही दर्शाता है। उज्जवला एक अच्छी नीति है, लेकिन एक वर्ष में तीन सिलेंडर बदलने जाने की दर स्माल-जी गवर्नमेंट की नाकामी है।
हम जब वोट देते हैं, तो हम लोग बिग-जी गवर्नमेंट के लिए वोट देते हैं। वहां एक स्माल-जी गवर्नमेंट भी होती है, जिस पर हम लोगों का कोई बस नहीं होता। उसके चयन, नियुक्ति, प्रशिक्षण, क्रमिक विकास, पदस्थापना, मूल्यांकन या पदोन्नति में हमारी कोई भूमिका नहीं होती।
हम इसे ऐसे ही नहीं चलने दे सकते। हमें स्माल-जी गवर्नमेंट को फिर से गढ़ना होगा। जिस तरह से हम लोग बिग-जी गवर्नमेंट और उस पर काबिज लोगों को हर पांच साल में पुरस्कृत करते हैं या दंडित करते हैं, उसी तरह से हमें हर पांच साल या उससे पहले स्माल-जी गवर्नमेंट और उस पर काबिज होने वालों को दंडित या पुरस्कृत करने का रास्ता तलाशना होगा। आज हम जिस मुख्य चुनौती का सामना कर रहे हैं, वह नीति निर्माण नहीं है। आज जो मुख्य चुनौती है, वह नीति बनाने में नहीं है। यह नीति के कुशल, किफायती और उत्कृष्ट कार्यान्वयन में है।
हिला मजदूरों को अग्रिम धनराशि देते हैं, जिसे उनकी मजदूरी से काट लिया जाता है। बेहद कम उम्र में शादी कर मां बन जाने वाली ये गरीब महिलाएं गर्भाशय निकलवा कर गन्ना कटाई के सीजन में लगातार काम तो पा लेती हैं, पर पूरी उम्र हार्मोन असंतुलन, मोटापे, मानसिक अवसाद आदि से जूझती रहती हैं। एक तरफ केंद्र में भाजपा के नेतृ्त्व वाली एनडीए सरकार ने महिलाओं का प्रसूति अवकाश बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दिया है, दूसरी ओर, महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना की गठबंधन सरकार की नाक के नीचे पिछले तीन साल से महिला कामगारों के साथ इस किस्म की अमानवीयता जारी है।
लिहाजा सिर्फ निजी अस्पतालों की शिनाख्त करना काफी नहीं है, इस सुनियोजित अपराध में लिप्त डॉक्टरों, अस्पतालों और ठेकेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होने के साथ पीड़ित महिलाओं को हर्जाना दिया जाना चाहिए, और इसका भी ध्यान रखना चाहिए कि भविष्य में ऐसी एक भी घटना न घटने पाए।
हिला मजदूरों को अग्रिम धनराशि देते हैं, जिसे उनकी मजदूरी से काट लिया जाता है। बेहद कम उम्र में शादी कर मां बन जाने वाली ये गरीब महिलाएं गर्भाशय निकलवा कर गन्ना कटाई के सीजन में लगातार काम तो पा लेती हैं, पर पूरी उम्र हार्मोन असंतुलन, मोटापे, मानसिक अवसाद आदि से जूझती रहती हैं। एक तरफ केंद्र में भाजपा के नेतृ्त्व वाली एनडीए सरकार ने महिलाओं का प्रसूति अवकाश बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दिया है, दूसरी ओर, महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना की गठबंधन सरकार की नाक के नीचे पिछले तीन साल से महिला कामगारों के साथ इस किस्म की अमानवीयता जारी है।
लिहाजा सिर्फ निजी अस्पतालों की शिनाख्त करना काफी नहीं है, इस सुनियोजित अपराध में लिप्त डॉक्टरों, अस्पतालों और ठेकेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होने के साथ पीड़ित महिलाओं को हर्जाना दिया जाना चाहिए, और इसका भी ध्यान रखना चाहिए कि भविष्य में ऐसी एक भी घटना न घटने पाए।