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Secularism: पश्चिम से अलग है हमारी धर्मनिपेक्षता, धर्म और राज्य के बीच सैद्धांतिक दूरी

Mon, 17 Oct 2022 08:12 AM IST
Swagato Ganguly स्वागतो गांगुली
Updated Mon, 17 Oct 2022 08:12 AM IST
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सार
भारत के प्रमुख धर्मों में सर्वधर्म समभाव को व्यावहारिक रूप में समान संरक्षण के रूप में लिया जाता है, जो धर्म और राज्य के अलगाव की पश्चिम की व्यापक समझ से अलग है।
 
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Our secularism is different from the West, the doctrinal distance between religion and the state
Constitution on India - फोटो : social media

विस्तार

भारतीय धर्मनिरपेक्षता को उदात्त रूप में 'सर्वधर्म समभाव' (यानी सभी धर्मों का बराबर सम्मान) के स्तर पर माना गया है, जो इसे पश्चिम की धर्मनिरपेक्षता से कुछ हद तक अलग करती है। इसके प्रमुख सिद्धांत को दार्शनिक और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ईश्वर और मनुष्य के बीच सौहार्दपूर्ण सद्भाव के रूप में स्वीकार किया है, जबकि पश्चिम में इन दोनों के बीच विरोध को ज्यादा चिह्नित किया गया है। भारत के प्रमुख धर्मों में सर्वधर्म समभाव को व्यावहारिक रूप में समान संरक्षण के रूप में लिया जाता है, जो धर्म और राज्य के अलगाव की पश्चिम की व्यापक समझ से अलग है।



इस अंतर को भारतीय धर्मनिरपेक्षता के समर्थकों, राधाकृष्णन द्वारा व्यापक रूप से धर्मनिरपेक्षता के एक प्रकार के रूप में माना गया है, जो भारतीय परिस्थितियों के ज्यादा अनुकूल है। उहाहरण के लिए, राजनीतिक विज्ञानी राजीव भार्गव कहते हैं कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता ने धर्म और राज्य के बीच अलगाव की सख्त दीवार खड़ी नहीं की, बल्कि इनके बीच एक सैद्धांतिक दूरी का प्रस्ताव दिया। इसके अलावा व्यक्तियों और धार्मिक समुदायों के दावों के बीच संतुलन बनाते हुए इसने कभी धर्मों के निजीकरण को चोट पहुंचाने का इरादा नहीं रखा। 


लेकिन, ऐसी 'सैद्धांतिक दूरी' समय की कसौटी पर कितना खरा उतरी है, और यह कितनी सैद्धांतिक रही है? या क्या धर्मनिरपेक्षता की ऐसी न्यूनतम समझ एक फिसलन पैदा करती है, जो अंततः इसे कमजोर बना देती है? यह धर्मनिरपेक्षता की औपनिवेशिक परिभाषाओं, या धार्मिक समन्वयवाद की पूर्व-औपनिवेशिक किस्मों, जैसे सम्राट अकबर की दीन-ए-इलाही से कितना अलग है? इन मुद्दों को ज्ञानवापी मस्जिद के ताजा विवाद ने फिर से उजागर कर दिया है, और बाबरी मस्जिद जैसे विवाद के फिर से उभरने की आशंका है। और इसने भारत की धर्मनिरपेक्षता की स्थिति को एक बार फिर से सुर्खियों में ला दिया है, जिसे सांविधानिक रूप से बनाए रखने की राज्य को शपथ दिलाई गई है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2019 में एक सर्वसम्मत फैसले से एक रेखा खींची गई, ताकि धार्मिक स्थलों पर ऐसे विवादों की पुनरावृत्ति को रोका जा सके। पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 में कहा गया था कि किसी भी पूजा स्थल के धार्मिक चरित्र को 15 अगस्त, 1947 के अनुसार बनाए रखा जाएगा, जब भारतीय धर्मनिरपेक्षता लागू हुई। बाबरी मस्जिद को अपवाद के रूप में रखा गया, क्योंकि यह माना गया कि इस पर 1947 से पहले से विवाद चल रहा था।

यह उम्मीद जताई गई थी कि इससे धार्मिक स्थलों पर विवादों की पुनरावृत्ति को रोका जा सकेगा, लेकिन उस पर तब पानी फिर गया, जब वाराणसी की एक अदालत ने हिंदू याचिकाकर्ताओं द्वारा वहां दैनिक पूजा की अनुमति देने के लिए दायर याचिका पर मस्जिद के अंदर हिंदू कलाकृतियों का पता लगाने के लिए ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वेक्षण का आदेश दिया। उनके वकील ने दावा किया कि सर्वेक्षण से मस्जिद के वजूखाने (नमाज से पहले हाथ-मुंह धोने की जगह) के अंदर एक शिवलिंग मिला, और अदालत ने वजूखाने को सील करने का आदेश दिया था। इसने भानुमति का पिटारा खोल दिया, जिसमें पूरे भारत में अन्य मस्जिदों के बारे में ऐसे ही दावे किए जा रहे थे।

लगता है कि ऐसे विवाद के अंतहीन धार्मिक संघर्ष की आशंका ने हिंदू राष्ट्रवादी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी चिंतित कर दिया है, जिसके प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में टिप्पणी की कि हर मस्जिद में शिवलिंग की तलाश क्यों? व्यवहार में भारतीय धर्मनिरपेक्षता पर विमर्श भारतीय धर्म पर औपनिवेशिक विमर्श के साथ निरंतरता बनाए रखता है, जो दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवाद की समकालीन अभिव्यक्तियों को भी प्रभावित करता है। भारत को इतना अधिक धार्मिक भूमि माना जाता है कि धर्मनिरपेक्षता को मानक अर्थों में भारत के लिए अनुपयुक्त समझा जाता है। धर्म और राज्य को अलग करने के बजाय ( जिसे 'पश्चिमी' विचार के रूप में देखा जाता है) भारतीय धर्मनिरपेक्षता का संबंध मुगल सम्राट अकबर की दीन-ए-इलाही से अधिक करीबी हो सकता है। यह ऐसा पंथ था, जिसने अपने साम्राज्य में मौजूद सभी धर्मों के तत्वों को समकालिक रूप से मिलाने का प्रयास किया। 

धर्म और राज्य को अलग करने की पश्चिमी धारणा के स्थान पर सभी धर्मों को संरक्षण देने की आकांक्षा ने भारतीय धर्मनिरपेक्षता को कई दरारों में फंसा दिया है, क्योंकि एक धर्म के पक्ष में उठाए गए कदम को दूसरे पक्ष के लिए शत्रुतापूर्ण व्यवहार के रूप में देखा जाता है। यह धर्मनिरपेक्षता को पहचान की राजनीति में फंसा देता है। धर्म-आधारित पर्सनल लॉ का मुद्दा भारत की धर्मनिरपेक्षता की दुविधाओं को उजागर करता है। यह वैश्विक धर्मनिरपेक्षता से अलग है और कुछ हद तक पड़ोसी पाकिस्तान की तरह है, जहां की राजनीति धर्मनिरपेक्ष होने के बजाय धर्म आधारित है, जिसमें यह विवाह, तलाक, या विभिन्न धर्मों के उत्तराधिकार से संबंधित मामलों में अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों का समर्थन करता है। धर्मनिरपेक्ष भारत और इस्लामी पाकिस्तान, दोनों को पर्सनल लॉ ब्रिटिश राज से विरासत में मिले हैं, जिनकी कानून व्यवस्था ऐसे मामलों में धार्मिक न्यायशास्त्र पर निर्भर थी। धर्मनिरपेक्षता को धर्मों
के प्रति राज्य की तटस्थता के बजाय बहु-धार्मिकता के रूप में परिभाषित करने के बाद भारतीय राजनीति मुश्किलों से जूझती रही है। धर्मनिरपेक्षता की इस धारणा के साथ समस्या यह है कि यह समुदायों को चारदीवारी के रूप में देखती है और व्यक्तियों को उनकी निर्धारित पहचान के कैदी के रूप में, जो न तो नागरिकता के आधुनिक विचारों से मेल खाता है और न ही किसी व्यक्ति को अपना फैसला स्वयं करने देने के प्रति उदार है।

हाल ही वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मनीष तिवारी ने एक सवाल उठाया कि क्या धर्मनिरपेक्षता का मतलब सर्वधर्म समभाव है, या अब समय आ गया है कि हम धर्मनिरपेक्षता की नेहरूवादी परिभाषा पर लौटें, जिसका मतलब धर्म और राज्य के बीच सख्त अलगाव था?  हालांकि नेहरू ने इसे कभी लागू नहीं किया और न ही उनके किसी उत्तराधिकारी ने। भारत की धार्मिक दरारों को ठीक करने के लिए कई विकल्प आजमाए गए हैं, लेकिन धर्मनिरपेक्षता की उदार समझ को कम ही आजमाया गया है। 

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