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मिट्टी की मुट्ठी में है हमारा भविष्य 

Sun, 13 Dec 2020 04:13 AM IST
VIR SINGH वीर सिंह
वीर सिंह Published by: VIR SINGH Updated Sun, 13 Dec 2020 04:13 AM IST
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Our future is in hand of soil read Veer singh article
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

विश्व खाद्य कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक डेविड बीजली ने विगत 10 दिसंबर को ओस्लो में अपने नोबल शांति पुरस्कार भाषण में कहा, 'यह कल्पना करना असंभव है कि 400 ईसवी में रोम शहर में भीषण अकाल की वजह से पूरी आबाद के 90 प्रतिशत लोग मारे गए थे। उसी समय रोमन साम्राज्य के पतन की शुरुआत हुई। इस समृद्ध, आधुनिक और तकनीकी रूप से उन्नत दुनिया में यह कल्पना करना भी असंभव है कि हम उसी अकाल की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन आज मेरा कर्तव्य है कि मैं यह कहूं कि अकाल मानवता की दहलीज पर आ पहुंचा है।'


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रोमन अकाल जैसी स्थिति दुनिया के कई क्षेत्रों में आने की पूरी-पूरी आशंका है। देर-सबेर तो सारा विश्व ही इस अभूतपूर्व संकट को झेलने के लिए बाध्य होगा। अनाज के अंबार लगाते-लगाते दुनिया यह भी भूल गई कि जिस दुनिया पर वह पैर जमाए खड़ी है, वह विनष्ट होने के कगार पर है। हमारे पैरों तले एक बहुत ही अनूठी, अविश्वसनीय और अदृश्य दुनिया है। हम अपने घर, गांव, कस्बे, शहर, सड़क, रेल, हवाई अड्डे आदि का निर्माण एक अदृश्य और अद्भुत दुनिया के ऊपर करते हैं। जिस दुनिया को हम देख नहीं पाते, वह देखी जाने वाली दुनिया की तुलना में कहीं अधिक विविध, स्वस्थ, जीवंत, सक्रिय और अधिक टिकाऊ है। हमारी दृश्य दुनिया इस अदृश्य दुनिया में ही निहित है। हमारे जीवन की जड़ें इस अदृश्य दुनिया में ही हैं। हमारे अपने अस्तित्व, सपने, खुशी और स्थायित्व सभी हमारे पैरों तले हैं। जीवन की सबसे बड़ी धारा उस जैव विविधता से गुजरती है, जिसे हम रौंदते हैं।

अद्भुत जैव विविधता के साथ खुलती, चहकती, महकती यह जीवंत दुनिया है मिट्टी की दुनिया। मिट्टी केवल धरती की ऊपरी परत नहीं है। मिट्टी एक पारिस्थितिकी तंत्र है- पृथ्वी का सबसे बड़ा और सबसे अद्भुत पारिस्थितिकी तंत्र। एक चुटकी उपजाऊ मिट्टी लें और उसमें आपको लाख-करोड़ जीवित जीव मिलेंगे। एक अविश्वसनीय-सा सत्य यह है कि पृथ्वी की सारी मिट्टी के मात्र जीवाणुओं का वजन दुनिया के सारे हाथियों, व्हेल और मनुष्य के कुल वजन से भी अधिक है। मिट्टी के अंदर की दुनिया, वास्तव में, जमीन के ऊपर की दुनिया से कहीं अधिक समृद्ध है।

हिंदू दर्शन में मिट्टी को पवित्र माना गया है। पारंपरिक भारतीय किसानों में एक पुरानी कहावत है : पौधों को मत खिलाओ; मिट्टी को खिलाओ, ताकि मिट्टी स्वयं पौधे को खिलाए। उनका मानना था कि मिट्टी को पोषित करना उनका कर्तव्य है, और पौधों को पोषित करना मिट्टी का कर्तव्य है।

कृषि वैज्ञानिक और योजनाकार उत्पादकता-यानी प्रति इकाई फसल उत्पादन-पर बहुत जोर देते हैं। 'उत्पादकता बढ़ाओ' का शोर कृषि विश्वविद्यालय, कृषि संस्थान, खाद्य सुरक्षा के भाषणों और खाद्य सुरक्षा की पैरवी करने वाले सरकारी कार्यालयों में ध्वनि प्रदूषण जैसा लगता है। उत्पादकता वास्तव में है क्या? कृषि पर काम करने वालों के लिए तो उत्पादकता का अर्थ है जादुई बीज, रासायनिक उर्वरक, और पानी से उत्पादकता बढ़ाना। लेकिन उत्पादकता का मंत्र जादुई बीज, या उर्वरक और पानी में नहीं, उसका मूल तो मिट्टी में है। उत्पादकता मिट्टी का काम है। उत्पादकता मिट्टी के स्वास्थ्य और उसके जीवट का प्रतिफल है। कृषि वैज्ञानिकों के लिए तो मिट्टी जैसे केवल एक भौतिक आधार है, जिस पर पौधे अपनी जड़ जमाते हैं।

मिट्टी की उर्वरता क्या है, जिसे उत्पादकता के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है? यह मृदा पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति है, जो मिट्टी में सूक्ष्मजीव द्वारा बनाई गई अपघटन प्रक्रियाओं द्वारा निर्मित होती है। मिट्टी में नाना प्रकार के जीवों और सू्क्ष्मजीवों की संख्या जितनी अधिक होगी, मिट्टी पारिस्थितिकी तंत्र की उर्वरता और उत्पादकता उतनी ही अधिक होगी। इस प्रकार, मिट्टी की जैव विविधता, उर्वरता, उपादकता और स्थिरता सभी परस्पर संबंधित हैं।

मिट्टी के पर्यावरण में फूलने-फूलने वाले सूक्ष्म जीवाणु वातावरण के नाइट्रोजन को मिट्टी में फिक्स कर देते हैं, जहां से उसे पौधे अपनी जड़ से सोख लेते हैं। पौधे की वृद्धि के लिए यह नाइट्रोजन अनिवार्य है। नाइट्रोजन को मिट्टी में फिक्स करने की क्षमता केवल कुछ जीवाणुओं में होती है। हमारा समकालीन विश्व विषम जलवायु परिवर्तन से त्रस्त है। पेड़-पौधे प्रकाश संश्लेषण से जलवायु परिवर्तन के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार कार्बन डाइ ऑक्साइड को अपने अंदर सोख लेते हैं। लेकिन पृथ्वी पर इतने वन नहीं बचे कि विश्वव्यापी कार्बन डाइ ऑक्साइड चक्र को सहन कर सकें। एक आश्चर्यजनक सत्य यह है कि धरती की मिट्टी में कार्बन का भंडार पेड़-पौधों की अपेक्षा दो से तीन गुना अधिक है। जलवायु नियामन के लिए मिट्टी वास्तव में सबसे बड़ी शर्त है। परंतु हमारे कृषि वैज्ञानिकों और योजनाकारों ने मिट्टी को इतना जहर पिला दिया है कि वह बीमार होते-होते अब मृत्यु शय्या पर पड़ी है। सभ्यताओं के इतिहास उन मिट्टियों ने लिखे हैं, जिस पर वे बसी थीं। सभ्यताओं की मिट्टी से ही उनकी संस्कृति की  सुगंध फूटती है। जिस सभ्यता ने अपनी मिट्टी को रौंदा, मिट्टी ने उसको धरती के मानचित्र से साफ कर दिया। हमारा भविष्य मिट्टी की मुट्ठी में है।

-पूर्व प्राध्यापक, जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगकी विवि

 

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