भारत के लिए खुलते दरवाजे

प्रशांत दीक्षित Updated Thu, 30 Jun 2016 12:49 PM IST
Openning doors for india
प्रशांत दीक्षित
भारत के मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) में शामिल होने और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की सदस्यता न मिलने की दोनों घटनाएं वैश्विक परमाणु अप्रसार एजेंडे से जुड़ी हुई हैं। परमाणु अप्रसार की उत्पत्ति परमाणु हथियार अप्रसार संधि में निहित है, जिसे आम तौर पर परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) कहा जाता है।
यह एक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसका उद्देश्य परमाणु हथियार एवं हथियार प्रौद्योगिकी के प्रसार को रोकना, परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना और आगे परमाणु निःस्त्रीकरण के लक्ष्य को पूरी तरह हासिल करना है। यह संधि 1970 में लागू हुई थी और 1985 में अनंतकाल के लिए इसका विस्तार किया गया। कुल 191 देशों ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए हैं। उत्तर कोरिया ने वर्ष 1985 में इसे स्वीकार किया था, लेकिन 2003 में वह इससे अलग हो गया। संयुक्त राष्ट्र के चार सदस्य देशों-भारत, इस्राइल, पाकिस्तान और दक्षिण सूडान ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। इनमें से पहले तीन देश परमाणु हथियार संपन्न देश माने जाते हैं।
हालांकि एनपीटी मौजूदा स्वरूप में भारत को स्वीकार्य नहीं है। भारत इसे गैर परमाणु हथियार वाले राज्यों के लिए अनुचित मानता है, क्योंकि उसमें कहा गया है कि परमाणु हथियार संपन्न देशों को उसे त्यागने की जरूरत नहीं है, जबकि अन्य देशों को परमाणु हथियार रखने की अनुमति नहीं है। गौरतलब है कि इस संधि में सिर्फ पांच देशों को ही परमाणु शक्ति संपन्न माना गया है। भारत हालांकि सैद्धांतिक रूप से परमाणु अप्रसार के प्रति प्रतिबद्ध है, लेकिन वह ऐसी पूर्वाग्रहपूर्ण संधि का समर्थन नहीं करना चाहता।

इन प्रयासों के साथ ही परमाणु अप्रसार व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए कुछ समानांतर गतिविधियां भी लागू की गईं। इसी क्रम में 1987 में जी-7 के औद्योगिक देशों (कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका) द्वारा अनौपचारिक राजनीतिक समझ के तहत एमटीसीआर का गठन किया गया। इसका उद्देश्य मिसाइल और मिसाइल प्रौद्योगिकी के प्रसार को सीमित करना है, ताकि 500 किलोग्राम भार को 300 किलोमीटर तक ले जाने में सक्षम प्रणाली के विस्तार पर अंकुश लग सके। वर्ष 1992 में एमटीसीआर के दायरे में सभी जनसंहारक हथियारों के लिए मानवरहित विमानों के अप्रसार को भी शामिल किया गया। वर्ष 2002 में एमटीसीआर को बैलिस्टिक मिसाइल प्रसार के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय आचार संहिता से जोड़ दिया गया, जिसे हेग आचार संहिता भी कहा जाता है, जो सामूहिक विनाश के हथियारों की आपूर्ति में सक्षम बैलिस्टिक मिसाइलों के प्रसार में संयम एवं देखभाल की बात करता है।

एमटीसीआर की सदस्य संख्या बढ़कर 35 हो गई है, जिसमें इस्राइल भी शामिल है। बीते 27 जून को भारत भी इसमें शामिल हो गया है। चार निर्यात नियंत्रण निकायों (जिसमें एमटीसीआर के अलावा एनएसजी, वासेनार एरेंजमेंट और आस्ट्रेलिया ग्रुप भी शामिल है) में प्रवेश की दिशा में एमटीसीआर में प्रवेश भारत का पहला कदम है। इन चारों समूहों में भारत के प्रवेश से अमेरिका द्वारा दशकों से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को लेकर इन्कार खत्म हो जाएगा और अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए भारत उच्च प्रौद्योगिकी का आयात कर सकता है और चीन के मुकाबले खड़ा हो सकता है। एनएसजी में भारत के प्रवेश न मिलने की निराशाजनक सूचना के अगले ही दिन एमटीसीआर में भारत के प्रवेश की घोषणा की गई। गौरतलब है कि भारत अब एमटीसीआर का सदस्य है, जबकि चीन को इसकी सदस्यता नहीं मिली है। कई लोगों का मानना है कि एमटीसीआर में प्रवेश करके भारत ने अन्य निकायों में प्रवेश की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाया है।

एमटीसीआर में प्रवेश से भारत के लिए उच्च प्रौद्योगिकी खरीदने का रास्ता खुल गया है। साथ ही उसकी निगरानी ड्रोन खरीदने की इच्छा भी ज्यादा यथार्थवादी हो गई है। एमटीसीआर, एनएसजी, ऑस्ट्रेलिया समूह और वासेनार एग्रीमेंट वैश्विक निर्यात नियंत्रण प्रणाली के रूप में उभरे हैं और निर्यात नियंत्रण के सबसे पुराने बहुपक्षीय निकाय हैं। उच्च प्रौद्योगिकी के ज्यादातर निर्यातक इन निकायों के सदस्य हैं। चाहे और कुछ हो या न हो, एमटीसीआर की सदस्यता भारत को प्रौद्योगिकी आयात करने में मदद करेगी। इसी वजह से 1990 के दशक में अमेरिका ने रूस से भारत को क्रायोजेनिक रॉकेट प्रौद्योगिकी लेने में व्यवधान पैदा किया था।
एमटीसीआर की सदस्यता से अमेरिका जैसे देशों का भारत पर भरोसा बढ़ेगा, जो अब प्रौद्योगिकी साझा करने में सहज महसूस करेंगे, क्योंकि सदस्यता के बिना वे ऐसा करने में डर महसूस कर सकते हैं। अमेरिकी कानून के तहत सदस्य एवं गैर-सदस्य देशों के बीच मतभेद किया जाता है, जबकि कई अन्य देशों में इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि किन वस्तुओं का निर्यात किया जाता है और इसका क्या उपयोग होगा। भारत के एमटीसीआर का सदस्य बनने पर गैर-अमेरिकी देश भारत को उच्च प्रौद्योगिकी बेचने में ज्यादा सहजता महसूस करेंगे।

भारत ने अपनी ओर से पिछले दस वर्षों में निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए अपने घरेलू कानून में काफी बदलाव किए हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1540 के तहत अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए जून, 2005 में जनसंहारक हथियारों और उनके वितरण प्रणाली (गैरकानूनी गतिविधि निषेध) अधिनियम लाया गया, जो संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों को सामूहिक विनाश के हथियार और प्रौद्योगिकी के बेहतर प्रबंधन के लिए अपने घरेलू कानून में लागू करना जरूरी है।  
दूसरे परमाणु परीक्षण के अठारह वर्षों बाद भारत परमाणु अप्रसार के शानदार रिकॉर्ड और बढ़ते सामरिक महत्व के कारण चार महत्वपूर्ण निर्यात समूहों में से एक का सदस्य बन गया है।

-लेखक सामरिक एवं रक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं।

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