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एक सत्य ने बदल दिया जीवन
शिवकुमार गोयल
Updated Fri, 16 Nov 2012 05:36 PM IST
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हमारे नीतिशास्त्रों में कई ऐसे प्रसंग हैं, जिसमें यह शिक्षा दी गई है कि सत्य का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। जीवन में चाहे जितनी भी मुश्किलें आईं, अगर सत्य को जीवन का आधार मान लिया जाए, तो सारी कठिनाइयां खत्म हो जाती हैं। इसी से जुड़ा एक प्रसंग है।
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एक बार यात्रियों का एक काफिला रेगिस्तान के रास्ते से गुजर रहा था। अचानक लुटेरों के एक गिरोह ने उसे घेर लिया। लुटेरों द्वारा प्रत्येक यात्री की तलाशी ली गई और उनके रुपये वगैरह छीन लिए गए। लेकिन लुटेरों को एक बारह वर्षीय लड़के के पास कुछ नहीं मिला। लुटेरों के सरदार ने पूछा, लड़के तेरे पास से कुछ नहीं मिला, कहीं तू अनाथ तो नहीं है? उस किशोर बालक ने जवाब दिया, नहीं, मैं अनाथ नहीं हूं। मैं अपनी बीमार बहन की खिदमत करने जा रहा हूं। मेरी मां ने सोने की पांच अशर्फियां मेरे लंगोट में छिपा दी थीं, जो मेरे पास हैं।
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लुटेरों के सरदार ने उससे पूछा, जब मां ने अशर्फियां छिपाकर रख दी थीं, तो तूने हमें क्यों बताया। किशोर ने बताया, मां ने यह भी प्रेरणा दी थी कि जीवन में कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। आपने पूछा, तो मैं झूठ कैसे बोलता? उस किशोर बालक की सत्यनिष्ठा ने डाकू सरदार का हृदय बदल दिया। उसने सभी यात्रियों से लूटा हुआ सामान वापस कर दिया और तत्क्षण सत्य के पालन का संकल्प ले लिया। वह सत्यनिष्ठ बालक आगे चलकर खलीफा अमीन के नाम से विख्यात हुआ।
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