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एक चुनाव, कई सवाल: क्या सत्ता पर विपक्ष का कब्जा होगा, या नीतीश का भविष्य बिहार की राजनीति का भी भविष्य होगा?
Tue, 07 Oct 2025 06:14 AM IST
ज्योति भास्कर
शेखर अय्यर, वरिष्ठ पत्रकार।
शेखर अय्यर, वरिष्ठ पत्रकार।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Tue, 07 Oct 2025 06:14 AM IST
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पीएम मोदी, सीएम नीतीश कुमार (फाइल)
- फोटो :
PTI
विस्तार
अब जबकि बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा हो गई है, अब मतदाताओं के सामने सवाल ये हैं कि क्या जदयू नेता नीतीश कुमार लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बन पाएंगे? अगर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) चुनाव जीतता है, तो क्या भाजपा नए चेहरे को मुख्यमंत्री बनाएगी? या फिर बिहार में सत्ता पर विपक्ष का कब्जा हो जाएगा और उसका अपना मुख्यमंत्री होगा? या फिर नीतीश कुमार का भविष्य बिहार की राजनीति का भी भविष्य होगा?
दो दशकों तक सत्ता में रहने के बावजूद नीतीश अब भी सभी दलों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं। हालांकि, उनके शासन में कई क्षेत्रों में प्रगति हुई है, इसके बावजूद शिक्षा, युवाओं में बेरोजगारी, राज्य से श्रमिकों का पलायन और भ्रष्टाचार तथा कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता अब भी बनी हुई है। नीतीश का स्वास्थ्य भी चर्चा का विषय है। सत्ता विरोधी लहर के मुकाबले के लिए नीतीश सरकार ने एक करोड़ महिलाओं के खातों में 10,000 रुपये हस्तांतरित किए हैं और कई रियायतों व लाभों की घोषणा की है। कुछ नेताओं को लगता है कि यह बड़ा बदलाव लाएगा। नीतीश को हमेशा महिला मतदाताओं का समर्थन मिला है। इससे विपक्ष की गणनाएं गड़बड़ा गई हैं और जद(यू)-भाजपा विरोधियों का मूड भी खराब हो गया है।
हालांकि, ज्यादातर सर्वेक्षण कांटे की टक्कर का संकेत दे रहे हैं, पर वे सत्तारूढ़ राजग के लिए अनुकूल नतीजों से इन्कार नहीं करते। उनका दावा है कि शुरुआत में बढ़त का संकेत देने वाला महागठबंधन अब तेजस्वी यादव के सहयोगियों से मतभेद और लालू परिवार में बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के कारण पिछड़ रहा है। बेशक लालू यादव विपक्षी गठबंधन के पितामह बने हुए हैं, जो यादव और मुस्लिम समर्थन से अपनी ताकत पाता है। लेकिन विपक्ष को अब तक नीतीश या प्रधानमंत्री मोदी का मुकाबला करने लायक कोई मजबूत चेहरा नहीं मिला है। हालांकि, तेजस्वी को लोकप्रिय चेहरे के रूप में देखा जाता है, पर कांग्रेस या उसके सहयोगियों की ओर से अब तक इसकी पुष्टि नहीं हुई है कि वह गठबंधन का मुख्यमंत्री चेहरा होंगे।
विकास पर जोर के बावजूद, बिहार की राजनीति में जाति एक निर्णायक कारक है। हर पार्टी की चुनावी रणनीति समुदाय-आधारित लामबंदी से गहराई से प्रभावित है। राजग का लक्ष्य हमेशा से ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) और ईबीसी (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) के लिए समर्थन को मजबूत करना रहा है। राजद को भी यह एहसास है कि प्रभावी प्रतिस्पर्धा के लिए उसे अन्य जातियों तक अपनी पहुंच बढ़ानी होगी। छोटी जाति-केंद्रित पार्टियां, विशेषकर अनुसूचित जाति (एससी) निर्वाचन क्षेत्रों को प्रभावित करने वाली पार्टियां, करीबी मुकाबलों में ‘किंगमेकर’ बन सकती हैं।
महागठबंधन में इस समय राजद, कांग्रेस, वामपंथी पार्टियां, वीआईपी, झामुमो और चिराग पासवान के चाचा के नेतृत्व में लोजपा का एक धड़ा शामिल है। महागठबंधन बिहार के अत्यंत पिछड़े वर्गों (ईबीसी) को लुभाने की उम्मीद कर रहा है, जो राज्य की आबादी का 36.01 प्रतिशत है। ईसीबी पूरे राज्य में फैले हैं, और जाति-आधारित सर्वेक्षण में सबसे बड़ा समूह हैं। इनमें लगभग 130 समूह और उप-समूह हैं, जिनमें प्रमुख हैं नाई, मछुआरे, लोहार, तेली और नोनिया।
मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश ने नौकरियों, शिक्षा और कल्याणकारी योजनाओं में आरक्षण प्रदान करके अति पिछड़े वर्गों को लाभ पहुंचाया है। उनकी सरकार ने पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों में अति पिछड़े वर्गों (ईबीसी) के लिए 20 प्रतिशत आरक्षण लागू किया था। हालांकि, नीतीश कुमार के राजनीतिक कॅरिअर के अंतिम पड़ाव पर होने के कारण तेजस्वी को लगता है कि उनके वोट शायद सिर्फ राजग के पास ही न रहें। इसीलिए वे नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर लगातार सवाल उठाते हैं। ईबीसी वर्षों से राजग के पक्ष में वोट करता रहा है। कुछ दिन पहले राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने 10 सूत्री ‘अति पिछड़ा संकल्प पत्र’ जारी किया था।
दोनों प्रमुख गठबंधन (एनडीए और महागठबंधन) सीट बंटवारे की बातचीत में उलझे हैं। 243 विधानसभा सीटों में से गठबंधन में किस पार्टी को कितनी सीटें मिलेंगी और किसे कौन-सी सीट मिलेगी, यह विवाद का विषय है। राजग में भाजपा, जद(यू), हम, आरएलएम और लोजपा शामिल हैं। चर्चा है कि जद(यू) अच्छी संख्या में सीटें चाहती है, ताकि भाजपा से नेतृत्व को कोई चुनौती न मिले। जद(यू) नेता सर्वेक्षणों का हवाला देकर बता रहे हैं कि नीतीश को स्थानीय स्तर पर स्पष्ट रूप से मजबूत समर्थन प्राप्त है, और मोदी के प्रति जनता का समर्थन उनके लिए वोटों में तब्दील होने की उम्मीद है।
इस साल के चुनाव में एक तीसरा पक्ष भी है-प्रशांत किशोर का जन सुराज। उनकी पार्टी राजग और महागठबंधन, दोनों के वोट बैंक में सेंध लगा सकती है। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिये युवाओं का खासा ध्यान आकर्षित किया है। किशोर दोनों प्रमुख गठबंधनों को चुनौती दे रहे हैं, हालांकि, उनकी रणनीति ज्यादातर सत्ताधारी दल के खिलाफ रही है। इससे पहले वह विभिन्न पार्टियों को चुनाव प्रबंधन में मदद कर चुके हैं। पहली बार, उन्होंने राज्य के हर जिले में पदयात्राएं की हैं। हालांकि, वह भारी भीड़ जुटा रहे हैं, लेकिन यह दावा नहीं करते कि सरकार बना पाएंगे। पर उनका कहना है कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में वह किंगमेकर की भूमिका निभाएंगे।
विपक्षी महागठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर दरार उभर रही है। हाल ही में, वामपंथी दल सार्वजनिक रूप से अपनी सीटों की मांग कर रहे थे और सीट बंटवारे के फॉर्मूले की घोषणा में देरी के लिए नेताओं पर हमला बोल रहे थे। कांग्रेस भी बिहार में महाराष्ट्र वाला फॉर्मूला अपनाना चाहती है, जहां उसने बिना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए चुनाव लड़ा था। राजद इस रवैये से निराश है और उसे डर है कि महाराष्ट्र जैसी हार बिहार में भी हो सकती है। तेजस्वी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार न बनाने के पीछे कांग्रेस के अपने तर्क हैं। उसके नेता निजी बातचीत में कहते हैं कि मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने से पहले उनके और लालू प्रसाद के अदालती मामलों को भी ध्यान में रखना होगा।
एक हालिया सर्वेक्षण से पता चला है कि राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ के दावों का अपेक्षित असर नहीं हुआ। कांग्रेस फिलहाल बिहार में मजबूत नहीं है, हालांकि वह महागठबंधन में राजद के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। कई राजद नेताओं का मानना है कि राहुल ने तेजस्वी को वोट चोरी के मुद्दे में घसीटकर समय बर्बाद किया।