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प्रेम का एक दिन
Wed, 19 Feb 2020 06:44 PM IST
Raman Singh
तस्लीमा नसरीन
तस्लीमा नसरीन
Published by: Raman Singh
Updated Wed, 19 Feb 2020 06:44 PM IST
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प्रेम
- फोटो : a
मैं प्रेम में विश्वास करती हूं, और पिछले ही दिनों प्रेम को समर्पित वैलेंटाइन डे बीता है। हालांकि बचपन में मैंने वैलेंटाइन डे का नाम भी नहीं सुना था। लेकिन कुछ ही दशक में यह दिवस हमारे समाज में जिस तरह लोकप्रिय हुआ है, वह देखने लायक है। पश्चिम में अलबत्ता वैलेंटाइन डे बहुत पहले से अस्तित्व में है। कहते हैं कि प्राचीन रोम में 13-14 फरवरी को प्रेम का उत्सव मनाया जाता था। लेकिन ईसाइयत में दीक्षित होने वाले रोमन नागरिक अपने इस उत्सव को मन से मना नहीं पा रहे थे, लेकिन इसकी लोकप्रियता को देखकर वे इससे विमुख भी नहीं हो पा रहे थे। अंततः सेंट वैलेंटाइन के नाम से उन्होंने यह उत्सव मनाना शुरू किया।
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यह वही सेंट वैलेंटाइन थे, जिनके ईसाइयत में दीक्षित होने से नाराज होकर रोमन सम्राट क्लाडियस द्वितीय ने उन्हें मरवा दिया था। रोमनों ने प्रेम के इस प्राचीन उत्सव का सिर्फ नाम ही नहीं बदला, इसकी एक प्रथा भी बंद कर दी, जिसके तहत उत्सव में शामिल महिलाओं की पिटाई की जाती थी। उसके पीछे यह विश्वास था कि महिलाएं जितनी पिटेंगी, उनकी प्रजनन क्षमता उतनी बढ़ेगी।
मध्यकालीन अंग्रेज कवि जेफ्री चॉसर और विख्यात लेखक विलियम शेक्सपीयर ने वैलेंटाइन डे को सिर्फ प्रेम का दिन ही नहीं कहा था, उन्होंने इस दिन की याद में काव्य रचनाएं भी की थीं। चॉसर ने अगर वैलेंटाइन डे को प्रेम का दिन नहीं कहा होता, अगर उन्होंने अपनी कविताओं में इसका जिक्र नहीं किया होता कि इस दिन रंग-बिरंगे पक्षी भी अपना साथी चुनने के लिए झुंड में आते हैं, तो वैलेंटाइन डे को प्रेम के दिन के रूप में ऐसी व्यापक मान्यता शायद ही मिलती। हालांकि वैलेंटाइन नाम के जिन दो संतों को मध्य फरवरी में मार डाला गया था, उनमें से कोई भी रोमांटिक नहीं था। दरअसल रोमन सम्राट क्लाडियस द्वितीय ने जब अपने सैनिकों के विवाह पर प्रतिबंध लगा दिया था, तब एक संत वैलेंटाइन सम्राट के आदेश के खिलाफ खड़े हुए थे। उन्होंने अनेक सैनिकों की शादियां कराई थीं। 14 फरवरी को उन्हें मरवा दिया गया था। कहते हैं कि मारे जाने से पहले जेलर की बेटी से उनका प्रेम हो गया था, और उसे भेजी गई एक चिट्ठी में उन्होंने लिखा था-'फ्रॉम योर वैलेंटाइन।'
आज 21 वीं सदी में उन्हीं वैलेंटाइन के नाम पर प्रेम दिवस मनाया जाता है। हालांकि मैं खुद प्रेम को समर्पित सिर्फ एक दिन पर यकीन नहीं करती। प्रेम सतत और शाश्वत है। व्यक्तिगत तौर पर भी मैं वैलेंटाइन डे नहीं मनाती। लेकिन स्वार्थ से भरे समाज में प्रेम को समर्पित एक दिन का मेरे लिए बहुत महत्व है। कारोबारियों के लिए भी यह बेहद उपयोगी दिन है।
अमेरिका में इस बार वैलेंटाइन डे के दिन कार्ड, कैंडी, फूल और स्पेशल डिनर से व्यापारियों ने कुल 18.2 अरब डॉलर की कमाई की। जबकि पिछले साल उनकी कमाई 17.6 अरब डॉलर थी। हालांकि इस उपमहाद्वीप में वैलेंडाइन के विरोधी बहुत हैं। बांग्लादेश और पाकिस्तान की तरह भारत में भी वैलेंटाइन डे को अपनी संस्कृति के खिलाफ माना जाता है। पर प्रेम क्या हमारी संस्कृति का ही हिस्सा नहीं है? जो लोग प्रेम दिवस के खिलाफ जुलूस निकालते हैं, क्या वे बलात्कार, बर्बरता और घृणा के खिलाफ जुलूस निकालते हैं? संभवतः नहीं।
वैलेंटाइन डे की शुरुआत कहीं से भी हुई हो, आज यह दिन कारोबार के लिए ही क्यों न जाना जाता हो, लेकिन याद रखना चाहिए कि यह विशुद्ध प्रेम को समर्पित दिवस है। जब हमारे चारों ओर घृणा और अविश्वास का वातावरण है, जब मानव मन में स्वार्थ और ईर्ष्या ने घर बना लिया है, जब हर तरफ युद्ध और अशांति की आशंकाएं हैं, तब प्रेम को समर्पित एक दिन से सुखद भला और क्या हो सकता है? लेकिन वैलेंटाइन डे के विरोधी, जो वस्तुतः प्रेम के ही विरोधी हैं, इसकी कुंडली खंगालने में ही ज्यादा रुचि लेते हैं कि हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है, कि इसकी शुरुआत रोम से हुई थी, आदि-आदि। लेकिन प्रेम किस संस्कृति में निषिद्ध है? इस दुनिया में आने के बाद से मनुष्य सिर्फ अपने लिए लेना ही सीखता है, वह इसके लिए छल, बल और कौशल का सहारा लेता है। लेकिन देने के बारे में उसे कोई नहीं सिखाता।
प्रेम का एक दिन मनुष्य को अगर कुछ देना सिखाए, उसे थोड़ा उदार बनाए, तो इसमें क्या हर्ज है! साल के तीन सौ पैंसठ दिन तो लड़ाई-झगड़े, ईर्ष्या-द्वेष में बीत ही जाते हैं, सिर्फ एक दिन प्रेम के लिए है। लेकिन हद है कि इस पर भी लोगों को आपत्ति है। जिस मानव समाज को घृणा और हिंसा के सार्वजनिक प्रदर्शन पर कोई समस्या नहीं है, उसे प्रेम के सार्वजनिक प्रदर्शन पर एतराज है! जबकि वैलेंटाइन डे सिर्फ प्रेमी-प्रेमिका और पति-पत्नी तक सीमित नहीं है। आज लोग माता-पिता, दोस्त, यहां तक कि अपने प्यारे कुत्ते बिल्लियों तक को वैलेंटाइन डे की शुभकामनाएं देते हैं।
वैलेंटाइन डे को अगर कारोबारियों के चंगुल से मुक्त कराया जा सकता, तो बहुत ही अच्छा होता। लेकिन फिलहाल तो दूर-दूर तक इसकी संभावना नहीं दिखती। ऐसे में, इस पर विचार किया जाना चाहिए कि इस दिन को सार्थक और यादगार बनाने के लिए क्या-क्या किया जा सकता है। वैलेंटाइन डे को भी अगर औरतों पर होने वाला अत्याचार बंद न हो, तो फिर इस दिन का कोई औचित्य नहीं है। आप फूल नहीं दे सकते, पर कांटे तो न दें। चुंबन न सही, लेकिन थप्पड़ तो न मारें। क्या हम यह कामना नहीं कर सकते कि वैलेंटाइन डे के दिन दुनिया में कहीं किसी स्त्री को यौन दासी बनने के लिए विवश न होना पड़े, एक भी स्त्री को पुरुष का अत्याचार न सहना पड़े, एक भी स्त्री की आंखों से आंसू न निकलें, एक भी लड़की को सिर्फ लड़की होने के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता के अवसरों से वंचित न होना पड़े! सिर्फ प्रेम ही इस पृथ्वी को सुंदर और सार्थक बना सकता है।