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ई-कॉमर्स: ओएनडीसी से बदलेगी तस्वीर, स्पर्धा बढ़ेगी तो रफ्तार पकड़ेगा बाजार
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विस्तार
एक दशक से अधिक समय से भारत सहित दुनिया भर में ई-कॉमर्स (ऑनलाइन व्यवसाय) में भारी वृद्धि देखने को मिल रही है। देश में कुल खुदरा व्यापार का लगभग 6.5 प्रतिशत आज ई-कॉमर्स के माध्यम से होता है। ई-कॉमर्स के जरिये लोगों को घर बैठे एक बटन क्लिक करने पर आसानी से वस्तुएं और सेवाएं मिल जाती हैं। इसके माध्यम से विभिन्न प्रकार की घरेलू और व्यावसायिक सेवाओं तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। लेकिन ई-कॉमर्स क्षेत्र में कुछ बड़ी कंपनियों का दबदबा बढ़ने से पारंपरिक व्यवसायों को भारी नुकसान हो रहा है। सवाल केवल कमीशन का नहीं है, बल्कि तथ्य यह है कि ये ई-कॉमर्स कंपनियां डाटा पर अपने एकाधिकार के कारण विभिन्न विक्रेताओं के बीच भेदभाव करती हैं, जिससे अन्य विक्रेताओं को नुकसान होता है।
ये कंपनियां ग्राहकों को सस्ता सामान और सेवाएं प्रदान करने का दावा तो करती हैं, लेकिन ये छोटे पारंपरिक दुकानदारों, ट्रैवल एजेंटों आदि को बाजार से बाहर करने के लिए उपभोक्ताओं को भारी छूट भी देती हैं। शुरू में उन्होंने उन्होंने भारी प्रोत्साहन भी दिया। एग्रीगेटर के रूप में काम करने वाली ई-कॉमर्स कंपनियां छोटे वेंडरों और गरीब कामगारों की आमदनी का एक बड़ा हिस्सा हड़प रही हैं। ऐसे में, उनके पास केवल दो विकल्प होते हैं, या तो वे अपना शोषण होने दें या फिर व्यवसाय छोड़ दें। यही नहीं, ई-कॉमर्स कंपनियों के कैश बर्निंग मॉडल की वजह से परंपरागत कारोबारी भी धंधे से बाहर हो रहे हैं। कहा जा सकता है कि आज का ई-कॉमर्स समावेशी नहीं है।
क्या हम इन ई-कॉमर्स दिग्गजों के लालच पर रोक लगा सकते हैं? जहां तक सवाल विक्रेताओं और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा का है, तो इसके लिए केंद्र सरकार ने ओएनडीसी (ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स) की शुरुआत की है, जो कंपनी अधिनियम की धारा आठ के तहत पंजीकृत एक कंपनी है। ओएनडीसी नेटवर्क ई-कॉमर्स को एक चैनल प्रदान कर रहा है। यह खरीदारों और विक्रेताओं के बीच एक कड़ी प्रदान करने की कोशिश करता है, जो शोषणकारी नहीं है। इसमें, ई-कॉमर्स कंपनियां डाटा पर एकाधिकार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिये विक्रेताओं के बीच भेदभाव नहीं कर सकती हैं। ओएनडीसी एक ऐसा चैनल है, जिसमें उपभोक्ता विभिन्न प्रकार के विक्रेता, सेवा प्रदाता आदि को आसानी से खोज सकेंगे। इससे ई-कॉमर्स बाजार में एकाधिकार के बजाय प्रतिस्पर्धा के आधार पर विक्रेताओं के व्यवसाय को बढ़ावा दिया जा सकेगा।
ओएनडीसी सामान्य ई-कॉमर्स कंपनियों जैसा नहीं है। यह वास्तव में विभिन्न प्लेटफार्मों और उपभोक्ताओं के बीच एक सेतु है, जो लाभ के उद्देश्य से काम नहीं करता। अभी तक सामान्य ई-कॉमर्स में विक्रेता और सेवा प्रदाताओं को प्लेटफॉर्म पर रजिस्ट्रेशन कराना होता था, इसलिए वे उन प्लेटफार्मों पर निर्भर होते हैं। ऐसे में उपभोक्ता प्लेटफॉर्म पर केवल उन्हीं विक्रेताओं को देख पाते हैं, जो उस पर पंजीकृत होते हैं। ओएनडीसी ऐसी प्रणाली है, जिसमें विभिन्न प्लेटफॉर्मों को ही पंजीकरण की सुविधा प्रदान की जाती है। लेकिन ओएनडीसी की शर्त है कि इनमें से किसी भी प्लेटफॉर्म पर जिन वेंडरों या सेवा प्रदाताओं ने खुद को पंजीकृत कराया है, उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली वस्तुएं और सेवाएं ओएनडीसी पर आने वाले सभी ग्राहकों को दिखाई देंगी। यानी ओएनडीसी एक पारदर्शी प्रणाली है। यह प्रणाली जियोग्राफिक इनफॉरमेशन सिस्टम (जीआईएस) यानी भौगोलिक सूचना तंत्र के जरिये काम करती है और लाखों विक्रेताओं व करोड़ों उपभोक्ताओं को उनके लोकेशन के आधार पर सुविधा प्रदान कर सकती है। जैसे, यदि कोई उपभोक्ता घर बैठे किसी रेस्तरां से खाना या किसी दुकान से किराने का सामान मंगवाना चाहता है, तो ओएनडीसी प्रणाली में वह आसपास के सभी रेस्तरां या किराना दुकानों तक पहुंच सकता है और मनवांछित चीजें खरीद सकता है।
ये सभी विक्रेता और सेवा प्रदाता विभिन्न प्लेटफार्मों पर पंजीकृत होने के बावजूद ओएनडीसी पर संभावित खरीदारों को दिखाई देंगे। हालांकि जिन ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर वेंडर पंजीकृत हैं, वे वेंडर से अपने समझौते के अनुसार शुल्क ले सकते हैं, लेकिन व्यवसाय लाने के लिए प्लेटफार्मों के बीच प्रतिस्पर्धा से उनका कमीशन अपने आप कम हो सकता है। हर प्लेटफॉर्म ज्यादा से ज्यादा व्यवसाय के लिए अपना कमीशन कम रखना चाहेगा। इस प्रकार ओएनडीसी ई-कॉमर्स को प्लेटफार्मों के एकाधिकार से मुक्त करती है और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करती है। यह प्रणाली ई-कॉमर्स व्यवसाय के नियमों में बदलाव कर सकती है। हालांकि, ई-कॉमर्स कंपनियों ने भी ओएनडीसी नेटवर्क में शामिल होने में रुचि दिखाई है और कुछ प्लेटफॉर्म और भुगतान कंपनियां भी ओएनडीसी के साथ पंजीकृत हो रही हैं। हालांकि ओला, उबर जैसी टैक्सी सेवाओं ने अभी तक इस पर अपना पंजीकरण नहीं कराया है, लेकिन कुछ नई ई-कॉमर्स मोबिलिटी कंपनियां ओएनडीसी में रुचि दिखा रही हैं।
ओएनडीसी को हाल ही में पेश किया गया है, इसलिए इस प्रणाली में बहुत कम व्यवसाय हो रहा है, लेकिन उम्मीद है कि यह निकट भविष्य में तेजी से बढ़ेगी। इससे छोटे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म विज्ञापन पर भारी खर्च किए बिना उपभोक्ताओं तक पहुंच सकते हैं। ओएनडीसी प्रोटोकॉल विभिन्न विक्रेताओं के बीच अंतर नहीं करता। यदि ओएनडीसी प्रणाली सफल होती है, तो इसके साथ-साथ ई-कॉमर्स के सभी फायदे तो बदस्तूर मिलेंगे ही, इसकी खामियों से भी बचा जा सकेगा।
गौरतलब है कि अब तक मौजूदा सरकार के तकनीक समर्थित सभी प्रयास सफल होते दिख रहे हैं। आज यूपीआई दुनिया में एक मिसाल बन चुका है, जिससे ऑनलाइन भुगतान जल्दी और बिना लागत के संभव हो रहा है। दुनिया में आज जितने भी ऑनलाइन लेन-देन होते हैं, उनमें से 40 फीसदी से ज्यादा भारत में हो रहे हैं। इस तरह ओएनडीसी न केवल उपभोक्ताओं और विक्रेताओं के शोषण को रोक सकती है, बल्कि स्थानीय व्यवसायों को सुविधा प्रदान करके सकल घरेलू उत्पाद और रोजगार में भारी वृद्धि करने में भी सक्षम हो सकती है।
-लेखक, स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक हैं।