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फिर फिल्मी पर्दे पर चौरासी का पंजाब

Thu, 01 Jan 2015 02:02 PM IST
इंदिरा मितल
इंदिरा मितल Updated Thu, 01 Jan 2015 02:02 PM IST
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Once again 1984's Punjab on film screen

अनुराग सिंह की नवीनतम सुकृति के लिए पंजाब 1984 के स्थान पर कोई सारगर्भित नाम होना चाहिए था। यह फिल्म 1984 की त्रासदी से अधिक कालजयी धीरज वाली धरा की उस 'धी' की, हव्वा की उस बेटी की व्यथा-कथा है, जिसकी कोख से जन्मी पीढ़ियां उसे धन्य करें या श्रापित, दूध जिसका सबने पिया है। इंकलाबी हो या आतंकवादी-है तो मां जाई संतान। उसकी मौत का शोक मनाने वाली रूस की बबुष्का हो या चेचन्या की नाना, यूक्रेन की माती हो या आयरलैंड की म्हैर। गुरिल्ला की म्हाद्रे, जिहादी की अम्मू, टाइगर की अम्मा या मरजीवड़े की बेबे। तार-तार हुए ममता का आंचल भिगोते अश्रु एक जैसे खारे हैं।

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युवा धमनियों में दौड़ते खून की तेज रवानी को साधने का दायित्व सदा पुरानी पीढ़ी का ही है। युवा हाथों में हल, कुदाल थमाकर खुशहाली रोपें या जोश के पंखों को विस्तार नापने दें। स्वस्थ मानसिक विकास और सृजनात्मक अभिरुचियां प्रबुद्ध युवा समाज की द्योतक हैं। संस्कारशील व अनुशासित युवाशक्ति राष्ट्र का बल है। निहित स्वार्थ के कुटिल षड्यंत्र जाल में घिरे युवाओं की मासूमियत को बारूद बनाकर विध्वंस का तांडव रचने वाले तत्व विश्वव्यापी हैं। पार्थ की शौर्य कथा सुनकर हर अभिमन्यु दुरूह से दुरूह चक्रव्यूह तोड़ सकता है। लेकिन समय ही यदि गफलत की नींद सो जाता है, तब जंग-ओ-जेहाद की त्रासदियों का इतिहास सच्चे इंकलाब की कीर्ति को कलुषित करता है। तवारीख के पन्ने बेवजह बहे हरी-भरी जवानियों के खून में सनते हैं। समाज की रूह पर यह घाव तब तक रिसेंगे, जब तक हम मूल तक जाने के बजाय घाव की पपड़ियां ही कुरेदेंगे।
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अंग्रेजी में एक शब्द है 'क्लोजर', जो बापू की कथनी को आत्मसात करता है : घृणा पाप से हो, पापी से नहीं। पंजाब 1984 ऐसे ही 'क्लोजर' का प्रयास है। गुलजार भी 1984 की विषयवस्तु के शोचनीय पक्ष की गहराई तक जा चुके हैं। माचिस में राह भटके युवा के खून की कुर्बानी शून्य में विलीन होने-वाले धुएं के समान है। आतंकवाद एक ऐसी खोह है, जिसमें घुसना जितना आसान है, उससे निकलना उतना ही दुरूह। पंजाब 1984 में मसला वही है-पुरानी फौजदारी और उससे अपना स्वार्थ सिद्ध करनेवाला भ्रष्ट पुलिसकर्मी। अपनी पुश्तैनी जमीन पर जायज हक के लिए मर मिटने वाला निर्भीक व साफदिल वारिस और दुष्ट राजनीति चलाने वालों द्वारा पोषित बागी और उनके सरगने। नायक के पिता कचहरी में पेशी के लिए अमृतसर जाते हैं और आस्थावश वहां स्वर्ण मंदिर में मत्था टेकते समय दुर्भाग्यपूर्ण 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' की चपेट में आ जाते हैं।
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नायक के शोक को आक्रोश में भड़का कर अलगाववादी गिरोह का मुखिया उसे आतंकवाद की ज्वाला में झोंक देता है, जिसकी झुलस नायक की आत्मा को झिंझोड़ देती है। क्रांति यज्ञ में निर्दोषों की आहुति क्यों? उसका तीखा प्रश्न पूरी फिल्म का सार है : इंसाफ और इंकलाब के नाम पर जिस लहर से वह जुड़ा, वह जंग या जेहाद कब और कैसे बन गई? दहशतगर्दों से किनारा करने वाला जांबाज मन का सच्चा है। सुबह का भूला और जिद्दी नायक सांझ को घर लौटने का फैसला कर लेता है। लेकिन उसकी जान के दुश्मन उसे राह में ही घेर लेते हैं। फिल्म में कानून के नाजुक से नाजुक पक्ष को मद्देनजर रखना लाजिमी था, लेकिन भ्रष्ट पुलिसकर्मी को मारकर नायक का पुलिस के आगे समर्पण सरकारी प्रोपेगैंडा लगता है। अनुराग सिंह की कहानी ने नायक के गुस्से और कानून, दोनों की मर्यादा रखी है। घायल धरतीपुत्र अपनी ड्योढ़ी पर लौटता तो है, पर उसे लांघने से पहले एक पुलिस वाले की गोली उसे ढेर कर देती है। वह पुलिस वाला और कोई नहीं, निराश नायिका का नवेला पति है।

पंजाब 1984 की पृष्ठभूमि का आडंबरहीन चित्रण वास्तविक बन पड़ा है। शादी-ब्याह के मौके पर फिल्मी गीत-संगीत से अनछुआ ग्रामीण लोकगान; नवेली की हथेली पर डिजाइनर के बजाय पारंपरिक मेहंदी; उसका पारंपरिक केश और वेश विन्यास। पुराने घरों की मैली दीवारों और मामूली किवाड़ों, खुली बहती नालियों, कच्चे रास्तों और तंग गलियों, खेत-खलिहानों वाले गांव का जनजीवन। शहर के पेचदार कानून-दस्तूर का साबका होने पर विवश जनमानस को ढोती राज्य परिवहन की बस। धीमी रफ्तार से चलने वाले शांत ग्राम्य जीवन में कहर बरपा करने वाली वारदात। बसों से जबरन उतारे निरीह यात्रियों के प्राणहरण और कानून-व्यवस्था के पथभ्रष्ट रखवालों की दरिंदगी।


मिट्टी-सा सोंधा जवान इश्क, जो माचिस में बारूद की ढेर पर टिका था, पंजाब 1984 में परवान चढ़ने से पहले दम तोड़ जाता है। मन को मथने वाली खूबसूरती दोनों प्रेमिकाओं में है, चाहे वह तब्बू हों या सोनम बाजवा, पर वे फिल्मी अतिनाटकीयता के दोष से बरी नहीं रह सकी हैं। थाने पर हमले में शिवा कई गोलियां खाकर भी दुरुस्त लौटता है, भ्रष्ट पुलिसकर्मी से निहत्थे लड़ता है। बुरी तरह जख्मी और खून में लथपथ होने के बावजूद अपने घर की गली में ऊंचे स्वर से ललकारा लगाने का दम उसमें बाकी रहता है। शिवा की भूमिका में दिलजीत दोसांझ का अभिनय ठीक है। अपने संक्षिप्त रोल में भी अरुण बाली और विस्तृत भूमिका में पवन मल्होत्रा उन पर भारी हैं। फटी बनियान वाला मूक बालक भी अपनी छाप छोड़ गया है। पंजाब 1984 धरा-सी सहिष्णु मां की भूमिका में किरण खेर के कंधों पर टिकी है। मुंबइया फिल्मों में सिंहनी-सी गर्जना वाली किरण की आवाज खामोश पानी में तनिक मंद हुई, लेकिन पंजाब 1984 में सतवंत कौर के बोल दुलार, पुचकार भरी लोरी से मीठे हैं। पुलिस की लाठी खाकर भी न टूटने वाला उसका मौन हठ मान-मनौव्वल तक कर लेता है, लेकिन हार मानता है, तो केवल नियति से। मृत पुत्र के शरीर पर मां का हृदय विदारक विलाप उजड़ी कोख से उपजा श्राप है। जंग और जेहाद जवानियों को होम करके वसुधा को मरु न बना दे।

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