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विवेकानंद के रास्ते पर भारत अवनति से नवगति की ओर
Tue, 03 Sep 2019 04:59 AM IST
तरुण विजय
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Published by: तरुण विजय
Updated Tue, 03 Sep 2019 04:59 AM IST
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- फोटो : a
कन्याकुमारी में तीन सागरों के जल जिस श्रीपाद शिला पर अंकित अनादिकालीन देवी कन्याकुमारी के श्रीचरण पखारते हैं, वहां 1972 में स्वामी विवेकानंद की भव्य प्रतिमा और स्मारक की स्थापना की गई थी। इसी शिला पर 1893 में विवेकानंद ने दो दिन साधना की थी, जिनका ध्येय था भारत को अवनति से उठाकर नवगति की ओर ले चलने के लिए मां भगवती से प्रार्थना करना। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक, जो अखिल भारतीय सरकार्यवाहक भी रह चुके हैं, एकनाथ रानाडे ने न केवल इस स्मारक की कल्पना की थी, बल्कि श्रीमती इंदिरा गांधी, शेख अब्दुल्ला और करुणनिधि सदृश विपरीत ध्रुव के नेताओं से इस स्मारक के लिए सहयोग भी लिया।
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1963-64 में कन्याकुमारी के स्थानीय नागरिकों ने स्वामी विवेकानंद की स्मृति में शिला पर उनकी मूर्ति स्थापित करने हेतु एक समिति बनाई और सरसंघचालक गुरुजी गोलवलकर के पास गए, जिन्होंने एकनाथ रानाडे को इसका दायित्व सौंपा। तब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री कांग्रेस के श्रीभक्त वत्सलम थे। उन्होंने कहा कि इस शिला का स्वामी विवेकानंद से संबंध है, पर यहां वह किसी की मूर्ति लगाने की अनुमति नहीं देंगे। रानाडे अपनी योजना के समर्थन में साढ़े तीन सौ सांसदों के पत्र लेकर गृह मंत्री लालबहादुर शास्त्री के पास पहुंचे। नेहरू जी ने कहा कि जब इतने अधिक सांसद चाहते हैं, तो इसका मतलब है कि यह देश की इच्छा है।
नेहरू और शास्त्री जी के बाद प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गांधी ने रानाडे को केंद्र सरकार की ओर से 50 लाख रुपये देने का निर्णय लिया। दिग्गज द्रविड़ नेता अन्नादुरुई ने कहा कि यह संघी हिंदू नेता हमारे पास नहीं आएंगे, पर रानाडे उनके पास गए और करुणानिधि के पास भी। दोनों ने कहा कि हमारा आपसे वैचारिक मतभेद है, पर स्वामी विवेकानंद के इस कार्य में हम सहयोग देंगे। हर प्रांत ने सहयोग दिया, जिनमें जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला और नगालैंड के कट्टर चर्च नेता एवं मुख्यमंत्री होकिशै सेमा भी थे। दो सितंबर, 1972 को राष्ट्रपति वी.वी. गिरि ने विवेकानंद शिला स्मारक का उद्घाटन किया। करुणानिधि भी आए और इंदिरा जी ने शुभकामना पत्रिका में लिखा कि उनकी रुचि इस स्मारक के बाद वाले काम में है, जो विवेकानंद का स्वप्न साकार करने का है।
एकनाथ रानाडे ने एक नवीन विवेकानंद सृष्टि का सृजन किया। शिला स्मारक जहां देश के नवतीर्थों में गिना गया, वहीं देश के विभिन्न प्रांतों में विवेकानंद केंद्र के हजारों जीवनव्रती युवक-युवतियां, शिक्षा, देशभक्ति, आध्यात्मिक चेतना, चिकित्सा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के लिए संन्यासी की भांति जीवन जीते हुए काम कर रहे हैं। उत्तर पूर्वांचल में तो अनेक मुख्यमंत्री, जो कांग्रेस सहित अनेक दलों में नेता बने, विवेकानंद केंद्र विद्यालय में पढ़े हैं। रानाडे जी की कल्पना थी कि देश का एक केंद्रीय सुरक्षा थिंक टैंक और हिंदू सभ्यता का विश्व में प्रसार करने वाला केंद्र बने। उसी के तहत दिल्ली में विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन की स्थापना हुई, जिसके पहले प्रमुख अजित डोभाल आज राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं। विवेकानंद इंटरनेशनल से राष्ट्रीय सुरक्षा और हिंदू सभ्यता का गौरवशाली संदेश ले जाने का कार्य देश के शीर्ष पूर्व सैन्य अधिकारी, राजनयिक, लेखक, कलाधर्मी और दार्शनिक कर रहे हैं।
दो सितंबर को राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री से मिलकर विवेकानंद शिला स्मारक के वरिष्ठ नीति नियंताओं ने 'एक भारत, विजयी भारत' का एक वर्षीय अभियान प्रारंभ किया है। निश्चय ही विवेकानंद की ऊर्जा से स्पंदित यह अद्भुत अभियान नए, विजयी भारत के निर्माण में नई पीढ़ी को नई ताकत से जोड़ेगा।