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माकपा के पदचिह्नों पर

Sun, 10 Jun 2018 06:50 PM IST
subrat mukherjee सुब्रत मुखर्जी
Updated Sun, 10 Jun 2018 06:50 PM IST
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On the footprints of the CPI
बंगाल में हिंसा
पश्चिम बंगाल की सामाजिक व्यवस्था तुलनात्मक रूप से शांतिपूर्ण है, जिसमें ऊंची जातियों का वर्चस्व होने के बावजूद सहिष्णुता का माहौल है। जाति हिंसा एवं सांप्रदायिक दंगों के मामलों में पश्चिम बंगाल की स्थिति देश के उत्तरी और पश्चिमी राज्यों की तुलना में बहुत ही अच्छी है। पर राजनीतिक हिंसा के मामले में, वह भी खासकर ग्रामीण इलाकों में, पश्चिम बंगाल बहुत बदनाम है। पिछले दिनों संपन्न हुए पंचायत चुनाव के दौरान भी राज्य में भीषण हिंसा हुई। भाजपा के मुताबिक उस हिंसा में उसके बावन लोग मारे गए।

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जबकि खुद सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस भी अपने चौदह कार्यकर्ताओं के उस हिंसा में मारे जाने का दावा करती है। इस चुनाव की एक और परेशान करने वाली बात यह है कि ग्राम पंचायत में तृणमूल के चौंतीस प्रतिशत प्रत्याशी निर्विरोध चुने गए, क्योंकि दूसरी राजनीतिक पार्टियों के प्रत्याशियों को नामांकन पत्र भरने ही नहीं दिया गया। चुनाव के बाद भी ग्रामीण बंगाल में दबंगई और हिंसा जारी है।

बंगाल में दशकों से व्याप्त भीषण हिंसा की वजह यह है कि वहां के ग्रामीण जीवन में मध्यस्थता करने वाला कोई सामाजिक संगठन नहीं है। इस खाई को राजनीतिक पार्टियों ने भरा है, जो सामाजिक जीवन के सभी पहलुओं पर, यहां तक कि शादी-विवाह जैसे वैयक्तिक मामलों में भी, अपना नियंत्रण बनाए रखती हैं। प्रोफेसर पार्थ चटर्जी कहते हैं कि पश्चिम बंगाल के ग्रामीण जीवन की पार्टी के बिना कल्पना ही नहीं की जा सकती। यह स्थिति वहां विभाजन के बाद आई है। उससे पहले बंगाल का ग्रामीण जीवन देश के दूसरे राज्यों के ग्रामीण परिदृश्य जैसा ही था।

यानी जमींदार तथा जातिगत और सांप्रदायिक संगठन वहां मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे। लेकिन विभाजन ने तब तस्वीर बदल दी, जब एक बेहद ताकतवर वाम संगठन ने भूमिहीन किसानों के आंदोलन का नेतृत्व करना शुरू किया। प्रसिद्ध तेभागा आंदोलन (1946-47) ग्राम बांग्ला में होने वाले बदलाव का पहला उदाहरण था, जब जमीन जोतने वाले किसानों ने आधी फसल की जगह दो तिहाई फसल की मांग जमींदारों से की। जमींदारों ने वह मांग खारिज कर दी, जिसकी परिणति दोनों ओर से भीषण हिंसा के रूप में सामने आई। उस आंदोलन के एक किसान नेता कांसारी हालदार ने जेल में रहते हुए 1952 का लोकसभा चुनाव भारी बहुमत से जीता था।

अनाज की कमी बंगाल की पुरानी समस्या रही है, जो आजादी के बाद भी जारी रही। चूंकि सरकार इस समस्या का समाधान करने में नाकाम रही, ऐसे में 1959 में अकाल की आशंका बढ़ने पर ग्रामीण इलाकों में लोगों का विरोध प्रदर्शन बढ़ने लगा और हिंसा ने पूरे राज्य को अपनी चपेट में ले लिया। वर्ष 1966 में फिर ऐसी ही स्थिति पैदा हुई। नतीजतन 1967 में राज्य की जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। उसके साथ ही ग्रामीण बंगाल का पुराना सामंती ढांचा भी ढह गया। जमींदारों के पुराने ताकतवर गठजोड़, स्थानीय ठग और पुलिस की तिकड़ी प्रभावहीन हो गई।

दरअसल वह कांग्रेस थी, जिसने 1955 में राज्य में भूमि सुधार कानून पारित किया था, लेकिन उस पर अमल नहीं हुआ। इसकी वजह सरकारी अनिच्छा तो थी ही, पश्चिमी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से आने वाले लाखों शरणार्थियों को बसाने की समस्या भी थी, और यह आशंका भी थी कि भूमि सुधार कानून लागू कर देने पर तेभागा जैसे कई और आंदोलन उभर सकते हैं। 

1972 के विधानसभा चुनाव में, जिसमें भारी धांधली के आरोप लगे, कांग्रेस विजयी हुई और सिद्धार्थ शंकर राय मुख्यमंत्री बने। उस चुनाव में ज्योति बसु तक को हारना पड़ा और माकपा के तमाम दिग्गज नेताओं को राज्य से भागने पर मजबूर होना पड़ा। तब भाकपा कांग्रेस की इकलौती सहयोगी पार्टी थी। विपक्ष पर शारीरिक हमले के लिए पहली बार राज्य के तंत्र का इस्तेमाल किया गया। कांग्रेस की वह सरकार 1977 तक चली। उस साल हुए चुनाव में जनता ने देश की तरह पश्चिम बंगाल से भी कांग्रेस को बाहर कर दिया। उसके बाद से कांग्रेस वहां सत्ता में नहीं आ सकी है।

राज्य की सत्ता में आने के बाद वाम मोर्चे की सरकार ने ऑपरेशन बर्गा नाम से भूमि सुधार कानून पारित किया। चूंकि यह कदम गांवों के हित में उठाया गया था, इसलिए पहली बार ग्रामीण इलाके में सत्ता की मजबूत पकड़ बनी। जमींदारी के ध्वस्त हो जाने से गांवों में जो खालीपन आया था, उसे सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टी ने भरा। अब पार्टी के कार्यकर्ता पूरी पंचायत व्यवस्था को नियंत्रित करने लगे। लेकिन ग्राम बांग्ला में वाम मोर्चे के प्रति अटूट समर्थन को धक्का तब लगा, जब बुद्धदेव भट्टाचार्य ने खेती में व्याप्त गतिरोध दूर करने और औद्योगिकीकरण के लिए स्टालिन जैसा अतिवादी तरीका अपनाया। सिंगुर और नंदीग्राम में किसानों के खिलाफ चले अभियान से ग्राम बांग्ला वाम-विरोधी हो गया। ममता बनर्जी ने किसानों के जख्मों पर मरहम रखने में देर नहीं की, और चुनाव जीतकर सत्ता में आईं।

तृणमूल के पास बेशक माकपा के जैसा सांगठनिक ढांचा नहीं है, फिर भी उसने ग्रामीण इलाकों में ताकत के बूते अपना वर्चस्व बनाए रखा है। उसके गुंडे दूसरी पार्टियों के कार्यकर्ताओं को निशाना बनाते हैं, जैसा उसने पंचायत चुनाव के दौरान किया। इस हिंसा की एक वजह 2019 के लोकसभा चुनाव में भारी जीत हासिल करने का लक्ष्य भी है। चूंकि पश्चिम बंगाल में विश्वसनीय विपक्ष नहीं है-भाजपा वहां दूसरे स्थान पर है-ऐसे में तृणमूल की यह हिंसा अभी जारी रह सकती है। बेशक उसका वोट प्रतिशत अब भी 44 फीसदी है, लेकिन ममता बनर्जी अपनी वैधता खो चुकी हैं। पंचायत चुनाव में की गई धांधली राज्य में तृणमूल के अंत की शुरुआत का संकेत देती है। ममता कभी कांग्रेस को माकपा की बी टीम कहती थी, पर माकपा के पदचिह्नों पर चलते हुए आज वह उसकी वास्तविक उत्तराधिकारी बन चुकी है।  

 
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