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हिंसा और हत्या के बीच शायरी
राफिया जकारिया
Updated Sat, 21 Feb 2015 09:59 PM IST
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वह खबर अखबारों के पन्नों में कहीं गहरे दबी हुई थी, और यह वाकई हैरत की बात थी कि इस बारे में तमाम जानकारियां छपी थीं। हिंसा और खून-खराबे की उन खबरों के बीच, जिन्होंने अखबारों के पहले और आखिरी पन्नों पर कब्जा जमा रखा था, यह खबर शायरी और हमारी याददाश्त, दोनों के खत्म होने की बात करती थी। बुधवार, 19 फरवरी को उस पेशावर यूनिवर्सिटी के पश्तो विभाग में एक बैठक हुई, जो पिछले कई दशकों से कट्टरवादी हिंसा के लिए ज्यादा जाना जाता है।
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संजीदा लोग वहां पश्तो शायर अमीर हम्जा शीनवारी को याद करने पहुंचे थे, जो एक रहस्यवादी और पारखीनिगाह शख्स थे। लांडी कोटल में पैदा हुए हम्जा ने एक ऐसे समय में मोहब्बत पर शायरी लिखी थी, जो उनके दौर में मुमकिन थी। ऐसे में, यह बिल्कुल भी हैरतनाक नहीं है कि उन तमाम यादों की तरह, जो पाकिस्तान के मौजूदा दौर से मेल नहीं खातीं, हम्जा बाबा की परंपरा को उस मिट्टी से भी खुरच-खुरच कर मिटा दी गई, जहां उनके बारे में तमाम तरह की कहानियां थीं।
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पश्तो विभाग में जमा हुए तमाम विद्वान इसी पर बात करते हुए अफसोस जाहिर कर रहे थे। हम्जा बाबा की याद में लांडी कोटल में बनी लिटरेरी सेंटर की इमारत लापरवाही और मरम्मत न कराए जाने की वजह से इस कदर खंडहर बन चुकी है कि उनकी याद में शायरी का सालाना जलसा कराना भी वहां मुमकिन नहीं रह गया है। उबड़-खाबड़ चट्टानी इलाकों में गोली और ग्रेनेड के धमाकों के बीच मोहब्बत के शायर की याद में बनी यह इमारत बहुत पहले लोगों की याददाश्त से उतर चुकी है। हम्जा बाबा की यह खंडहर बनती इमारत पाकिस्तान में शायरी और अदब के खत्म होने की याद दिलाता है। इसके हश्र पर अफसोस जताने वाले लोग सरकार से इसका कंट्रोल अपने हाथ में लेने की दरख्वास्त कर चुके हैं। पर जो सरकार खुद को मुश्किल से बचा पा रही हो,क्या वह मस्जिदों में लोगों को, स्कूलों में बच्चों को, शायरी और अदब को बचा सकती है? इस मुल्क में ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जवाब नहीं मिलते।
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1907 में पैदा हुए हम्जा बाबा 1994 तक जिंदा रहे, इस दौरान उन्होंने तकरीबन चालीस किताबें लिखीं। जवानी में वह ऐसे अफसाने लिखने के बारे में सोचते थे, जिन पर फिल्में बनें। उसी दौरान वह चिश्तिया सूफीवाद से जुड़ गए, जिसके बाद उनकी शायरी में सूफीवाद के दर्शन होने लगे थे। पाकिस्तान बनने के बाद उन्हें उस मुल्क के बारे में लिखना शुरू किया। उन्होंने सैकड़ों नाटक लिखे, जो रेडियो पाकिस्तान से प्रसारित हुए। अपने कामकाज के लिए उन्हें इनाम भी मिला। पर वे दिन अब हमारी माजी का हिस्सा भर हैं।
जिस मुल्क में शायरी मजहब-विरोधी मान ली गई है, वहां इसे पटरी पर लाने की बात सोचना भी मुश्किल है। चार साल पहले, जुलाई, 2011 में हम्जा बाबा की कर्ब पर तालिबान ने हमला बोला था। मानो उनकी शायरी और शख्सियत को भुला देना ही काफी न था, उनकी कब्र को भी नेस्तनाबूद कर देने की मंशा थी!
(डॉन में छपे उनके ब्लॉग से)